• [WRITTEN BY : Ajit Dwivedi] PUBLISH DATE: ; 29 August, 2019 07:00 AM | Total Read Count 229
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संस्थाओं की साख का गंभीर संकट

पहले राजनीतिक दल और नेता या कानूनी विवाद में उलझा हर व्यक्ति यह कहता था कि उसे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। इस देश के हर छोटे-बड़े नेता ने औसतन सौ-सौ बार इस मंत्र का पाठ जरूर किया होगा कि उसे न्यायपालिका पर भरोसा है। लेकिन अब स्थिति बदलने लगी है। देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने पिछले दिनों आधिकारिक रूप से कहा कि उसे न्यायपालिका और मीडिया के एक हिस्से पर भरोसा है। यानी पूरी न्यायपालिका पर भरोसा नहीं रह गया, उसके एक हिस्से पर ही भरोसा है। कांग्रेस ने बहुत जोखिम लेकर यह बात कही है क्योंकि उसके सर्वोच्च नेता से लेकर नीचे तक के दर्जनों नेताओं की किस्मत इस समय न्यायपालिका के हाथ में है। 

कांग्रेस अकेली पार्टी नहीं है, जिसने ऐसा जोखिम लिया है। तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी कहा है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था गुहार लगा रही है पर न्यायपालिका उसके बचाव में आगे नहीं आ रही है। यह कम हैरान करने वाली बात नहीं है कि देश के नामी वकील कपिल सिब्बल ने पी चिदंबरम की जमानत याचिका खारिज करने वाले हाई कोर्ट के जज के फैसले पर सवाल उठाए और दावा किया कि जज ने प्रवर्तन निदेशालय, ईडी की रिपोर्ट को हूबहू अपने फैसले में पढ़ दिया। सिब्बल ने कहा कि जज ने ईडी की पूरी लाइन, कॉमा और फुलस्टॉप के साथ अपनी रिपोर्ट में इस्तेमाल की। उन्होंने यहां तक कहा कि फैसले में अपना दिमाग नहीं इस्तेमाल किया गया।  

कांग्रेस का बयान, ममता की गुहार और सिब्बल के सवाल एक गंभीर संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के ही एक जज ने पिछले दिनों रिटायर होने के बाद बहुत स्पष्ट रूप से कहा था कि कई बार अदालत सरकार के इशारे पर काम करती लगी थी। अगर अदालतें सरकार के इशारे पर काम करने लगें और जज जांच एजेंसियों की रिपोर्ट पर आंख बंद करके भरोसा करने लगें तो यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे विश्वसनीय संस्था की साख के लिए बहुत बुरा संकेत है। ध्यान रहे भारत में न्यायपालिका और सेना इन दो संस्थाओं की विश्वसनीयता सबसे अधिक रही है और इनके बारे में आम धारणा है कि ये दोनों पूरी तरह से अराजनीतिक हैं।

पर दुर्भाग्य की बात है कि न्यायपालिका और सेना दोनों की साख पर गंभीर सवाल उठे हैं। सेना के अधिकारियों की जरूरत से ज्यादा बयानबाजी और राजनीतिक रूप से सही होने की उनकी पोजिशनिंग ने उन पर सवाल खड़े किए हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में इतनी बार भारतीय सेना और भारतीय वायु सेना को मोदी की सेना कहा गया कि भारतीय सेना का अराजनीतिक चरित्र ही कहीं खो गया। हैरानी की बात है कि विपक्षी पार्टियों और सेना से रिटायर चंद अधिकारियों को छोड़ कर किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाया। चुनाव आयोग ने भी इस शिकायत पर कोई कार्रवाई करने की जरूरत नहीं समझी। रही सही कसर सेना के अधिकारियों ने चीन, पाकिस्तान के खिलाफ राजनेताओं की तरह बयानबाजी करके पूरी कर दी। 

जहां तक मीडिया की साख का सवाल है तो वह किसी भी समय के मुकाबले सबसे निचले स्तर पर है। तभी कांग्रेस ने कहा कि उसे मीडिया के एक हिस्से पर ही भरोसा है। पारंपरिक समझ के हिसाब से मीडिया को सत्ता का स्थायी प्रतिपक्ष होना चाहिए। मीडिया का काम सरकार की उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटना नहीं होता है। वह काम सरकार विज्ञापन देकर करती है। मीडिया का काम यह भी नहीं है कि वह विपक्ष की कमियां निकाले। विपक्ष में कमी रही होगी तभी जनता ने उसे हराया है। भारत में उलटा हो रहा है। मीडिया का काम सर्वशक्तिशाली सरकार की जय जयकार करना और हारे, बेदम, पस्त विपक्ष की बखिया उधेड़ना हो गया है। ऐसा करके मीडिया ने खुद अपनी साख गिराई है। दशकों पहले मार्क ट्वेन ने मीडिया का मजाक उड़ाते हुए कहा था- इफ यू डोंट रीड द न्यूजपेपर, यू आर अनइन्फार्म्ड। इफ यू रीड द न्यूजपेपर, यू आर मिसइन्फार्म्ड। उनके इस मजाक को भारतीय मीडिया पूरी तरह से सही साबित कर रही है। 

मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया का गठन हुआ है, जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के जज होते हैं। पर पिछले दिनों कौंसिल ने जम्मू कश्मीर में मीडिया पर लगा पाबंदियों को सही ठहराया। प्रेस कौंसिल ने अपनी तरफ से जाकर पाबंदियों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में बयान दिया। जब इस पर विवाद बढ़ा तो कौंसिल ने बाद में कहा कि वह पाबंदियों के खिलाफ है। यह किसी एक संस्था का मामला नहीं है। ऐसी संवैधानिक और वैधानिक लगभग सारी संस्थाएं इसी तरह अपनी साख गंवाती जा रही हैं। केंद्रीय एजेंसियों की साख तो बची ही नहीं तो उस पर क्या विचार करना!

 

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