• [EDITED BY : Rakesh Agnihotri] PUBLISH DATE: ; 12 July, 2019 02:13 PM | Total Read Count 227
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दूरियां बन गई नजदीकियां या प्रेशर पॉलिटिक्स..!

राकेश अग्निहोत्रीः कांग्रेस के लिए जब कर्नाटक से लेकर गोवा तक से आ रही बगावत की खबरें उसकी चिंता में लगातार इजाफा कर रही तब मध्य प्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के बीच लंच डिप्लोमेसी ने कहीं ना कहीं एक अच्छी खबर जरूर दी है .. तो दूरियां यदि नज़दीकियों में तब्दील होती नजर आई  तो उसकी वजह थी .. सिंधिया समर्थक मंत्री तुलसी सिलावट के आवास पर खुद मुख्यमंत्री कमलनाथ तो दिग्विजय सिंह समर्थक मंत्रियों और विधायकों का डिनर में पहुंचना..

नाथ और सिंधिया की जो जोड़ी विधानसभा चुनाव के बाद टूट गई थी उसे एक बार फिर मजबूत करने की पहल ज्योतिरादित्य ने दिल्ली से भोपाल आकर कमलनाथ से मुलाकात के साथ अपनी ओर से.. लेकिन समर्थक मंत्रियों की मौजूदगी में प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर अपने चहेते मंत्री के आवास पर डिनर हो या फिर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय ने समर्थकों का जमावड़ा भी गौर करने लायक रहा.. जो सवाल खड़ा करता क्या वाकई में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के बीच दूरियां नज़दीकियों में तब्दील हो जाएंगी या फिर ऐसे सिंधिया की प्रेशर पॉलिटिक्स से इसे जोड़ कर देखा जाएगा..

क्योंकि इससे पहले जब भी एकजुटता दिखाने की बात हुई तो कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के साथ दिग्विजय सिंह ही नहीं विवेक तंखा अजय सिंह और भी दूसरे क्षत्रप एक मंच पर नजर आते रहे.. यह क्षत्रप ज्योतिरादित्य- कमलनाथ के सम्मान में दिए गए भोज में नजर नहीं आए ..

तो देखना दिलचस्प होगा कांग्रेस के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम पर सहमति बनाने के बाद जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है वहां की गुटबाजी कहे या फिर पुरानी और नई पीढ़ी के बीच तकरार और टकराहट खत्म हो जाएगी या फिर मतभेद और खुलकर सामने आने लगेंगे.. क्योंकि ज्योतिरादित्य एक दिन के दौरे के दौरान यदि अपने समर्थक मंत्री विधायक और कार्यकर्ताओं को ताकत दे गए तो कहीं ना कहीं बतौर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी न सिर्फ बड़ा दिल दिखाया जिन पर  दबाव बढ़ गया कि वह सबको साथ लेकर चले.. जिससे कभी भी मध्यप्रदेश में खड़ी हो जाने वाली अप्रिय स्थिति को टाला जा सके.. खासतौर से जब कर्नाटक से लेकर गोवा में कांग्रेस की लगातार भद पिट रही है...

नाथ-सिंधिया के लंच से लेकर डिनर डिप्लोमेसी का मतलब क्या कर्नाटक-गोवा के बाद ‘मध्यप्रदेश’ को लेकर कांग्रेस सतर्कः मुख्यमंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की लंच पर मुलाकात उस वक्त हुई.. तो रात होते-होते  सिंधिया समर्थक मंत्री तुलसी सिलावट के आवास पर आयोजित डिनर में  न सिर्फ मुख्यमंत्री कमलनाथ बल्कि  दूसरे गुटों से जुड़े मंत्री और विधायक भी पहुंचे.. यह सब भोपाल में तब सामने आया जब भाजपा का ऑपरेशन कमल कर्नाटक से गोवा पहुंच चुका..

कर्नाटक के राज्यपाल से कांग्रेस के बागी विधायकों की मुलाकात न्यायालय के हस्तक्षेप से संभव हुई तो विधानसभा अध्यक्ष ने इस्तीफे के मर्जी और दबाव में दिए जाने के परीक्षण की बात कही.. तो दूसरी ओर दिल्ली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को संसद परिसर में इस मुद्दे पर धरना प्रदर्शन को मजबूर होना पड़ा.. 

जब गोवा के 10 कांग्रेस विधायक दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के हाथों भगवा पट्टा गले में पहन रहे.. तभी शिवराज का वीडियो संदेश भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार को अस्थिर करने का भाजपा का कोई इरादा नहीं.. लेकिन यदि अपने बोझ से वह गिर जाए तो तो फिर हम इसके लिए दोषी नहीं.. ऐसे में नई एंट्री कर बसपा सुप्रीमो मायावती ने दलबदल कानून को और सख्त बनाए जाने की मांग कर भाजपा के इस ऑपरेशन की मंशा पर सवाल खड़ा कर एक नई बहस छेड़ी है..

