• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 21 June, 2019 11:02 AM | Total Read Count 198
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कांग्रेस : ये रिश्ता क्या कहलाता है..!

राकेश अग्निहोत्रीः प्रोटेम स्पीकर के तौर पर 2014 में नरेंद्र मोदी को शपथ दिलाने वाले कमलनाथ 2019 लोकसभा चुनाव से पहले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके.. राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेता.. जिनके दूसरे राजनीतिक दलों के साथ विरोधियों से भी व्यक्तिगत रिश्ते. चर्चा का विषय बनते रहे.. उनकी कार्यशैली.. दूरदर्शिता.. स्वीकार्यता के साथ खासतौर से प्रबंधन क्षमता एक अलग स्टाइल को रेखांकित करती रही.. जिस मैनेजमेंट गुरु की दम पर उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को एकजुट कर एक नई ताकत दी.. उसका एक बड़ा कारण उनका खुद का मध्यप्रदेश में कोई बड़ा गुट नहीं होना था.. सभी से काम लिया और सभी को साथ लेकर न सिर्फ आगे बढ़े..

बल्कि कांग्रेस की सरकार भी बना डाली.. प्रदेश अध्यक्ष रहते उनकी जमावट का नतीजा था कि राष्ट्रीय नेतृत्व ने ज्योतिरादित्य को पीछे रखते हुए कमलनाथ पर दांव लगाया और उन्हें स्वीकार्य मुख्यमंत्री के तौर पर स्थापित किया.. जिनकी लोकप्रियता और साख अब कसौटी पर ..कमलनाथ ने कैबिनेट के गठन में जाति.. वर्ग.. धर्म.. समुदाय.. दिल्ली से तालमेल खासतौर से दिग्विजय और ज्योतिरादित्य को भरोसे में लेकर किया.. सोची-समझी रणनीति के तहत जिन अतिरिक्त विधायकों का समर्थन उन्होंने हासिल किया.. अब उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करने का दबाव कमलनाथ पर बढ़ता जा रहा है.. ऐसे में जब लोकसभा चुनाव के परफॉर्मेंस से हाईकमान संतुष्ट नहीं.. तब मध्यप्रदेश में भी खेमेबाजी खुलकर सामने आ चुकी है..

राहुल गांधी जब पार्टी की कमान छोड़ने का फैसला कर चुके हैं और नए अध्यक्ष और नई व्यवस्था के साथ राहुल गांधी की अपेक्षाएं.. जवाबदेही तय करने की सामने आ चुकी है.. तब मध्यप्रदेश में कांग्रेस के अंदरूनी झगड़े के पीछे नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति से जुड़ती नजर आ रहे हैं.. कुछ विशेष से जुड़े मंत्रियों की बैठक ,डिनर डिप्लोमेसी ,प्रेशर पॉलिटिक्स में तब्दील होती नजर आ रही  जब कैबिनेट में मंत्री अपने मुख्यमंत्री से  भिड़ गए यानी अब समय आ गया जब विधानसभा सत्र से पहले नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के साथ मंत्रिमंडल का विस्तार और अतिरिक्त विधायकों का कैबिनेट में एडजस्टमेंट और चुनौती देने वालों से मुक्ति पाना जरूरी माना जा रहा है.. ऐसे में कांग्रेस नेताओं के रिश्ते और बदलता मिजाज गौर करने लायक है..

मध्यप्रदेश में विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव में कई दिग्गज जिन्हें क्षत्रप तब माना जाता था चुनाव हार चुके .. जिन्हें नई भूमिका की तलाश है.. तो सवाल यहीं पर खड़ा हो रहा है कि क्या हाईकमान के हस्तक्षेप से इन अनुभवी चुनाव और चुके नेताओं की किस्मत पलटेगी या फिर कमलनाथ के रहमोकरम पर ही यह नेता पार्टी की मुख्यधारा में लौट सकते हैं.. चाहे फिर वह मुख्यमंत्री कमलनाथ को ताकत दे रहे सांसद दिग्विजय सिंह हों या फिर पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी से लेकर अजय सिंह.. अरुण यादव ,कांतिलाल भूरिया ही क्यों ना हों.. जिन्हें दिल्ली का वरदहस्त इससे पहले प्राप्त होता रहा है.. लेकिन अब बदलते परिदृश्य में अनुभवी विधायकों के लिए मंत्रिमंडल मे शामिल होना तो चुनाव हार चुके नेताओं के लिए संगठन की कमान गिने-चुने विकल्प के तौर पर है... ऐसे में सवाल राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से राहुल गांधी की मुलाकात हो जाने के बाद आखिर कमलनाथ महत्वपूर्ण फैसले अपने स्तर पर लेंगे या फिर दिल्ली की ओर उनके कदम बढ़ते हुए दिखाई देंगे.. 

