• [WRITTEN BY : Pankaj Sharma] PUBLISH DATE: ; 07 September, 2019 08:47 AM | Total Read Count 328
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वैचारिक दीन-ईमान के पिलपिलेपन का युग

सोनिया गांधी का दिल ही जानता होगा कि उन पर क्या बीत रही है! राहुल गांधी का मन सालता होगा कि दस बरस में कैसे-कैसों को माथे चढ़ा लिया! प्रियंका गांधी का दिमाग भन्नाता होगा कि चपड़गंजुओं के घेरे से कांग्रेस को बाहर निकालें तो निकालें कैसे! एक तरफ़ ‘मोशा’-चुनौतियां और दूसरी तरफ़ अपनी मेंढक-टोली। एक को डलिया में रखें तो दूसरा बाहर फुदक जाए और दूसरे को रखें तो तीसरा। बाहर वालों से मोर्चा लेने का तो तब सोचें, जब अपनों को अपनों के ही गिरेबान पकड़ने से फ़ुर्सत मिले। 

ऐसे में कांग्रेस को अंधी खाई से बाहर खींचने के लिए सोनिया-राहुल-प्रियंका भी कौन-सी रस्सी बटें? एक सूबेदार को कुएं की मुंडेर से वापस लाते हैं तो दूसरा रेल की पटरी पर जा कर लेट जाता है। एक क्षत्रप को नसें काटने से रोकते हैं तो दूसरा पंखे से लटक जाता है। एक के हाथ से नींद की गोलियां छीनते हैं तो दूसरा ज़हर का प्याला होठों से लगा लेता है। कितनों को मनाएं? कितनों को समझाएं? कितनों के क्या-क्या नखरे झेलें?

तो कांग्रेस को कांग्रेस बनाए रखने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सोनिया-राहुल-प्रियंका की ही है क्या? हुड्डाओं, तंवरों, सिंहों, सिंधियाओं, नाथों, गहलोतों, पायलटों, जितिनियों, मिलिंदियों, थरूरों, जयरामों, सुबोधकांतों, माकनों, लवलियों, संदीपों--किसी की भी कुछ नहीं? ऐसी बारात ले जाने का बवाल पाल कर कौन सत्ता का समधी बनना चाहेगा? ऐसे ‘राग-दरबारी‘ को कौन पढ़ना चाहेगा? दूसरे तो दूसरे, कांग्रेसी भी नेहरू-गांधियों को जी भर कर गाली दे लें, मगर मन मार कर कांग्रेस के खातिर यह काम करना तो उन्हीं बेचारों को पड़ रहा है।

कांग्रेस ऐसी कांग्रेस हो कैसे गई? विचारधारा से प्रतिबद्धता गुम कैसे हो गई? संगठन से निष्ठा छीज कैसे गई? ज़रा-से हिचकोले खाते ही संकल्प स्खलित कैसे हो गए? यह व्यक्तिगत मूल्यों के क्षरण का नतीजा है या नव-उदारवादी संसार के नए मूल्यों के वरण का परिणाम? यह ठोस सांगठनिक सिद्धांतों के घुलनशील बन जाने का परिणाम है या निजी हवस के बेकाबू हो जाने की नतीजा? यह शिखर-नेतृत्व के भलेपन से उपजी स्थिति है या मध्यम-नेतृत्व के काइयांपन से जन्मी परिस्थिति?

यह जिस वजह से भी है, कांग्रेस की बदनसीबी है। यह उन आम कांग्रेसजन की बदक़िस्मती है, जो कांग्रेस में थे, कांग्रेस में हैं और कांग्रेस में ही रहेंगे। उन्हें नहीं मालूम कि जब तक सूरज-चांद रहेगा, तब तक कांग्रेस का नाम रहेगा या नहीं, मगर उन्हें इतना ज़रूर मालूम है कि कांग्रेस जब तक रहेगी, वे कांग्रेस में ही रहेंगे। इसलिए नहीं कि कांग्रेस अगले दो-पांच साल में नरेंद्र भाई मोदी को पछाड़ कर अपना झंडा लहरा देगी। इसलिए भी नहीं कि अब एक-के-बाद-एक वह देखते-ही-देखते प्रदेशों में सरकारें बनाने वाली है। बल्कि इसलिए कि उनका वैचारिक-सामाजिक दीन-ईमान बाकियों की तरह पिलपिला नहीं है।

लेकिन कांग्रेस के आंतरिक चरित्र में यह पोलापन आया क्यों? यह इसलिए आया कि तात्कालिक कारणों के सामने टिक पाने में कांग्रेस ढीली पड़ गई। सो, वे तमाम लोग कांग्रेस में तरजीह पाने लगे, जो सियासत के कारोबारी थे। उन्हें अपने सिर पर मंडराता देख कांग्रेस की पैदल-सेना हताश होती चली गई। उसे लगने लगा कि ऐसी कांग्रेस के लिए खुद को क्यों खपाएं, जिसे नींव में लगी ईंटों की परवाह ही नहीं है और जो सिर्फ़ रंग-बिरंगे छज्जों के सहारे अपनी इमारत खड़ी रखना चाहती है। 

परदेसी और देसी सामंतशाही से लड़ कर जिस कांग्रेस ने अपने को खड़ा किया था, वह भीतरी सामंतवाद का शिकार हो गई। घूम-फिर कर वे ही चेहरे दशकों तक सिंहासन-बत्तीसी का खेल खेलते रहे और खेल रहे हैं। इसकी शुरुआत आज़ादी मिलते ही हो गई थी। मगर उस जमाने में फिर भी जमे-जमाए और तपे-तपाए चेहरों ने लंबी पारियां खेलीं। बाद में तो बहुत-से बौने उचक-उचक कर सम्राट बनने लगे।

