• [WRITTEN BY : Ajit Dwivedi] PUBLISH DATE: ; 11 September, 2019 06:57 AM | Total Read Count 226
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डर के आगे सरेंडर है!

डर के आगे संभव है कि कहीं कहीं जीत भी हो पर डर के आगे सरेंडर निश्चित रूप से है। तभी लोगों से सरेंडर कराने के लिए जोर शोर से डर का प्रसार किया जा रहा है। केंद्र सरकार के सबसे समझदार और सफल मंत्री नितिन गडकरी ने ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर दस गुना से ज्यादा जुर्माना लगाए जाने पर कहा कि लोगों के मन में डर होना चाहिए। हालांकि एक अमेरिकी लेखक एलेन मूर का कहना है कि लोगों को अपनी सरकार से नहीं डरना चाहिए, बल्कि सरकार को अपने लोगों से डरना चाहिए। पर असल में हमेशा इसका उलटा होता है। लोग सरकार से डरते हैं। और जब सरकार एक नीति के तौर पर डर का प्रसार कर रही हो फिर तो निश्चित रूप से लोग डरते हैं। 

डर का प्रसार कई स्तर पर हो रहा है। एक स्तर केंद्रीय एजेंसियों के सहारे विपक्षी नेताओं को डराने का है तो दूसरा ट्रैफिक जुर्माने के बहाने आम लोगों को डराने का है। अब ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर न्यूनतम जुर्माना एक हजार रुपए का है और अधिकतम 25 हजार रुपए तक। आम आदमी इतना जुर्माना नहीं भर सकता है। सो, सरकार का मानना है कि वह जुर्माने के डर से ट्रैफिक नियमों का पालन करेगा। पर वहां क्या, जहां ट्रैफिक पुलिस नहीं हैं और जहां ट्रैफिक लाइट्स नहीं लगे हुए हैं! वहां तो लोग जागरूक होंगे तभी नियमों का पालन करेंगे! 

परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि हर साल सड़क दुर्घटना में डेढ़ लाख लोग मरते हैं। पर उन्होंने यह नहीं बताया कि ज्यादातर दुर्घटनाएं खराब सड़कों, सड़क पर बने गड्डों, अवैध रूप से बने स्पीड ब्रेकर, खराब ट्रैफिक सिग्नल आदि की वजह से होते हैं। क्या इनके लिए सरकार, सड़क परिवहन विभाग या ट्रैफिक पुलिस पर जुर्माने का कोई प्रावधान है? दिल्ली से सटे नोएडा में ट्रैफिक पुलिस की कार्रवाई के दौरान गौरव शर्मा नाम के युवक की मौत हो गई। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा और इसके लिए किसके ऊपर जुर्माना लगाया जाएगा?

बहरहाल, इन दिनों उत्तर प्रदेश की सरकार पत्रकारों को डराने में लगी है। जनसंदेश टाइम्स नाम के एक अखबार के पत्रकार पवन जायसवाल ने मिर्जापुर के एक गांव में सरकारी स्कूल में मिड डे मील के नाम पर बच्चों को नमक और रोटी खिलाए जाने का खुलासा किया तो उसके ऊपर मुकदमा कर दिया गया। दैनिक जागरण अखबार के आशीष तोमर नाम के पत्रकार ने बिजनौर के एक गांव में एक परिवार को अछूत बनाए जाने और चापाकल से पानी लेने से रोके जाने की खबर बताई। उसने बताया कि गांव के लोगों के बरताव से परेशान होकर महिला ने घर बिकाऊ होने का बोर्ड लगा दिया तो पुलिस ने उसके ऊपर समाज में विद्वेश फैलाने का मुकदमा कर दिया। दो पत्रकारों ने आजमगढ़ में एक स्कूल में बच्चे से पोंछा लगवाए जाने की खबर का खुलासा किया तो उनके ऊपर भी मुकदमा कर दिया गया और खबर का खुलासा करने वाले पत्रकार संतोष जायसवाल को गिरफ्तार कर लिया गया। 

ये तीन घटनाएं काफी हैं यह बताने के लिए राज्य सरकार ने कैसे पत्रकारों के मन में डर बैठाने के लिए कमर कसी है। एक पत्रकार के ऊपर कार्रवाई से बात नहीं बनी तो दो पर कार्रवाई हुई और उससे भी बात नहीं बनी तो तीन पर हुई। पिछले 15 दिन में कुल नौ पत्रकारों पर मुकदमे हुए हैं। यह कार्रवाई आगे जारी रहेगी। सरकारी काम में बाधा डालने, सामाजिक विद्वेष फैलाने, आपराधिक साजिश रचने, रंगदारी मांगने जैसे मामलों में बड़ी आसानी से किसी को भी फंसाया जा सकता है। 

असल में सरकार को देश के बड़े पत्रकारों से ज्यादा खतरा नहीं है और न बड़े मीडिया संस्थानों से खतरा है। असली खतरा ऐसे मुफस्सिल पत्रकारों से है, जो जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं और सरकार के दावों की पोल खोल रहे हैं। वे सरकारों के कथित विकास की विद्रुप तस्वीर लोगों के सामने ला दे रहे हैं, जो कि एक जघन्य अपराध है। सरकार मानती है कि पत्रकारों का काम सिर्फ जयकारे लगाने का होना चाहिए। उनकी कलम सिर्फ गुणगान करने और जय बोलने के लिए चलनी चाहिए। खबरदार अगर सच लिखा तो हालत पवन जायसवाल, आशीष तोमर या संतोष जायसवाल जैसी कर दी जाएगी।

 

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