• [WRITTEN BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 14 August, 2019 06:44 AM | Total Read Count 106
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कश्मीर का न होने दे अंतरराष्ट्रीयकरण

अजित कुमार

जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को खत्म करना कश्मीर समस्या को हल करने की दिशा में उठाया गया पहला कदम है। इससे विशेष राज्य का दर्जा तो खत्म हो गया और सैद्धांतिक तौर पर भारत के साथ इसका एकीकरण भी पूरा हो गया। पर उसके बाद कई तरह की चुनौतियां हैं, जो भारत के अगले कदम से सुलझेंगी या उलझेंगी। इसमें एक चुनौती कश्मीर के लोगों को भरोसा दिलाने की है कि मुख्य धारा में उनका आना उनके लिए फायदेमंद है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम अपने संबोधन में कहा कि अब जम्मू कश्मीर में एक नए दौर की शुरुआत होगी और विकास की नई कहानी लिखी जाएगी। उनके संबोधन में जो चीजें छूट गई होंगी वे उन्हें लाल किले से 15 अगस्त के भाषण में कह देंगे। सरकार की दूसरी चुनौती अंतरराष्ट्रीय है। पाकिस्तान कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का प्रयास हमेशा करता रहा है। उसे भारत सरकार के कदम से नया मौका मिला है। वह दुनिया के देशों को कश्मीर के बारे में बता रहा है। हालांकि दुनिया अभी उसकी बात सुन नहीं रही है पर यह वक्ती बात है। 

अगर कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हुए और सुरक्षा बलों की तैनाती कम नहीं हुई है और स्थानीय व राष्ट्रीय अखबारों का प्रकाशन शुरू नहीं हुआ तो मुश्किल होगी। इसमें जितनी देरी होगी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका उतना ज्यादा प्रचार होगा। मानवाधिकार का उतना ही बडा मुद्दा बनेगा, जिसका जवाब देना भारत के लिए मुश्किल होगा। भारत हर रिपोर्ट को खारिज करके या उसे गलत बता कर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता है। उसे जमीन पर ठोस बदलाव करके दिखाना होगा। 

बहुत समय नहीं बीता है, जब अमेरिका और दुनिया के ज्यादातर सभ्य देश जम्मू कश्मीर को सबसे खतरनाक जगह मानते थे। अमेरिका के एक राष्ट्रपति ने कश्मीर समस्या को दुनिया और मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। इसका कारण यह था कि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं और दोनों के बीच कश्मीर को लेकर तनाव रहता था। तभी कश्मीर की मामूली से मामूली बात पर भी अतंरराष्ट्रीय बिरादरी चौकन्ना हो जाती थी। धीरे धीरे यह स्थिति बदली पर अब भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच कश्मीर को लेकर यह धारणा है कि ये परमाणु युद्ध शुरू करने का फ्लैशप्वाइंट हो सकता है। 

इस बीच कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने के फैसले के बाद पाकिस्तान और घूम घूम कर दुनिया के बीच भारत विरोधी प्रचार कर रहा है। भले दुनिया के देश अभी पाकिस्तान के प्रचार पर ध्यान नहीं दे रहे हैं और कुछ देशों ने इसे भारत का आंतरिक मामला माना है। फिर भी भारत को प्रभावी तरीके से पाकिस्तान के प्रचार का जवाब देना चाहिए। यह भी प्रयास किया जाना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बने। इस लिहाज से विदेश मंत्री एस जयशंकर की चीन यात्रा की टाइमिंग ठीक नहीं थी। 

जब सरकार को कश्मीर पर फैसला करना था और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाना था तो जयशंकर को चीन नहीं जाना चाहिए था। चीन ने लद्दाख और कश्मीर दोनों का मुद्दा उठाया। भारत को सफाई देनी पड़ी कि इससे वास्तविक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है। फिर भी चीन अभी इस पूरे मामले को लेकर आशंकित बना हुआ है। 

निश्चित रूप से एस जयशंकर बतौर विदेश सचिव बहुत सफल रहे और उन्होंने पिछली सरकार की विदेश नीतियों को दिशा देने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन कश्मीर के फैसले के बाद इस मामले में भारत का पक्ष रखने के लिए बड़ा राजनीतिक व्यक्तित्व होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में सितंबर के अंत में भाषण देना है। पर उससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीतिक नेतृत्व को दुनिया के देशों से संपर्क करना चाहिए। बहरहाल, पाकिस्तान का दुष्प्रचार इस बात पर आधारित होगा कि जम्मू कश्मीर के लोगों के मानवाधिकार का उल्लंघन हो रहा है। ध्यान रहे अमेरिका पहले भी कई बार मानवाधिकारों की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में भारत को बहुत नीचे रखता रहा है। 

पश्चिम के देश सबसे ज्यादा मानवाधिकार उल्लंघन की बातों से प्रभावित होते हैं। जम्मू कश्मीर में हालात सामान्य होने में जितना अधिक समय लगेगा मानवाधिकार को लेकर धारणा उतनी प्रबल होती जाएगी। सो, जल्दी से जल्दी संचार और बुनियादी सेवाएं बहाल करनी होंगी और साथ ही स्थानीय लोगों का भरोसा बढ़ाना होगा ताकि संचार सेवा शुरू होते ही कश्मीर घाटी से भारत विरोधी प्रचार तेज न हो जाए। यह बहुत बारीक काम पर सबसे जरूरी है क्योंकि घाटी में हालात सामान्य रहे तो पाकिस्तान का प्रचार असर नहीं डाल पाएगा। 

कांग्रेस के नेता पी चिदंबरम ने अच्छा नहीं किया, जो उन्होंने कहा कि कश्मीर मुस्लिम बहुल राज्य है इसलिए केंद्र सरकार ने उसका दर्जा बदल दिया। इससे पाकिस्तान और भारत विरोधी दूसरी ताकतों को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में इस प्रचार का मौका मिलेगा कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों को परेशान किया जाता है। पहले से भारत के बारे में ऐसी धारणा बनी हुई है। तभी अमेरिका धार्मिक स्वतंत्रता पर आई पिछली रिपोर्ट में भारत की बहुत खराब रैंकिंग थी।

भारत ने हालांकि इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया पर दुनिया के देश, फंडिंग व रेटिंग एजेंसियां, विदेशी निवेशक आदि अमेरिका की इस रिपोर्ट के आधार पर अपनी धारणा बनाते हैं। सो, भारत को यह मौका भी किसी को नहीं देना होगा कि वह भारत में धार्मिक आधार पर भेदभाव का प्रचार कर सके। इसके लिए भी कश्मीर के लोगों को भरोसे में लेना होगा और उन्हें यकीन दिलाना होगा कि भारत सरकार ही उनका भला कर सकती है। 

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