• [WRITTEN BY : Ajit Dwivedi] PUBLISH DATE: ; 04 September, 2019 07:31 AM | Total Read Count 292
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विचारधारा किस चिड़िया का नाम है?

भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने रविवार को नागपुर में एक कार्यक्रम में मौजूदा राजनीति, दलबदल की घटनाओं और विचारधारा को लेकर बहुत कुछ कहा। उन्होंने पार्टी बदलने वाले नेताओं को धिक्कारते हुए कहा कि वे डूबते जहाज से कूदते हुए चूहों की तरह हैं। उन्होंने एक तरह से अपनी पार्टी को भी निशाना बनाया और कहा कि आज भाजपा की सत्ता है तो ये लोग भाजपा के साथ आ रहे हैं, कल किसी और की सत्ता होगी तो उसके साथ जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि नेताओं को विचारधारा पर टिके रहना चाहिए और सिर्फ सत्ता के लिए दलबदल नहीं करना चाहिए। गडकरी ने कहा कि इतिहास वे लोग नहीं लिखेंगे, जो दलबदल कर रहे हैं, बल्कि इतिहास वो लोग लिखेंगे, जो मुश्किलों के बावजूद अपनी विचारधारा पर टिके रहेंगे। 

गडकरी साहसी आदमी हैं और अक्सर ऐसी बातें कहते हैं, जो पार्टी की राजनीति के लिहाज से सही नहीं होती है। उन्होंने कभी भी पोलिटिकली करेक्ट रहने का प्रयास भी नहीं किया। इसलिए वे दलबदल पर इतनी तीखी बात कह गए। पर सवाल है कि आज विचारधारा क्या है और कहां है, जिस पर कोई नेता टिका रहे? असली संकट ही तो विचार और विचारधारा का है! जब पार्टियों ने ही अपनी विचारधारा छोड़ दी है तो सिर्फ निजी हित साधने के लिए राजनीति में उतरने वाले नेताओं से क्या उम्मीद की जा सकती है! राजनीति और समाज दोनों के आगे आगे मशाल लेकर चलने वाला भी कोई नहीं है, जैसा इस देश में कम से कम पिछले सौ साल में कोई न कोई जरूर रहा है। आजादी से पहले महात्मा गांधी थे तो आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण और विनोबा भावे थे। 

बहरहाल, विचारधारा के अंत की घोषणा दुनिया में पिछली सदी के छठे दशक में हो गई थी। डेनियल बेल ने ‘विचारधारा का अंत’ शीर्षक से लेखों का एक संकलन प्रकाशित किया था। बेल का अपने बारे में कहना था कि वे अर्थशास्त्र में समाजवादी, राजनीति में उदारवादी और संस्कृति में पुरातनवादी हैं। ये तीनों अपने आप में विचार हैं पर बेल ने उत्तर आधुनिकता की बहस के बीच विचारधारा के अंत की घोषणा की थी। हालांकि उसके बाद भी एक विचार के तौर पर समाजवाद, उदारवाद और पुरातनवाद तीनों मौजूद रहे। समय के साथ इनमें थोड़ा बहुत बदलाव होता रहा। दुनिया के परिपक्व लोकतंत्र वाले जिन देशों में राजनीतिक दलों का विभाजन विचारधारा के आधार पर हुआ वहां अब भी वैचारिक विभाजन मौजूद है और नेताओं में दलबदल या वैचारिक भिन्नता वाली पार्टियों में तालमेल सुनने को नहीं मिलता है। 

पर भारत में इस मामले में कमाल हुआ है। यहां नेताओं के विचारधारा छोड़ने से पहले पार्टियों ने अपनी विचाऱधारा छोड़ दी। 1989 में देश में वीपी सिंह की सरकार बनी तो भारतीय जनता पार्टी और दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों ने उस सरकार को समर्थन दिया। बाद में जब भाजपा की सरकार बनी तो डीएमके, तृणमूल कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस जैसी धुर वैचारिक भिन्नता वाली पार्टियां सरकार में शामिल हुईं। कांग्रेस के लिए भाजपा को छोड़ कर कभी भी कोई भी पार्टी अछूत नहीं रही है। भाजपा भी इसलिए अछूत नहीं है कि वह वैचारिक रूप से भिन्न है, बल्कि इसलिए अछूत है क्योंकि वह पिछले तीन दशक से मुख्य प्रतिद्वंद्वी है। केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद उनके भाषणों के आधार पर यह धारणा बनी थी कि वे वैचारिक विचलन वाले नेता नहीं हैं। पर महाराष्ट्र में एनसीपी की मदद से सरकार बनाने और जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ मिल कर सरकार बनाने के बाद यह धारणा भी खत्म हो गई। 

जाहिर है कि भारत में कोई भी पार्टी किसी ठोस वैचारिक धरातल पर नहीं खड़ी है और न किसी पार्टी में ऐसी हिम्मत है कि वह विचारधारा को बचाए रखने के लिए सत्ता को ठोकर मार दे। जब पार्टियों में इतना वैचारिक विचलन है और उनके लिए राजनीति सिर्फ सत्ता हासिल करने का साधन है तो नेताओं से उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वे विचारधारा के लिए सत्ता ठुकरा देंगे। इसलिए वे भी बिना किसी लाज शर्म के दलबदल करते हैं और उनके बारे में सब जानते हुए भी पार्टियां दोनों बांहें फैला कर उनका स्वागत करती हैं।

सो, भले जब डेनियल बेल ने विचारधारा के अंत की बात कही तो वह शब्दों का आडंबर लगा हो पर सचमुच कम से कम भारत में विचारधारा का अंत हो गया है। बेल से बहुत पहले 1882 में फ्रेडरिक नीत्शे ने ईश्वर के अंत की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि ‘ईश्वर मर गया’। 1960 में डेनियल बेल ने विचारधारा के अंत का ऐलान किया और 1992 में फ्रांसिस फुकुयामा ने इतिहास के अंत की घोषणा की। उन्होंने ‘इतिहास का अंत और आखिरी आदमी’ नाम से किताब लिखी। हो सकता है कि विचारधारा का अंत हो गया हो पर इतिहास का अंत नहीं हुआ है और ईश्वर तो भारत में राजनीति का मुख्य विचार हो गया है। 

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