• [WRITTEN BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 12 August, 2019 08:55 AM | Total Read Count 193
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घाटी में इस बार ईद-उज-जुहा की कुर्बानी में घाटी लाल होगी ?

विजय तिवारी

सोमवार यानि 12 अगस्त को केंद्र द्वारा किए गए शांति -व्यवस्था के बंदोबश्त की परीक्षा होगी ! जब घाटी में कर्फ्यू लगा हो और जम्मू में धारा 144 में ढील दी जा रही हो तब आम काश्मीरी कहां से कुर्बानी के लिए बकरे या भेड़ लाएगा, जब जगह - जगह पर वर्दीधारी राइफल लिए हुए उसकी पहचान और काम के बारे में जानकारी मांगी जाये। 

वैसे कश्मीरियों की कुर्बानी की दिक्कत को देखते हुए खबर आ रही है कि  सरकार ने हजारों की तादाद में बकरे और भेड़ तथा लाखों की तादाद में मुर्गों को पहुंचने की बात कही है ! अब सच क्या है वह कहना मुश्किल ही हैं क्योंकि कश्मीर के संचार तंत्र पूरी तरह बंद हैं। ‘द वायर’ के वर्धराजन के हवाले से खबर आ रही हैं कि 10 अगस्त को 8 युवकों को घायल हालत में श्रीनगर के अस्पताल में भर्ती कराया गया।  जिन्हें पेलट के घाव थे ! उधर, अल जज़ीरा के हवाले से खबर है कि घाटी के अनेक स्थानों में प्रदर्शन हो रहे हैं।  जिनमें महलाएं भी शामिल हैं।  अब इन खबरों के संदर्भ में सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल की कुछ काश्मीरियों से बातचीत के वीडियो अथवा केंद्रीय बल की एक महिला सैनिक का बच्चे के साथ का फोटो भी हक़ीक़त से कम प्रचार ज्यादा नज़र आ रहा है।

तब हिंसा के डर के मारे वह हुबक जाता है।  आतंकवादी भी उनके घरों में जबरिया घुसते हैं, राशन -पानी के लिए तो केंद्रीय बल घुसते हैं। हथियार और आतंकवादी की तलाश के नाम पर।  दो पाटों में पिसता घाटी का मुसलमान अब ईद की कुर्बानी का इंतज़ाम कैसे करे ? सरकार का ऐलान है कि श्रीनगर में एटीएम मशीन खुली हुई है ! पर जब बाज़ार ही बंद हो तब एटीएम का क्या लाभ? सड़कों पर कटीली बाड़ और बेरिकेट्स लगे हो तब कैसा त्योहार मनेगा ! जब पाँच -दस आदमियों के इकट्ठा होने पर रोक – टोक हो तो कौन त्योहार की खुशी और कौन कुर्बानी !

अभी तक काश्मीर में 80 हज़ार सैनिक दस्ते और केंद्रीय बल की तैनाती का प्रतिदिन का खर्चा भी पाकिस्तान से एक युद्ध के बराबर है।  एक अनुमान के अनुसार काश्मीर -जम्मू और लद्दाख में सरकार के ही अनुसार इतनी संख्या में बल मौजूद हैं।  इस हिसाब से दो तिहाई बल सिर्फ घाटी में और एक तिहाई बाकी दोनों इलाके में है !

कश्मीर में मौजूदा फौजी बंदोबस्त और चप्पे - चप्पे पर बंदूकधारी वर्दीधारी जवानों और चौराहों पर फौजी वाहन डेट हुए हैं।  ऐसी हालत में आम काश्मीरी राशन और दवा तथा रोज़मर्रा के सामानों की खरीद के लिए मुश्किल से निकलता है। वह कहां  से कुर्बानी के लिए बकरा या भेड़ खरीदने के लिए निकलेगा।  गावों से आने वाले पशुपालक शहर आने इसलिए कतराते है कि थोड़ी - थोड़ी दूर पर राह में फौजी पूछताछ होती हैं।  पहचान बताने के कागज दिखाने होते हैं।  डांट- डपट अलग से।  अब श्रीनगर में तो बकरे पाले नहीं जाते, उन्हें तो बाहर से लाना ही होगा।  परंतु मौजूदा हालत में यह बहुत कठिन है।  12 अगस्त को इस धार्मिक पर्व को क्या काश्मीरी अपने हिस्से की कुर्बानी दे पाएगा ? क्या वह इस्लाम में ज़कात दे पाएगा ? शायद नहीं। 

वैसे प्रधानमंत्री के खास और देश के सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल जी निर्देश दे रहे कि काश्मीरियों को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए,  पर फौजी इंतेजामत कोई ढिलाइ नहीं हो लोगों को एकत्रित नहीं होने दिया जाये।  अब इन्हें कौन बताए कि यह दीपावली नहीं हैं कि घर में अकेले भी दिये जला लो ! कुर्बानी इस्लाम में हर मुसलमान के लिए एक दायित्व है, जैसे नमाज़ और ज़कात।  आमतौर पर कुर्बानी सार्वजनिक स्थान में ही की जाती हैं।  जहां साफ़ -सफाई से कुर्बानी हो सके। अब कुर्बानी के बकरे का खून और खाल का बंदोबस्त भी आमतौर पर मुसलमानों की इंतेजामिया कमेटियां करती हैं।  इसके लिए उन्हंे शहर में कई जगहो में जाना पड़ता है, जहां से खालों को एकत्र कर उनको बेचा जाता हैं।  जिससे बाद में धार्मिक स्थलो की मरम्मत में लगाया जाता है। 