मंत्रिमंडल तो बहाना... प्रदेश अध्यक्ष की प्रेशर पॉलिटिक्सः मध्यप्रदेश में कांग्रेस के क्षत्रप कहें या फिर दिग्गज नेताओं के बनते बिगड़ते रिश्ते और भोपाल से लेकर दिल्ली तक उन्हें संरक्षण देने वाले बड़े नेताओं का गुणा-भाग बदलता हुआ नजर आ रहा है.. कमलनाथ का प्रदेश अध्यक्ष बनने से पहले भले ही कोई गुट नहीं था.. लेकिन अब उनका खेमा मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश की राजनीति में नजर आने लगा.. कमलनाथ को आज भी सोनिया गांधी से लेकर उनके समकालीन नेताओं का भरोसा प्राप्त ..तो वह बात और है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से उनकी अपेक्षाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं.. कमलनाथ मुख्यमंत्री के साथ जिस प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे  उसका विकल्प तलाशा जा रहा है.. लोकसभा चुनाव हारने के बाद  दिग्विजय सिंह से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया की दावेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. फिलहाल दिग्विजय सिंह कमलनाथ के सबसे ज्यादा करीब तो ज्योतिरादित्य से उनकी बढ़ती दूरियां चर्चा में हैं.. विधानसभा के साथ लोकसभा चुनाव हार चुके अरुण यादव हों या फिर अजय सिंह के नाम को कमलनाथ और दिग्विजय खेमा आगे बढ़ा सकता..

अजय सिंह यदि सीधे सोनिया गांधी के आज भी संपर्क में  तो अरुण यादव राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं.. जबकि तीसरा बड़ा नाम सुरेश पचौरी 10 जनपद के अपने पुराने रिश्तों के तहत अहमद पटेल से लेकर सोनिया गांधी के सीधे संपर्क में बने हुए.. लेकिन इन नेताओं की दिक्कत यह है कि यह लगातार चुनाव हारते जा रहे.. इसलिए इनके भाग्य का फैसला मुख्यमंत्री कमलनाथ को नजरअंदाज कर हाईकमान करने की स्थिति में नहीं होगा.. लोकसभा चुनाव हार चुके कांतिलाल भूरिया भी इस लाइन में.. लेकिन झाबुआ विधानसभा उपचुनाव में उनकी दिलचस्पी ज्यादा नजर आ रही.. मुख्यमंत्री कमलनाथ के पास विकल्प के तौर पर मंत्रिमंडल के सहयोगी आदिवासी नेता बाला बच्चन उमंग सिंगार और अनुसूचित जाति का प्रतिनिधित्व करने वाले सज्जन सिंह वर्मा का नाम भी आगे बढ़ाने का बचा हुआ है.. जिनका दिल्ली से ज्यादा विश्वास मुख्यमंत्री कमलनाथ पर है..

राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी के अंदर जिस जवाबदेही की बात को आगे बढ़ाया है.. सवाल क्या वह मध्यप्रदेश प्रदेश के नए अध्यक्ष  के चयन में लागू होगी.. खासतौर से तब जब लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस के अलग-अलग खेमे से जुड़े नेताओं के पास सीमित विकल्प रह गए.. सत्ता में भागीदारी हो या फिर संगठन पर कब्जा जब हाईकमान भी मध्यप्रदेश में गुटबाजी पर विराम नहीं लगा पा रहा.. तब सवाल खड़ा होना लाजमी  कि आखिर 15 साल बाद सरकार में लौटी कांग्रेस की दशा पर विरोधियों द्वारा ही नहीं.. पार्टी के अंदर से भी सवाल खड़े किए जा रहे.. तब आखिर उसके भविष्य की दिशा क्या होगी.. कांग्रेस को फैसला करना है कि मध्यावधि चुनाव या फिर अगले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए संगठन को किसी अनुभवी के सुपुर्द किया जाए या फिर युवा.. ऊर्जावान चेहरे को सामने लाकर प्रदेश की सत्ता में रहते कांग्रेस को आगे बढ़ाया जाए.. लेकिन यहीं पर एक साथ कई सवाल खड़े हो जाते हैं..