हरियाणा में जनता पार्टी की अपनी पूरी सरकार लेकर भजनलाल जब कांग्रेस की धरती में समाए तो बाद में कुल मिला कर पौने ग्यारह साल मुख्यमंत्री बने रहे। संगठन पर उनका कब्ज़ा तो और भी देर तक चला। बंसीलाल जैसे धाकड़ को साढ़े सात साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी तोड़ने का मौक़ा मिला था। भूपिंदर हुड्डा भी जब मुख्यमंत्री बने तो दो कार्यकाल पूरे कर के ही माने। उनके नौ-दस साल उस युग में आए, जब दिल्ली के आसपास तरक्की की गंगा बह रही थी। इस गंगा में हाथ धोने के बाद कौन भला आदमी संगठन की राजनीति से खुद को अलग कर लेगा? सो भी तब, जब विधानसभा के चुनाव जुम्मा-जुम्मा आठ रोज़ दूर हों। जीत-हार छोड़िए, चुनावी माहौल में चौधराहट करने का ही अपना अलग आनंद है।

महाराष्ट्र भी चुनावों की दहलीज़ पर खड़ा है। कांग्रेस के ज़्यादातर मुख्यमंत्री वहां दो-तीन-चार साल ही अपना सिहासन संभाल कर रख पाए थे। सशवंतराव चह्वाण पौने तीन बरस, शंकरराव चह्वाण दो बरस, वसंत दादा पाटिल टुकड़ो-टुकड़ों में तीन बरस, अब्दुल रहमान अंतुले सवा साल और पृथ्वीराज चह्वाण पौने चार साल अपनी कुर्सियों पर रहे। शरद पवार तक कुल मिला कर पौने सात साल मुख्यमंत्री रह पाए। सिर्फ़ वसंतराव नाइक ग्यारह बरस जमे रह सके।

इस साल के आख़ीर में चुनावों का सामना करने वाले झारखंड में तो आज तक कांग्रेस को खुद का मुख्यमंत्री बनाने का मौक़ा ही नहीं मिला है। जिस बिहार से अलग होकर झारखंड बना, वहां अगर श्रीकृष्ण सिन्हा को छोड़ दें तो बाकी कोई भी कांग्रेसी मुख्यमंत्री दीर्घजीवी नहीं रहा। सिन्हा ज़रूर पंद्रह साल जमे रहे, मगर उसके कारण अलग थे। जगन्नाथ मिश्रा टुकड़ों में साढ़े पांच साल मुख्यमंत्री रहे। बिनोदानंद झा ढाई साल, के. बी. सहाय पौने चार साल और बिंदेश्वरी दुबे तीन साल ही अपने पद पर रह पाए। महामाया प्रसाद सिन्हा तो एक साल भी पूरा नहीं कर सके। दिल्ली में भी चुनाव होने हैं, जहां शीला दीक्षित पूरे पंद्रह साल मुख्यमंत्री बने रहने का कीर्तिमान अपने पीछे छोड़ गई हैं।

जिस मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज राजनीतिक छह साल से ज़्यादा मुख्यमंत्री नहीं रह पाए, द्वारका प्रसाद मिश्र, प्रकाशचंद्र सेठी, श्यामाचरण शुक्ल और मोतीलाल वोरा जैसों का तप-बल कुल मिला कर चार-चार साल में ही समाप्त हो गया, वहां हरफ़नमाला दिग्विजय सिंह ने दस साल पूरे कर दिखाए। आठ महीने पहले मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान में भी कांग्रेस की सरकार बनी है। वहां मोहनलाल सुखाड़िया साढ़े 16 साल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जमे रहे। हरिदेव जोशी भी कुल मिला कर सात साल निकाल ले गए। शिवचरण माथुर को भी टुकड़ों में साढ़े पांच साल मिल गए। अशोक गहलोत भी दो बार में दस साल मुख्यमंत्री रह लिए और अब तीसरी बार फिर हैं।

उत्तर प्रदेश चूंकि नेहरू-गांधी का गृह-राज्य है, इसलिए उसका भी जिक्र ज़रूरी है। कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों में सबसे ज़्यादा लंबे समय संपूर्णानंद ने राज किया सिर्फ़ छह साल। गोविंद वल्लभ पंत पांच साल मुख्यमंत्री रहे। चंद्रभानु गुप्ता टुकड़ों में चार साल। वीरबहादुर सिंह पौने तीन साल। नारायण दत्त तिवारी सवा दो साल। कमलापति त्रिपाठी, हेमवतीनंदन बहुगुणा और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे दिग्गज भी महज दो-दो साल मुख्यमंत्री रह पाए। वैसे ही, जैसे श्रीपति मिश्रा।

मैं तो यह पहेली सुलझा नहीं पाया, आप बताइए कि कांग्रेस को पांच-पांच साल के मुख्यमंत्रियों से फ़ायदा होता है या दस-पंद्रह साल तक जमने वाले मुख्यमंत्रियों से? इतना ज़रूर मुझे लगता है कि कांग्रेस की भावी मजबूती का हल इसी पहेली में कहीं छिपा है कि उसे सरकार और संगठन में अमृतपान कर के आए चेहरों पर सेहरा बांधे रखना चाहिए या अपने समंदर का अमृत-मंथन करते रहना चाहिए? (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

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