• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 20 June, 2019 10:49 AM | Total Read Count 404
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इशारों को अगर समझो राज को राज रहने दो...

राकेश अग्निहोत्रीः  मंत्री अपनी बात रखते और मुख्यमंत्री उन्हें तवज्जो देते हैं.. यह बात मीडिया से चर्चा के दौरान मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने सवाल के जवाब में कहीं.. जब उनसे पूछा गया कि क्या कैबिनेट की बैठक में आज मुख्यमंत्री की मौजूदगी में दो अलग-अलग खेमों से जुड़े मंत्री भड़क गए थे.. इस प्रतिक्रिया में भले ही गोविंद राजपूत ने खुलकर अंदर की बात को स्वीकार नहीं किया, तो मना भी नहीं किया.. फिर भी कांग्रेस में गुटबाजी वह भी सरकार का संचालन करने वाले मंत्रियों के बीच खूब चर्चा का विषय बनी.. खासतौर से सोशल मीडिया पर सिंधिया खेमे के मंत्रियों द्वारा अधिकारियों की मनमानी से जुड़े मुद्दे पर मुख्यमंत्री से अपेक्षा  और कार्यशैली पर सवाल खड़ा करने की कैबिनेट के अंदर की इस बात की चर्चा जोरों पर रही.. तो न्यूज़ चैनल पर भी  सामने आ ही गई..

यदि इसे कांग्रेस की गुटबाजी का एक और नमूना कहें या फिर अपनी अहमियत दिखाने की कोशिश को पिछली  कड़ियों से जोड़ा जाए तो फिर यह सरकार के लिए अच्छे संकेत नहीं.. वह भी उस सरकार के लिए जिसे संख्या बल पर विरोधियों से कोई खतरा नहीं.. लेकिन मंत्री खुद अधिकार स्वतंत्रता को मुद्दा वह भी मुख्यमंत्री के सामने बनाएं तो फिर शायद इसे हाईकमान को गंभीरता से लेना चाहिए .. क्योंकि गुटबाजी पार्टी की इंटरनल पॉलिटिक्स जो अब संगठन और दूसरे फोरम से निकलकर कैबिनेट की बैठक में यदि नजर आने लगी है.. तो फिर सवाल सिर्फ समन्वय-सामंजस्य की दुहाई देने वाली कांग्रेस की सियासत पर ही खड़े नहीं होते हैं.. बल्कि मुख्यमंत्री कमलनाथ भी इससे बच नहीं सकते..

जिनकी अपनी स्टाइल से सभी अवगत हो चुकी है और उनका दीर्घ अनुभव और व्यक्तिगत संबंध के साथ दूरदर्शिता का ही नतीजा है कि सरकार 6 माह पूरे कर चुकी... जिन्होंने पिछले 6 माह में हर चुनौती को समन्वय और तालमेल के दम पर निपटाया.. चाहे फिर लोकसभा चुनाव के परिणाम कमलनाथ और कांग्रेस के हक में नहीं गए.. फिर भी अतिरिक्त समर्थन देने वाले विधायक हों या फिर मंत्री पद के दावेदार.. कांग्रेस के महत्वाकांक्षी विधायक सभी को भरोसे में ले रखा है और कोई भी अभी तक कम से कम मुख्यमंत्री के लिए चुनौती नहीं बन पाया.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी कि यदि सिंधिया खेमे के मंत्रियों ने अपने अधिकारों की स्वतंत्रता की आड़ में मुख्यमंत्री की घेराबंदी की कोशिश की है तो क्या आने वाले समय में जब मंत्रिमंडल का विस्तार होगा..

तब कांग्रेस के लिए समस्याओं में इजाफा होने से इनकार नहीं किया जा सकता.. तो बड़ा सवाल कैबिनेट के अंदर जो कुछ हुआ या खबरों में सच्चाई है तो क्या इसे कांग्रेस के इंटरनल पॉलिटिक्स में प्रेशर पॉलिटिक्स से जोड़ कर देखा जा सकता है.. जबकि कर्नाटक कांग्रेस संगठन को एआईसीसी के हस्तक्षेप के बाद बंद किया जा चुका है और मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस में नए प्रदेश अध्यक्ष की तलाश शुरू हो चुकी है.. कमलनाथ सरकार के 6 माह का जश्न मनाए हुए कुछ घंटे ही बीते थे कि राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के जन्मदिन पर मध्यप्रदेश में कांग्रेस के अंदर से गुटबाजी का जिन्न फिर बाहर निकलकर खड़ा हुआ है.. इस बार संगठन और कार्यकर्ता या सार्वजनिक तौर पर किसी बयान से नहीं.. बल्कि बंद कमरे में होने वाली अतिगोपनीय कैबिनेट की बैठक से.. जहां बात इशारों में कही गई तो संदेश यह भी दिया गया कि राज को राज रहने दो..