2 : घाटी में कश्मीरी युवकों को शिक्षा और रोजगार के अवसर सुलभ करने का वादा ? जब देश में आई आई एम और आई आई टी तथा डेंटल और पोलेटेक्निक में लड़के एडमिशन नहीं ले रहे हो उस समय एक मात्र सरकारी नौकरी ही शहर बचता हैं।  370 और 35-ए के रहते घाटी की सरकारी नौकरियों में केवल काश्मीर के नागरिक ही आवेदन कर सकते थे।  परंतु अब यह संतुलन बिगड़ेगा, क्योंकि डोंगरी या काश्मीरी भाषा नहीं जानने वाले भी इन नौकरियों के लिए आएंगे।  भले ही केंद्र सरकार कुछ बोल नहीं रही हो परंतु जिस प्रकार कश्मीर पुलिस को निष्क्रिय किए जाने की कवायद की जा रही है, कम से कम वह स्थानीय लोगों का विश्वास जीतने में असफल ही होगी।  इतना ही नहीं अब काश्मीर पुलिस में जम्मू क्षेत्र के लोगों का बोलबाला हो सकता है।  जो धरम और इलाके से अंजान होंगे।  अब ऐसे में क्या मोदी जी अथवा डोभाल साहब का यह कहना कि त्योहार के मौके पर किसी कश्मीरी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए ।महज रसम अदायगी ही लगती हैं। 

अब 12 अगस्त के बाद ही स्थिति साफ होगी कि सरकार के इस कदम को केंद्रीय बलों और सेना के जवानों की मौजूदगी में कितनी और -कैसी शांति बहाल होगी !

राष्ट्र के नाम रेडियो और टीवी चैनलों पर, संसद में गृह मंत्री अमित शाह के बयान को पुनर्भाषित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अनुछेद 370 और 35-ए ने काश्मीर को आतंकवाद और अलगाववाद के सिवा कुछ नहीं दिया। देश के प्रधानमंत्री द्वारा सार्वजनिक तौर पर संविधान निर्माताओं और पूर्ववर्ती सरकारों पर ऐसा कलंक का आरोप शायद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अलावा और किसी ने नहीं किया होगा।

लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप ने सरकार के कदम पर कहा कि 370 अस्थायी उपबंध था ! सच है संविधान में ऐसा ही लिखा है।  परंतु इसके भाग 371 क में नागालैंड के बारे में विशेष उपबंध भी हैं ! 371ख में असम और 371 ग में मणिपुर तथा 371 घ में आंध्रा और तेलंगाना तथा 371 च में सिक्किम एवं 371 छ में मिजोरम और 371 ज अरुणाचल तथा 371 झ गोवा राज्य के बारे में भी अस्थायी और विशेष उपबंध विद्यमान हैं।  इस प्रकार प्रधानमंत्री का यह कथन की अनुछेद 370 और अनुसूची की धारा 35 ए ने अलगाववाद दिया। सही नहीं प्रतीत होता ! क्योंकि इस व्यवस्था द्वारा काश्मीर के लोगों की सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए  निवास, नागरिकता उनके अधिकारों सरकारी नौकरी में अवसरों को दूसरे प्रदेशों के लोगो से रक्षा करने के लिए था, जो महाराजा हरी सिंह ने 1927 की दरबार की शाही आज्ञा का उद्देश्य था।  क्या केंद्र द्वारा नागालैंड, असम, मिजोरम, अरुणाचल और मणिपुर, सिक्किम में लागू अस्थायी और विशेस संवैधानिक उपबंधो को को भी अलगाव वाद और आतंक  का कारण मानते हुए इन्हें समाप्त करेगी ! जिससे कि भारत के नागरिक इन राज्यों में जाकर बस सके। व्यापार कर सके और उद्योग लगा सके, जिससे की स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सके  तथा उनकी आर्थिक हालत में सुधार हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ऐसा करने का साहस नहीं जुटा सकती क्योंकि इन राज्यों में मुसलमानों की संख्या नहीं के बराबर हैं। हाँ ईसाइयों की संख्या अरुणाचल और नागालैंड में बहुतायत से हैं।  परंतु उड़ीसा में पादरी माइकल स्टेंस को जलाने के आरोपी तत्कालीन बजरंग दल के प्रदेश के संयोजक जो अब केंद्रीय मंत्री है प्रताप चंद्र षडगी, सत्ताधारी दल को दुनिया के ईसाई देशों के कोप का ख्याल हैं।  शायद इसलिये और स्थानीय निवासियों के पुरजोर हिंसक -सशस्त्र विरोध के सतत चलते हुए न तो काँग्रेस और न ही अटल बिहारी वाजपाई सरकार इन अस्थायी और विशेस उपबंधों को समाप्त कर पायी।  अब इसे तत्कालीन सरकारों की कायरता कहें अथवा शांति बनाए रखने की कोशिष। यह बहस का मुद्दा हो सकता हैं।  परंतु तथ्य यही हैं।  अब कश्मीर घाटी (जम्मू और लद्दाख छोड़कर) में सूत्रों और खबरों के अनुसार करीब अस्सी हज़ार केंद्रीय सुरक्षा बल और सेना के दस्ते हैं ! आबादी कुल शायद 64 लाख अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह शांति कितने फौजी बूटों और सड़कों पर लगी कंटीली बाधाओं और धारा 144 में मिलने वाले कर्फ्यू पासो से नागरिकों की आवाजही संभव हैं।  शायद धारा 144 में पास का प्राविधान मेरी स्मरण शक्ति में पहली बार सुना है। 

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