तो दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस को अपना घर नहीं संभाल पाने का दोषी ठहराकर भाजपा के दरवाजे आगे भी दूसरों के लिए खुले रहने के जो स्पष्ट संकेत दिए.. उसे मध्यप्रदेश के कांग्रेस नेताओं खासतौर से कमलनाथ और ज्योतिरादित्य को समझना होगा.. संकट दूर-दूर तक भले ही इन्हें नजर नहीं आता..

लेकिन जिस तरह कमलनाथ पहले ही बहुमत साबित करने की चुनौती स्वीकार कर चुके तो ज्योतिरादित्य ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने का कटाक्ष कर बीजेपी को चुनौती दे डाली कि मध्यप्रदेश में ऑपरेशन कर्नाटक जैसी संभावनाओं  के मुगालते ना पाले.. तो इस मुद्दे पर दिल्ली में एक चैनल में बहस के दौरान बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने मध्यप्रदेश को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले.. लेकिन कॉन्ग्रेस का कोई धनी धोरी नहीं होने का आरोप जरूर लगा दिया..दिल्ली से लेकर कर्नाटक तो संसद के अंदर से लेकर बाहर सड़क पर जब चर्चा कांग्रेस के बागी विधायकों और उनकी भूमिका को लेकर छिड़ी.. 

तब कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया लंबे अरसे बाद भोपाल में सक्रिय नजर आए.. विधानसभा की कार्यवाही के साक्षी बनने के बाद परिसर में ही प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए यदि उन्होंने वर्तमान राजनीति पर अपना पक्ष सामने रखा.. तो अपने इरादे भी इशारों-इशारों में जता दिया.. मीडिया से सवाल जवाब के सिलसिले में दिलचस्पी लेना या फिर हार्ट अटैक से पीड़ित कैमरामैन के स्वास्थ्य जाने के लिए उनका हमीदिया अस्पताल पहुंचना..

इस दौरे के दौरान बदले-बदले नजर आए ज्योतिरादित्य सिंधिया.. प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमलनाथ के साथ लंच में समस्याओं को सामने रखने का जो इशारा किया.. उसके बाद लंच डिप्लोमेसी का महत्व बढ़ गया था.. संभव है उनके अपने क्षेत्र की समस्याएं हों या फिर समर्थक विधायक और मंत्रियों की मुख्यमंत्री कमलनाथ और अपनी सरकार अपेक्षाएं.. 

शायद सिंधिया ने भी इसमें दिलचस्पी ली होगी.. तो इसके अलावा भी विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी द्वारा बनाई गई इस जोड़ी के बीच बदलती भूमिका में कुछ और मुद्दों पर भी संवाद से इंकार नहीं किया जा सकता.. तो सवाल यह भी खड़ा होता है क्या मुख्यमंत्री कमलनाथ जो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से पहले ही इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं..

अपने नए उत्तराधिकारी को लेकर ज्योतिरादित्य को भरोसे में लेंगे या फिर ज्योतिरादित्य को संगठन की कमान संभालने का अपनी ओर से कोई प्रस्ताव भी दे सकते हैं या फिर राष्ट्रीय नेतृत्व की मंशा के अनुरूप यह दोनों नेता मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार को स्थिरता देने के लिए नए सिरे से समन्वय की सियासत करने को मजबूर होंगे.. इन दोनों नेताओं के बीच लंच पर चर्चा का एजेंडा तो नहीं पता.. लेकिन टाइमिंग बहुत मायने रखती है.. 

 जिसकी तस्वीर का मीडिया और कांग्रेस कार्यकर्ताओं का इंतजार रहा.. जैसी तस्वीर कभी कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष घोषित किए जाने के साथ राहुल गांधी ने ज्योतिरादित्य के साथ तिकड़ी बनाकर ट्वीट की थी.. राहुल गांधी ने सिंधिया और नाथ की जोड़ी कोई मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए भेजा था.. लेकिन विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव के बीच न सिर्फ प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया.. बल्कि कांग्रेस के अंदर कभी सियासी परिदृश्य बदल गया.. कमलनाथ से मुलाकात से पहले ज्योतिरादित्य ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए यूं तो हर सवाल का जवाब दिया.. लेकिन अपनी ओर से या फिर पूछे गए सवालों के जवाब में जो संदेश देने की कोशिश की.. उसमें सबसे बड़ा संदेश प्रदेश की कांग्रेस सरकार को कोई खतरा नहीं और भाजपा के मंसूबे कर्नाटक और गोवा की तरह यहां पूरे नहीं होने दिए जाएंगे..