जहां मंत्री खुलकर दो खेमे में आमने-सामने खड़े नजर आए .. जिन्होंने वहां मौजूद अधिकारियों को भी हैरत में डाल दिया  और फिर खबरें बाहर आ ही गई ...बैठक के ठीक बाद पहले सोशल मीडिया और शाम ढले एक रीजनल चैनल में प्रमुखता के साथ यह खबर सामने आई कि मुख्यमंत्री कमलनाथ को कैबिनेट की बैठक में सिंधिया खेमे के मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर सीधे चुनौती देते हुए नजर आए.. तो लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है और यदि इस बात में और दम है कि प्रद्युम्न सिंह खड़े होकर वॉक आउट करने की स्थिति में थे.. जिन्हें बाद में समर्थन गोविंद सिंह राजपूत से लेकर इमरती देवी ने भी दिया.. तो फिर क्या यह मान लिया जाए कि गुटबाजी चरम पर है..

खबर यह भी निकलकर बाहर आई कि सुखदेव पांसे से लेकर सज्जन सिंह वर्मा जो सीधे कमलनाथ के समर्थक माने जाते हैं.. ने सिंधिया खेमे के विधायकों द्वारा की गई हरकत पर न सिर्फ आश्चर्य व्यक्त किया.. बल्कि सवाल भी खड़ा किया कि आखिर यह क्या हो रहा है.. इस बीच मुख्यमंत्री कमलनाथ को यदि यह कहना पड़ा कि यह आप किसके इशारे पर कर रहे हैं तो फिर समझा जा सकता है कि सिर्फ कांग्रेस में ही नहीं.. बल्कि अब तो कैबिनेट के अंदर भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है.. यहीं पर सवाल खड़ा होता है कि क्या बात निकली है तो दूर तलक जाएगी.. गुटबाजी उफान पर है तो इसकी वजह क्या है सिर्फ अधिकारों और स्वतंत्रता को लेकर मंत्री खुश नहीं है या फिर वाकई मंत्रियों पर लगाम कसी जा रही है जबकि विधायकों को पूरी स्वतंत्रता दी जा चुकी ..

इसके तार पिछले दिनों सिंधिया समर्थक मंत्री के भोपाल निवास पर हुई बैठक और दिल्ली में ज्योतिरादित्य की मौजूदगी में हुई उनके समर्थक मंत्रियों की डिनर डिप्लोमेसी से यदि जोड़ते हैं .. तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या खुलकर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थकों को आगे रखकर मुख्यमंत्री कमलनाथ पर दबाव बनाना तेज कर दिया है.. या फिर  वह इससे अनजान है.. जो इस बीच कोर कमेटी की बैठक में शामिल होने के लिए भोपाल भी आए थे.. सवाल यदि सिंधिया समर्थक मंत्री अपने विभाग और अधिकार को लेकर मुख्यमंत्री कमलनाथ से स्वतंत्रता की अपेक्षा रख रहे हैं तो वजह क्या है.. आखिर इंटरफेयर मुख्यमंत्री का तो बनता है.. लेकिन विभागीय अधिकारियों और थर्ड लाइन का हस्तक्षेप क्या इन मंत्रियों को बर्दाश्त नहीं हो रहा..

क्या फिर इसकी कड़ी ट्रांसफर-पोस्टिंग से जुड़ रही है.. चौंकाने वाली बात यह है कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य समर्थक मंत्री जब कैबिनेट में एक-दूसरे को समझाइश की आड़ में भड़ास निकाल रहे थे.. तब दिग्विजय सिंह समर्थक मंत्री यदि पूरी तरह चुप रहे तो फिर इसकी वजह क्या और इसे कांग्रेस की इंटरनल पॉलिटिक्स में किस तरह से देखा जाए.. इससे पहले कांग्रेस की ही एक बैठक से यह खबर भी निकलकर आई थी कि एक-दो नहीं बल्कि 20 विधायक एक साथ इस्तीफे दे सकते हैं तो कैबिनेट के विस्तार की अटकलों के बीच मुख्यमंत्री कमलनाथ की दिल्ली यात्रा.. राहुल गांधी से मुलाकात नहीं हो पाना.. सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर एक विशेष फार्मूले पर सहमति बनाना क्या इस फार्मूले ने मंत्रियों की बेचैनी बढ़ा दी है कि परफॉर्मेंस को आधार बनाकर उन्हें अगले विस्तार में कैबिनेट से बाहर किया जा सकता है.. भले ही इसके पीछे रणनीति सपा, बसपा और निर्दलीयों को कैबिनेट का हिस्सा बनाकर कांग्रेस और कमलनाथ की सरकार को पूरी तरह से स्थिर साबित करना है..

