• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 17 June, 2019 10:46 AM | Total Read Count 133
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180 दिन : कमलनाथ, कांग्रेस, कमल कौन-कहां

राकेश अग्निहोत्रीः कमलनाथ सरकार के 180 दिन पूरे होने पर सरकार यह सोचने को मजबूर हुई कि जिन उपलब्धियों की दम पर राहुल गांधी के हाथ मजबूत करना चाहती थी.. यदि वह संभव नहीं हुआ तो फिर उसकी सबसे बड़ी कमजोर कड़ी क्या है.. शायद यही बड़ी वजह है कि लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद उसने बिना समय गंवाए सरकार उसके फैसलों के दम पर मुख्यमंत्री कमलनाथ की ब्रांडिंग करने का फैसला किया है.. पूरे प्रदेश में मंत्री विधायक और संगठन के पदाधिकारी, प्रवक्ता पार्टी के वचन पत्र में शामिल वादों को पूरा करने  के अपने नए इरादों के साथ मीडिया के मार्फत  जनता तक पहुंचना चाहती.. कमलनाथ और उनकी सरकार यदि अपनी उपलब्धियों का मूल्यांकन प्रदेश की जनता से करवाने की मंशा रखती है तो इसमें कुछ गलत भी नहीं..

लेकिन यदि  वादे के अनुरूप समय सीमा को छोड़ भी दिया जाए तो किसानों के दो लाख तक के कर्ज माफी पर सवाल खड़े हो रहे  तो फिर  उसके इरादों पर भी  प्रश्नचिन्ह लगना लाजमी.. ऐसे में कांग्रेस के नीति निर्धारकों को लगे हाथ बिना समय गंवाए आने वाले समय में नई चुनौतियों को भी चिन्हित कर लेना चाहिए.. तो उसे इस बात की तह तक भी जाना होगा कि आखिर किससे कहां क्यों चूक हुई.. चाहे फिर वह सत्ता और संगठन में समन्वय से जुड़ा हो या फिर अधिकारियों और मंत्रियों के बीच रस्साकशी से लेकर विधायक और कार्यकर्ताओं का जनता और मतदाताओं से संवाद के मोर्चे पर ही गफलत क्यों ना हो.. क्योंकि यदि  सबसे अनुभवी  कमलनाथ यदि कांग्रेस की सरकार को  सही तरीके से नहीं चला सकते  तो फिर यह काम पार्टी के किसी दूसरे नेता के बस में तो कतई नहीं..

जो भी हो कमलनाथ को पॉलिटिक्स की केमिस्ट्री और गणित से आगे अपनी ही बनाई व्यवस्था पर पुनर्विचार कम से कम पब्लिक परसेप्शन को ध्यान में रखते समय रहते कर लेना चाहिए ..ऐसे में बड़ा सवाल पिछले 6 माह में कांग्रेस यदि सरकार में लौटी और भाजपा को सत्ता से बेदखल होना पड़ा तो फिर इस दौरान कौन कहां खड़ा नजर आ रहा.. चाहे फिर वह कांग्रेस हो या कमलनाथ या फिर कमल का फूल वाली भाजपा और उसके नेता.. क्योंकि कांग्रेस में यदि पुराने नेताओं की वापसी हुई तो उसके नए चेहरों ने सत्ता में दखल बढ़ा कर फिलहाल भाजपा के मुकाबले कांग्रेस की लाइन को बड़ा जरूर किया है.. फिर भी कड़वा सच यही है कि कांग्रेस को अपनी कमलनाथ सरकार को अस्थिरता के दौर से बाहर निकालना होगा..

 

प्रदेश में हार और दिल्ली में जीत ने खड़ा किया संगठन स्तर पर भाजपा में स्वीकार्य नेतृत्व का संकटः  6 माह पहले कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की जोड़ी को आगे रखकर राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश की सत्ता में वापसी का जो रोडमैप तैयार किया था.. आखिर वह लक्ष्य उसने हासिल किया.. जबकि दूसरी ओर मोदी और शाह की जोड़ी ने तमाम विरोधाभास .. असमंजस से बाहर निकलकर विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में लड़ने का फैसला लिया था.. इस चुनाव में भाजपा को वोट यदि ज्यादा मिले तो सीट कांग्रेस को.. शिवराज और भाजपा द्वारा कदम पीछे खींच लेने के बीच तत्परता दिखाते हुए कांग्रेस ने अनुभवी कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनाने का फैसला लिया और सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से यह सरकार अस्तित्व में आई और चल भी रही है.. इस दौरान यदि लोकसभा चुनाव ने कांग्रेस और खासतौर से मुख्यमंत्री कमलनाथ को बड़ा झटका दिया ..तो भाजपा मोदी सरकार पार्ट टू के अस्तित्व में आने के बाद बुलंद हौसलों के साथ सही..