 सिंधिया ने कमलनाथ सरकार से जनता और मीडिया की बढ़ती अपेक्षाओं और वचन पत्र में शामिल मुद्दों पर उसके मूल्यांकन के लिए कम से कम 1 साल का समय दिए जाने की बात पुरजोर तरीके से सामने रखी.. मतलब साफ है कि ज्योतिरादित्य भी समझते हैं कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार कई चुनौतियों से जूझ रही है और जब उस पर वादाखिलाफी के आरोप लगाए जा रहे हैं तो फिर कमलनाथ को कम से कम कांग्रेस के अंदर से तो मजबूती देना ही होगी और शायद वही काम ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किया भी.. मध्यप्रदेश में पिछले दिनों कैबिनेट से मंत्रियों की मत भिन्नता की निकली खबर से जुड़ा सवाल हो या फिर मुख्यमंत्री अधिकारी और मंत्रियों की भूमिका और उनसे अपेक्षा बड़ी बेबाकी से बेहतर समन्वय की आवश्यकता जताई.. कहीं ना कहीं अपने समर्थक मंत्रियों और विधायकों को भी सिंधिया ने ताकत दी.. जो सरकार से जुड़े होने के बावजूद ज्यादा संतुष्ट नजर नहीं आ रहे..

 ज्योतिरादित्य ने राष्ट्रीय राजनीति में राहुल गांधी के इस्तीफे से उपजे संकट पर बिना समय गंवाए जल्द समाधान के लिए जरूरी फार्मूले की आवश्यकता जताई.. युवा और बुजुर्ग के क्राइटेरिया में फंसे राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन से जुड़े सवाल पर भी उन्होंने यही कहा कि जिम्मेदारी निभाने का जज्बा होना चाहिए.. उम्र के मापदंड पर इसे किसी क्राइटेरिया में बांधा नहीं जा सकता.. राहुल गांधी की नई भूमिका को लेकर भी उन्हें भरोसे में लेने की बात कही.. तो कांग्रेस में वर्किंग कमेटी और उसकी भूमिका का भी हवाला दिया.. ज्योतिरादित्य की अगली भूमिका कांग्रेस में क्या होगी.. इसको लेकर उन्होंने अपनी ओर से सत्ता की कुर्सी से अपनी दिलचस्पी को जिस तरह खारिज किया.. उससे लगे हाथ यह संकेत जरूर चला गया कि चुनाव हारने के बाद उन्हें संगठन में अपनी नई भूमिका और दायित्व की तलाश है.. 

तो जिस तरह उन्होंने मध्यप्रदेश में आने वाले समय में अपनी सक्रियता और बढ़ाने के संकेत दिए.. तो लगा कि देर से ही सही ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश का मैदान नहीं छोड़ने का मानस अपनी ओर से बना लिया है.. ध्यान देने वाली बात यह है कि युवा नेतृत्व के नाम पर ज्योतिरादित्य क नाम कभी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष तो प्रदेश में उनके समर्थक प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर आगे बढ़ाते रहे.. लेकिन स्पष्ट तौर पर उन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले.. ज्योतिरादित्य का प्रदेश कांग्रेस दफ्तर पहुंचना और अपने चेंबर से दूरी बनाकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के चेंबर के पास कार्यकर्ताओं से मुलाकात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है उस वक्त दफ्तर में मौजूद राजीव सिंह ,शोभा ओझा, दुर्गेश शर्मा, समेत कई कार्यकर्ताओं और नेताओं ने जो तेरे दिल से मुलाकात जरूर की लेकिन खबर यह भी आ रही कि जिस हाल में कार्यकर्ता उनके समर्थक मौजूद थे वह एसी चालू नहीं किया गया..

 उधर सिंधिया समर्थक मंत्री तुलसी सिलावट के यहां डिनर में दूसरे मंत्री चाहे फिर वह जीतू पटवारी हो या फिर तरुण भनोट समेत कई मंत्री और विधायक भी पहुंचे तो समझा जा सकता है.. कि ज्योतिरादित्य ने गुटबाजी से बाहर कांग्रेस की एकजुटता का संदेश भी इस भोपाल दौरे के दौरान दिया..तो सवाल खड़ा होना लाजमी क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने एजेंडे के तहत खुद भोपाल आए थे..

तो आखिर क्या वह एजेंडा पूरा हुआ... या फिर राष्ट्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद ज्योतिरादित्य को भोपाल आना पड़ा और कमलनाथ से चर्चा भी करना पड़ी.. जो भी हो मीडिया के मार्फत ज्योतिरादित्य ने कमलनाथ सरकार की  मजबूती को अपनी ओर से ताकत दी और भाजपा पर हमला करना नहीं चूके... तो बड़ा सवाल क्या अचानक बदले बदले नजर आए ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मध्य प्रदेश में अपनी जमीन तलाश रहे हैं ..और उनकी नजर अभी भी प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष के पद पर है..

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