सरकार बनाने के बाद यदि कई नेता सत्ता में एडजस्ट हो गए तो कई नेताओं को अपनी भूमिका की तलाश है.. 15 साल बाद सत्ता में लौटने के बाद कमलनाथ जिनका अपना कोई गुट नहीं था और समन्वय-असमंजस की सियासत की दम पर उन्होंने कांग्रेस को सरकार में लौटाया.. अब वह भी गुटबाजी से नहीं बच पाए.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि पुरानी और नई पीढ़ी के नेताओं के बीच बढ़ती टकराहट जिससे दिल्ली भी अछूती नहीं.. आखिर मध्य प्रदेश के नेताओं के रिश्ते क्या कहते.. आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है... सत्ता और संगठन के सारे सूत्र फिलहाल कमलनाथ के पास.. जिन पर दबाव कहें या फिर बढ़ती अपेक्षाएं कि वो सरकार को अस्थिरता से बाहर निकाल कर कांग्रेस को आखिर मजबूती कब प्रदान करेंगे..

तो उनसे विधायकों की बढ़ती महत्वाकांक्षा और संगठन की बढ़ती उम्मीदों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. मध्यप्रदेश से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक कमलनाथ ने कांग्रेस की कई पीढ़ियों के साथ ना सिर्फ रिश्तों को मजबूती दी.. बल्कि भरोसे का संकट कभी निर्मित नहीं हुआ.. उनके लंबे सियासी जीवन की पूंजी थी.. जो उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कमान पहले सौंपी गई और बाद में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सत्ता के करीब पहुंचने पर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया.. यही नहीं.. सीएम इन वेटिंग के तौर पर उनके साथ चुनाव में सक्रिय रहने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को किसी अघोषित फार्मूले के तहत ना तो उपमुख्यमंत्री बनाया गया और ना ही अभी तक संगठन की कमान ही सौंपी गई.. पिछले 6 माह में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जितने करीब आए.. ज्योतिरादित्य उतने दूर होते चले गए..

लोकसभा चुनाव हारने के बाद मध्यप्रदेश से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में सिंधिया की नई भूमिका को लेकर सस्पेंस बढ़ता जा रहा है.. यदि ज्योतिरादित्य राहुल गांधी के ज्यादा करीब तो कमलनाथ की सोनिया गांधी से निकटता जगजाहिर है.. कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद व्यक्तिगत स्तर पर कांग्रेस के घोर विरोधी नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह से अपने रिश्तों की एक नई शुरुआत को भी छुपाया नहीं.. परदे के पीछे कांग्रेस के अंदर संगठन को मजबूत करने के लिए जो भी स्िक्रप्ट तैयार की जा रही है उसका इंतजार कमलनाथ को भी है.. उनके उत्तराधिकारी के तौर पर मध्यप्रदेश को नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की तलाश है..

कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ सांसद का चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंच चुके हैं.. कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति हो या फिर राज्यों में कांग्रेस के अंदर बनते बिगड़ते समीकरण.. जिसमें लगभग हर राज्य में पार्टी दो भागों में बंटी नजर आ रही.. कमलनाथ जैसे भारी-भरकम अनुभवी नेता को डिक्टेट करने की हैसियत दिल्ली के किसी नेता में नजर नहीं आती है.. चाहे फिर वह राहुल गांधी के उत्तराधिकारी के तौर पर नई जिम्मेदारी के साथ सामने आ सकने वाले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हों या फिर पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह.. कमलनाथ की सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से मुलाकात की तस्वीरें लोकसभा चुनाव हारने के बाद यदि सामने नहीं आईं तो भी कमलनाथ नीति आयोग की बैठक से पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अशोक गहलोत के साथ बैठक कर कांग्रेस की लाइन को तैयार कर चुके..

