• [WRITTEN BY : Ajit Dwivedi] PUBLISH DATE: ; 13 August, 2019 07:13 AM | Total Read Count 271
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सारे सपने पटेल, अंबेडकर के ही!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू कश्मीर के मसले पर देश को संबोधित किया तो कहा कि जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को खत्म करने के फैसले से सरदार पटेल, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी और तमाम राष्ट्र प्रेमियों का सपना पूरा हो गया है। इससे पहले तीन तलाक को अवैध बनाए जाने के मसले पर भी भाजपा के शीर्ष नेताओं ने कहा कि बाबा साहेब का सपना पूरा हो गया। ऐसे ही अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होगा तो निश्चित रूप से कहा जाएगा कि सरदार पटेल का सपना पूरा हुआ।

सवाल है कि भाजपा और उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ ने और उससे भी पहले राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने अपनी सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों का जो भी एजेंडा तय किया उसका सपना क्या सरदार पटेल और अंबेडकर ने देखा था? ये दोनों तो कभी भी संघ या किसी भी हिंदुवादी पार्टी या उनकी विचारधारा से जुड़े नहीं रहे। सरदार पटेल आजीवन कांग्रेस में रहे और महात्मा गांधी के अनुयायी रहे। वे हमेशा पंडित जवाहरलाल नेहरू के भी भरोसेमंद सहयोगी रहे। अंबेडकर आजादी से पहले कांग्रेस में थे और अलग हो जाने के बाद भी जब वे लोकसभा का चुनाव हार गए तो नेहरू ने उनको अपनी सरकार में शामिल किया। सो, उनके सपने को क्यों भाजपा की सरकार पूरे कर रही है,यह समझ से बाहर है। 

दूसरा सवाल है कि क्या सचमुच सरदार पटेल और बाबा साहेब अंबेडकर ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने का सपना देखा था? असलियत इससे बिल्कुल उलट है। सरदार पटेल कश्मीर में अनुच्छेद 370 लगाने के फैसले के साथ थे। वे सरकार के इस फैसले के सहभागी थे। सोचें, वे उस समय इस प्रावधान के समर्थक थे, जब कश्मीर के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा जाता था। जहां तक अंबेडकर का सवाल है तो वे राज्य के बंटवारे के समर्थक थे। पर वे चाहते थे कि कश्मीर घाटी का मुस्लिम बहुल इलाका पाकिस्तान को दे दिया जाए। उनका सपना यह था कि कश्मीर घाटी भारत के साथ नहीं रहे। क्या उनके इस सपने को पूरा करने के बारे में सोचा भी जा सकता है?

कश्मीर के मसले पर बाबा साहेब अंबेडकर क्या सोचते थे, यह उन्होंने 12 अक्टूबर 1951 को पंडित नेहरू की सरकार से इस्तीफा देते समय साफ कर दिया था। उन्होंने कहा था- पाकिस्तान के साथ हमारा झगड़ा हमारी विदेश नीति का हिस्सा है, जिसको लेकर मैं गहरा असंतोष महसूस करता हूं। पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्तों में खटास दो कारणों से है- एक है कश्मीर और दूसरा है पूर्वी बंगाल में हमारे लोगों के हालात। .....और यदि इसे मूल सवाल के तौर पर लें तो मेरा विचार हमेशा से यहीं रहा है कि कश्मीर का विभाजन ही सही समाधान है। हिंदू और बौद्ध हिस्से भारत को दे दिए जाएं और मुस्लिम हिस्सा पाकिस्तान को, जैसा कि हमने भारत के मामले में किया। कश्मीर के मुस्लिम भाग से हमारा कोई लेना देना नहीं है। यह कश्मीर के मुसलमानों और पाकिस्तान का मामला है। वे जैसा चाहें वैसा तय करें। 

जाहिर है अंबेडकर का सपना कश्मीर का विभाजन और घाटी का हिस्सा पाकिस्तान को देने का था। सरदार पटेल का सपना भी इससे मिलता जुलता ही था। वे हमेशा कश्मीर घाटी को भारत के गले की फांस मानते रहे। वह तो नेहरू की जिद थी, जो उन्होंने कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाए रखा। नेहरू ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 370 एक दिन घिसते घिसते खत्म हो जाएगा। इसका जिक्र अमित शाह ने भी संसद में किया। फिर भी अनुच्छेद 370 को खत्म करने को नेहरू का सपना बताने की बजाय क्यों सरदार पटेल और अंबेडकर का सपना बताया जा रहा है, यह समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। असल में पिछले कुछ समय से दलित-मुस्लिम समीकरण की बहुत चर्चा हो रही है। इसे रोकने के लिए अंबेडकर को मुस्लिम विरोधी के तौर पर खड़ा करने का अभियान चल रहा है। 

यह भी पता है कि अंबेडकर पर कोई भी पार्टी सवाल नहीं उठा सकती है। महात्मा गांधी पर एक बार सवाल उठाया जा सकता है पर अंबेडकर पर नहीं क्योंकि गांधी वोट की गारंटी नहीं हैं पर अंबेडकर हैं। इस बीच सरदार पटेल को भी अंबेडकर बनाने का प्रयास शुरू हो गया है। पिछले दिनों लोकसभा में बहस के दौरान कांग्रेस के नेताओं ने जब कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर सरदार पटेल की असली राय सामने रखी तो भाजपा के नेताओं ने पूरा सदन सिर पर उठा लिया था। जैसे अंबेडकर पर सवाल नहीं उठाए जा सकते वैसे ही सरदार पटेल पर भी नहीं उठाए जा सकते।

 

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