सवाल यह भी खड़ा किया जा रहा है कि सिर्फ ज्योतिरादित्य और दिग्विजय के कोटे से दो-दो मंत्री कम किए जा रहे तो कमलनाथ के कोटे से ज्यादा मंत्री बने थे तो फिर हटाए जाने के फॉर्मूले का आधार भी कैबिनेट के गठन के कोटे से होना चाहिए.. कैबिनेट की बैठक में मंत्रियों की मुख्यमंत्री से अपेक्षा लाजमी है और ज्यादातर उनकी मांग अपने विभाग के अधिकारियों द्वारा तवज्जो नहीं दिए जाने से जुड़ी रहती है.. शायद मंत्रियों की शिकायत यह है कि उनके विभाग के ट्रांसफर पोस्टिंग में उन्हें भरोसे में नहीं लिया जा रहा ..लेकिन इस बार यदि कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक मुख्यमंत्री कमलनाथ को उनके मंत्री जो अनुभव और वरिष्ठता के मापदंड पर बहुत पीछे खड़े नजर आते..

गुट विशेष के आका और उसके वरदहस्त के चलते यदि बैठक में चुनौती की स्थिति निर्मित कर रहे तो फिर इसे मुख्यमंत्री कहां तक बर्दाश्त करेंगे.. कमलनाथ जिन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री तक के करीब 9 माह के इस सियासी सफर में अभी तक समन्वय-सामंजस्य की सियासत कर न सिर्फ कांग्रेस संगठन को मजबूत कर दिखाया.. बल्कि स्थितियां जो भी बनी सबसे ज्यादा स्वीकार नेता बनकर वह सामने आए.. तो सवाल आखिर अभी तक जो तालमेल प्रदेश अध्यक्ष रहते दिग्विजय सिंह.. ज्योतिरादित्य और दूसरे नेताओं से कमलनाथ बनाने में सफल रहे.. वह मुख्यमंत्री बनने के बाद आखिर क्यों टूटता हुआ नजर आ रहा.. खासतौर से नाथ और सिंधिया की सीएम इन वेटिंग वाली जोड़ी के बीच तालमेल पर सवाल क्यों खड़े हो रहे हैं.. लोकसभा का चुनाव हार जाने के बाद ज्योतिरादित्य को संगठन में नए सिरे से महत्वपूर्ण दायित्व दिए जाने की अटकलों के बीच क्या सिंधिया की मध्यप्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष की भूमिका कमलनाथ को रास नहीं आ रही.. तो उसकी वजह है..

क्या दो पॉवर सेंटर का निर्मित होने के अंदेशे के चलते यह स्थिति बंद पड़ी है या फिर कमलनाथ से ज्यादा दिलचस्पी मध्यप्रदेश के दूसरे नेताओं की है.. जो नहीं चाहते हैं कि ज्योतिरादित्य प्रदेश की राजनीति में लौटें.. चाहे फिर वह संगठन के मुखिया के तौर पर ही क्यों ना हों.. तो बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता  कि फिलहाल कमलनाथ मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों का दायित्व निभा रहे हैं तो कैबिनेट के इस घटनाक्रम के बाद क्या  मंत्री विशेष की कार्यशैली पर सख्त एक्शन लेते हुए उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं.. वह भी तब जब एक एक विधायक की भूमिका सरकार के लिए बहुत मायने रखती है.. यदि इस ओर कमलनाथ विरोधी खेमा एकजुटता के साथ आगे बढ़ता है तो क्या ज्योतिरादित्य के समर्थक मंत्री और विधायक एकता का परिचय देकर फिर प्रेशर पॉलिटिक्स की ओर आगे बढ़ेंगे.. सवाल कई राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों द्वारा इस्तीफा सौंपे जाने के बाद अब जब एआईसीसी के दखल के बाद कर्नाटक में कांग्रेस की कार्यकारिणी भंग कर दी गई है और प्रदेश अध्यक्ष को जिम्मेदारी निभाते रहने का फरमान सुना दिया गया है तो क्या आने वाले दिनों में जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है.. वहां प्रदेश अध्यक्ष बदले जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी.. कर्नाटक में कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार चल रही है और   दिल्ली में अपनी ही पार्टी के सरकार वाले मुख्यमंत्रियों से राहुल गांधी की लोकसभा चुनाव हारने के बाद अभी तक कोई मुलाकात नहीं हुई है.. जबकि जहां कांग्रेस की सरकार नहीं है उन राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों से राहुल गांधी चर्चा कर चुके हैं..

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