समय पर फिर प्रदेश की सत्ता में वापसी का सपना संजोए बैठी है.. पिछले 6 माह में मध्यप्रदेश में न सिर्फ माहौल बदला.. बल्कि और भी बहुत कुछ बदला.. जिसने नई संभावनाओं को भी जन्म दिया.. विपक्ष में रहते यदि भाजपा अभी तक कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई.. तो पार्टी के अंदर नेताओं की नई भूमिका तय किए जाने के बाद नेतृत्व का संकट फिर बड़ी समस्या के तौर पर सामने आ चुका है.. चाहे फिर वह पार्टी के अंदर राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की बढ़ती लोकप्रियता और उनकी आक्रामक राजनीति.. जिन्होंने दिल्ली और पश्चिम बंगाल से मध्यप्रदेश के लिए संदेश दिए कि यह वक्त है बदलाव का चाहे फिर वह भाजपा के अंदर की बात हो या फिर मध्यप्रदेश में नेतृत्व से इसके तार जुड़ते हों.. ऐसा नहीं है कि केंद्र में सरकार बनने के बाद मध्यप्रदेश के दूसरे नेताओं का सियासी कद और महत्व नहीं बढ़ा है..

एक बार फिर नरेंद्र तोमर ने दिल्ली दरबार में अपनी धमक का एहसास कराया.. तो लंबे अरसे बाद सांसद प्रहलाद पटेल मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा बनकर एक नई पारी का धमाकेदार आगाज कर चुके.. थावरचंद गहलोत भी मंत्रिमंडल और संसदीय बोर्ड से आगे अब राज्यसभा में सत्ताधारी पार्टी का नेतृत्व करेंगे.. जो काम अभी तक अरुण जेटली के सुपुर्द था ो  फग्गन सिंह कुलस्ते जिन्हें मोदी ने पिछली बार मंत्री बनाकर हटा दिया.. था एक बार फिर उन्हें आदिवासी चेहरा बनाकर आगे बढ़ाया.. भाजपा के अंदर से 6 माह में प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका राकेश सिंह अपनी जिम्मेदारी सांसद रहते निभा रहे हैं.. तो पंडित गोपाल भार्गव भी नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हो चुके.. जो पार्टी के बड़े फैसलों में सहभागी बनते हैं..

पूर्व संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने सदन के अंदर विपक्ष की भूमिका में अपनी अहमियत का एहसास कराया तो लोकसभा चुनाव में विष्णु दत्त शर्मा की जीत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. यदि किसी को अपनी नई भूमिका का इंतजार है तो वह हैं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा.. जिनके पास राज्यसभा का सीमित समय बचा है.. इन छह माह में भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेता शिवराज सिंह चौहान की भूमिकाएं नए सिरे से तलाशने की कोशिश जारी हैं.. फिलहाल राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहते शिवराज को सदस्यता अभियान कर राष्ट्रीय प्रभारी बनाकर मोदी-शाह ने अपनी ओर से कुछ संकेत देने की जरूर कोशिश की.. विधायक रहते शिवराज फिलहाल गैर राजनीतिक मोर्चे पर भी अपनी सक्रियता बनाए हुए तो प्रदेश भाजपा के दूसरे नेता भी उनके पीछे चलने को मजबूर हैं.. दिल्ली में मोदी-शाह तो मध्यप्रदेश में राकेश सिंह और सुहास भगत चाहकर भी शिवराज को नजरअंदाज नहीं कर पा रहे..

लेकिन भाजपा के अंदर नए सिरे से स्थापित हो रहे नेताओं और उनकी बदलती भूमिका में छुपे हुए संदेश को समझना होगा.. खासतौर से जब भाजपा कमलनाथ सरकार की अस्थिरता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही तो उसका मकसद जरूरी बहुमत जुटाकर प्रदेश की सत्ता में लौटना है.. केंद्र में उसकी सरकार लौट चुकी है और उसका मानना है कि समर्थन देने वाले अतिरिक्त विधायकों का जल्दी ही कांग्रेस और कमलनाथ से मोह भंग हो जाएगा.. तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि आखिर मोदी और शाह के राडार पर मध्यप्रदेश कहां है.. यदि उसे राज्य की सत्ता में लौटना तो उसका फार्मूला क्या होगा और वह कैसे अंजाम तक पहुंचेगा.. तो सवाल यह भी कि यदि कमलनाथ सरकार अपने बोझ से आज नहीं तो कल गिर जाती.. तो भाजपा का वह शीर्ष नेता कौन होगा.. जो विकल्प के तौर पर सरकार की अगुवाई करेगा.. कुल मिलाकर पिछले 6 माह में सत्ता से बेदखल होने के बाद भाजपा की बड़ी उपलब्धि केंद्र में मोदी सरकार का दोबारा अस्तित्व में आना है.. लेकिन कुछ सीटों से पहले ही पिछड़ चुकी भाजपा की आखिर मध्यप्रदेश में दिशा क्या होगी.. क्या मोदी और शाह अनुभवी, भरोसेमंद, लोकप्रिय नेतृत्व को दरकिनार कर नई पीढ़ी के निर्माण में दिलचस्पी और जोखिम लेंगे..

