• [WRITTEN BY : Ajit Dwivedi] PUBLISH DATE: ; 05 September, 2019 07:18 AM | Total Read Count 150
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कानून के समक्ष समानता एक भ्रम!

उलटी गंगा बहने का मुहावरा पी चिदंबरम के मामले में शत प्रतिशत चरितार्थ होता दिख रहा है। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई ने कहा कि उसे पी चिदंबरम के रिमांड की जरूरत नहीं है और चिदंबरम ने कहा उन्हें अभी रिमांड पर रखा जाए। दिलचस्प यह है कि अदालत ने उनको रिमांड पर रखा भी। इसके पीछे निश्चित रूप से कोई कानूनी तर्क भी होगा पर पहली नजर में ऐसा लग रहा है कि पी चिदंबरम सिर्फ इसलिए रिमांड पर रहना चाह रहे थे ताकि वे सीबीआई के गेस्ट हाउस में रह सकें और उनको तिहाड़ जेल न जाना पड़े। उनके वकील कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने यह दलील भी दी। उन्होंने कहा कि चिदंबरम की उम्र 76 साल है इसलिए उनको तिहाड़ न भेजा जाए। सवाल है कि क्या 76 साल की उम्र के दूसरे लोग रिमांड के बाद जेल नहीं भेजे गए? क्या 76 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोग जेलों में बंद नहीं हैं?

बहरहाल, हो सकता है कि अब तक के सफल प्रयास के बावजूद पांच सितंबर को उनको निचली अदालत से जमानत न मिले और उसके बाद सर्वोच्च अदालत भी उनकी जमानत पर तत्काल विचार न करे। तब उनको जेल जाना होगा। पर अभी तक गिरफ्तारी के बाद करीब दो हफ्ते से वे जेल जाने से बचे हुए हैं। उनकी पहली रिमांड चार दिन की थी और दूसरी रिमांड भी चार दिन की थी। इस आठ दिन के बाद एजेंसी को उनकी रिमांड नहीं चाहिए थे। पर उन्हें रिमांड मिलती रही और जेल जाने से बचे रहे तो इसका कारण यह है कि वे पी चिदंबरम हैं और कपिल सिब्बल व अभिषेक मनु सिंघवी उनके वकील हैं। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष सबकी समानता का प्रावधान करता है पर  वह असल में समानों के लिए समान कानून का प्रावधान है। कुछ लोग आपस में ज्यादा समान होते हैं। उनके लिए एक जैसे कानून होते हैं। असमानों के लिए असमान कानून होते हैं। कानून के समक्ष कुछ असमानता तो संवैधानिक व वैधानिक प्रावधानों के जरिए बनाई गई है। जैसे कई पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ अपने आप मुकदमा नहीं हो सकता, पहले अनुमति लेनी होती है पर कुछ असमानता व्यक्तियों की सामाजिक व आर्थिक हैसियत की वजह से परंपरा से बन गई है। 

चिदंबरम के मामले में यहीं हुआ है। निचली अदालत में उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई होने तक उनको सीबीआई की रिमांड पर रखा गया, जबकि एजेंसी को रिमांड की जरूरत नहीं थी। तभी सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत ने इस आदेश से एक तरह से चिदंबरम को जमानत दे दी है। यह बहुत बड़ी बात है। चिदंबरम को जेल नहीं भेज कर सीबीआई की रिमांड में रखने के फैसले का असर निश्चित रूप से निचली अदालत की सुनवाई पर होगा। निचली अदालतों के जज सर्वोच्च अदालत के फैसलों, टिप्पणियों और उसके रुख पर बारीक नजर रखते हैं। 

बहरहाल, यह एक तात्कालिक मामला है पर पिछले 72 साल में कानूनों पर अमल का ऐसा तौरतरीका विकसित हुआ है, जिसमें अपने आप समानों के लिए समान न्याय की व्यवस्था बन गई है। ऐसा हर मामले में होता है। ट्रैफिक के चालान से लेकर बैंकों की कर्ज वसूली तक के मामलों में समानों के साथ समान व्यवहार होता है। 50 हजार रुपए का कर्ज लेने वाले किसान से वसूली का अलग तरीका है और पांच हजार करोड़ रुपए की कर्ज वसूली का तरीका अलग है।

एलीट यानी अभिजन के साथ अलग बरताव दुनिया के हर समाज की सचाई है पर यह सचाई भारत में कुछ ज्यादा दिखती है। अभिजनवाद का सिद्धांत देने वाले दो महान राजनीतिक विचारकों पैरेटो और मोस्का ने कहा था कि हर पेशे का अपना अभिजन होता है। यहां तक कि अपराधियों और वेश्याओं में भी अभिजन होते हैं। उनका सिद्धांत कहता है कि चाहे जिस पेशे के अभिजन हों वे समान होते हैं और बाकी लोग एक जैसे होते हैं। अभिजनों के मामले में कानूनों का अनुपालन अलग तरीके से होता है और बाकी लोगों के लिए अलग तरीके से। तभी सीताराम येचुरी कश्मीर जाकर अपनी पार्टी के बीमार नेता से मिल आए, जबकि हजारों लोग अपने करीबी रिश्तेदारों से फोन पर बातचीत के लिए भी पिछले एक महीने से तरस गए हैं। 

 

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