कमलनाथ और उनकी सरकार के 6 माह के मूल्यांकन में यदि लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार उनकी दुखती रग  तो उपलब्धि के नाम पर सरकार द्वारा लिए गए फैसलों के साथ सरकार का आगे बढ़ना बहुत मायने रखता है.. ऐसे में दिल्ली के दखल की कल्पना से दूर जब बात मध्यप्रदेश की होगी तो फिर पूरी सियासत कमलनाथ के इर्द-गिर्द सीमित होकर रह गई.. पर्दे के पीछे से निकलकर दिग्विजय और उनके समर्थक विधायक कमलनाथ को यदि ताकत दे रहे हैं तो संगठन और सत्ता की बैठक में अब ज्योतिरादित्य समर्थक मंत्री और विधायक सम्मान, स्वाभिमान, हक और फैसलों की आड़ में विरोध का झंडा बुलंद करने लगे.. हाल ही में कैबिनेट की बैठक से निकलकर आए संदेश इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि फिलहाल पट्ठे जब मोर्चा खोल चुके हैं तब उनके आका के पास क्या विकल्प बचते हैं..

यह सब जो कुछ हुआ और सामने आया तब हो रहा है जब कमलनाथ मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा जोरों पर है और अब सिंधिया समर्थक मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाने के साथ उनके विभाग बदल देने की चर्चा जोरों पर है.. इस पूरे एपिसोड के बाद दोनों खेमों में यदि मोर्चाबंदी तेज हो गई है तो दिल्ली तक पहुंची इस खबर के बाद प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया कोई हस्तक्षेप करते हुए नजर नहीं आ रहे.. यहां पर सवाल खड़ा होता है कि क्या व्यक्ति विशेष के हित से ज्यादा कांग्रेस के भविष्य को लेकर कोई हस्तक्षेप हाईकमान करने की स्थिति में है.. या फिर ऐसे ही चलता रहेगा.. कमलनाथ सरकार के 6 महीने के जश्न को कैबिनेट से निकलकर आई खबर ने फीका करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.. कैबिनेट की बैठक में खुलकर सामने आई कलह  के बाद जब कमलनाथ की नेतृत्व क्षमता और समन्वय की सियासत पर सवाल खड़े हो रहे तब बड़ा सवाल क्या मुख्यमंत्री कमलनाथ ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक प्रद्युम्न सिंह तोमर हो या फिर गोविंद सिंह राजपूत जैसे मंत्रियों को कैबिनेट से बाहर रास्ता दिखाने का साहस जुटा पाएंगे या फिर उनके सिर्फ विभाग बदलकर दूसरे मंत्रियों को भी शक्ति का संदेश देंगे..

तो सवाल यह भी खड़ा होता है क्या यह जितना दिख रहा वही पूरा सच है या फिर इसके पीछे पठ्ठो की राजनीति से आगे छत्रपों के वर्चस्व की राजनीति है.. सवाल यह भी खड़ा होता जब ज्योतिरादित्य पर अपने मोहरों को आगे बढ़ाकर मुख्यमंत्री कमलनाथ पर दबाव बनाने के आरोप लगाए जा रहे तब क्या हाईकमान समय रहते कोई हस्तक्षेप करेगा.. सबसे बड़ा सवाल इस एपिसोड के बाद कमलनाथ का रुख क्या होगा क्या राष्ट्रीय नेतृत्व की अपेक्षाओं के अनुरूप अपनी पुरानी प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका में ज्योतिरादित्य उनके समर्थकों को लेकर आगे बढ़ेंगे या फिर दिग्विजय सिंह से मिल रही ताकत की दम पर वह कोई बड़ा जोखिम मोल लेने का मानस मनाएंगे.. जिसमें समन्वय और समझौते की गुंजाइश खत्म हो जाएगी..

चाहे फिर वह नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का चयन ही क्यों न हो ..क्या कमलनाथ मुख्यमंत्री रहते मध्य प्रदेश में 2 पावर सेंटर बनने देंगे.. देखना दिलचस्प होगा जब राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नाम राष्ट्रीय राजनीति में राहुल के उत्तराधिकारी के तौर पर चर्चा में है और छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष और मुख्य भूपेश बघेल की प्रदेश प्रभारी पुनिया के साथ राहुल गांधी की मुलाकात हो चुकी है ..तब कमलनाथ कांग्रेस और अपनी सरकार को इस संकट से कैसे बाहर निकालते हैं..

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