प्रदेश में जीत और दिल्ली की हार से कांग्रेस में सत्ता से ज्यादा संगठन में नई पीढ़ी नए नेतृत्व का संकटः 6 माह पहले नेतृत्व के संकट से जूझ रही पिछले तीन विधानसभा चुनाव हार चुकी कांग्रेस ने किसी को सीएम प्रोजेक्ट ना करते हुए समन्वय-सामंजस्य के जरिए चुनाव में जाने का फैसला किया था.. उस वक्त तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव को हटाकर कमलनाथ को संगठन की कमान तो ज्योतिरादित्य को चुनाव अभियान समिति की बागडोर सौंपी गई.. यही नहीं तीसरे बड़े नेता के तौर पर दिग्विजय सिंह को समन्वय का दायित्व सौंपा.. कमलनाथ, ज्योतिरादित्य लोकसभा सांसद, दिग्विजय राज्यसभा सांसद के तौर पर प्रदेश के दूसरे नेताओं अरुण यादव, अजय सिंह, सुरेश पचौरी को पीछे छोड़ते हुए फ्रंट फुट पर पूरे चुनाव के दौरान नजर आए.. वह बात और है कि बाद में जरूरी समन्वय के लिए सभी को एडजस्ट किया गया..

चाहे फिर वह विवेक तंखा और कांतिलाल भूरिया ही क्यों ना हों.. इन सभी नेताओं के बीच में प्रदेश प्रभारी की भूमिका में राहुल गांधी के नुमाइंदे दीपक बाबरिया भी अपनी अहमियत का एहसास कराते रहे.. चर्चा सीएम इन वेटिंग के तौर पर कमलनाथ और ज्योतिरादित्य की रही.. कमलनाथ ने प्रदेश अध्यक्ष रहते चार कार्यकारी अध्यक्षों समेत जंबो कार्यकारिणी का गठन किया.. सरकार में आने के पहले 6 माह में कांग्रेस के अंदर पुरानी पीढ़ी के अनुभवी कमलनाथ ने अपनी पकड़ मजबूत साबित की.. तो युवा नई पीढ़ी का बड़ा चेहरा ज्योतिरादित्य धीरे-धीरे पीछे छूटते गए.. भाजपा के मुकाबले ज्यादा सीट हासिल कर बहुमत का दावा कर कांग्रेस ने कमलनाथ को अपना नेता चुना.. इस दौरान राजस्थान और छत्तीसगढ़ के फार्मूले से अलग ज्योतिरादित्य ना उप मुख्यमंत्री और और ना ही प्रदेश अध्यक्ष बनकर सामने आए.. कमलनाथ मंत्रिमंडल में उनके समर्थक मंत्रियों का दखल जरूर रहा..

लेकिन लोकसभा चुनाव आते-आते ज्योतिरादित्य को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर प्रियंका गांधी के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंप दी गई.. कमलनाथ की दूरदर्शिता का है या फिर सुनियोजित रणनीति का हिस्सा या वक्त का तकाजा.. जो दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य दोनों लोकसभा चुनाव हार गए.. तो इसे कमलनाथ का दुर्भाग्य माना जाए या फिर उनकी रणनीति का फेल होना.. जो राहुल गांधी की अपेक्षाओं के अनुरूप कांग्रेस की मध्यप्रदेश में सीट बढ़ना तो दूर इस चुनाव में सिर्फ पिता-पुत्र ही जीत पाए.. सांसद के तौर पर कमलनाथ यदि विधायक का चुनाव जीते तो पुत्र नकुल नाथ संसद में पहुंच गए.. चुनाव तो विवेक तंखा से लेकर अजय सिंह हों या फिर कांतिलाल भूरिया, मीनाक्षी नटराजन और भी दिग्गज नेता हार गए..

इस दौरान कमलनाथ के मंत्रियों के परफॉर्मेंस पर सवाल खड़े हुए.. तो मंत्रिमंडल विस्तार में सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों को प्राथमिकता के साथ मंत्री बनाए जाने की चर्चा जोरों पर है.. कमलनाथ तो उनकी सरकार के लिए अच्छी बात है कि भाजपा का एक विधायक सांसद बन चुका है और संख्या उसकी 108 हो गई.. जबकि कांग्रेस 114 के साथ अतिरिक्त विधायकों के दम पर 121 साबित कर चुकी है.. पिछले 6 माह में लोकसभा चुनाव हारने से ज्यादा चर्चा धड़ल्ले से हो रही ट्रांसफर-पोस्टिंग की..

जिसने पूरे प्रदेश में एक अलग माहौल बनाया तो भाजपा ने इसे एक बड़ा मुद्दा बना दिया है.. कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में तैयार किए गए वचन पत्र और आरोप पत्र दोनों मोर्चे पर अपनी सरकार की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाया.. लेकिन मंत्रियों का विधायक और अधिकारियों से समन्वय का अभाव या फिर कार्यकर्ताओं और जनता के बीच मंत्रियों की अपनी छवि उनका व्यवहार को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं.. मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए एक और सरकार के समर्थन के लिए जरूरी अतिरिक्त विधायकों को मंत्री पद से नवाजना यदि बड़ी चुनौती बना हुआ है.. तो दूसरी ओर लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व खासतौर से सोनिया गांधी और राहुल गांधी से संवाद और समन्वय की कमी परेशानी बढ़ा रही है..

खासतौर से जब यह खबर आई के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर मंत्रिमंडल विस्तार को जरूरी बताया है.. वह भी इस फार्मूले के साथ कि कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य खुद अपने समर्थक मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर करने का रास्ता साफ करें और नए मंत्री बनाए जा सकें.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि  क्या कमलनाथ ने सपा, बसपा, निर्दलीय और जो पहले मंत्री नहीं बन पाए थे उन्हें साधने के लिए यह संदेश दिया है कि इस काम में देरी हो सकती है.. लेकिन नामुमकिन नहीं है.. यानी किसी भगदड़ सरकार को बचाना और भाजपा को कोई मौका नहीं देना.. यह कमलनाथ की रणनीति का हिस्सा है.. मुख्यमंत्री रहते कमलनाथ के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने सरकार के फैसलों को जमीन में उतारना ही नहीं..

बल्कि उसका प्रचार-प्रसार और जनता के बीच में यह धारणा बनाना है कि कमलनाथ सरकार ने जनता के हित में फैसले लिए हैं.. कोई उसकी नीति और नीयत पर सवाल खड़ा नहीं कर सकता.. आने वाले समय में जब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के विकल्प और उत्तराधिकारी को लेकर माथापच्ची खत्म होने का नाम नहीं ले रही.. तब कमलनाथ के उत्तराधिकारी के तौर पर नए मध्य प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष का चयन भी बहुत मायने रखता है.. यानी पिछले 180 दिन में कमलनाथ ने अपनी विशिष्ट और एक अलग कार्यशैली से यदि वचन पत्र को आधार बनाकर सरकार कुछ चलता हुआ दिखाया है तो सरकार के मुखिया यानी खुद कमलनाथ की बुलंदी का खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ रहा है.. इस दौरान कांग्रेस की इंटरनल पॉलिटिक्स में यदि दिग्विजय सिंह कमलनाथ के संकटमोचन और सबसे नजदीकी बनकर उभरे हैं.. ज्योतिरादित्य कमलनाथ की दूरियां बढ़ी हैं..

यही नहीं अजय सिंह हो या सुरेश पचौरी से लेकर अरुण यादव सभी को मध्यप्रदेश की सत्ता में लौटने के बाद अपनी नई भूमिका का इंतजार है.. सरकार में आने के बाद पीसीसी मानो मीडिया प्रमुख शोभा ओझा और प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के मीडिया कोऑर्डिनेटर नरेंद्र सलूजा के कंधों पर आकर टिक गई है.. पदाधिकारियों की नियुक्तियों का अंबार और अब प्रवक्ताओं पर टीवी डिस्कशन में भाग लेने की मनाही चौकाने वाले फैसले सामने आए तो  उसके पदाधिकारियों का का अस्तित्व संकट में आ चुका है.. इस बीच मंत्रियों की अनर्गल बयानबाजी पार्टी का संकट बढ़ाते रहें जिसके लिए फिर गाइडलाइन बनाई गई .. सरकार में आने के बाद  कई मंत्रियों ने  जरूर अपनी पहचान बनाई है..  खासतौर से जीतू पटवारी, जयवर्धन सिंह , बाला बच्चन  ,बृजेंद्र सिंह राठौर , और पी सी शर्मा  ने ..कांग्रेस की कोशिश है कि विधायकों की महत्वाकांक्षाए तो उसके अपने कुनबे से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं की कलह सामने ना पाए.. यही नहीं  सत्ता और संगठन में बेहतर तालमेल बना रहे और राष्ट्रीय स्तर पर संकट के इस दौर में हाईकमान का भरोसा कमलनाथ पर बरकरार रहे...

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