• [WRITTEN BY : Ajit Dwivedi] PUBLISH DATE: ; 02 September, 2019 06:51 AM | Total Read Count 171
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हांगकांग में युवा उम्मीदों का आंदोलन!

विलियम वर्ड्सवर्थ ने 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के बारे में कहा था- ब्लिस वाज इट इन दैट डॉन टु बी एलाइव बट टु बी यंग वाज वेरी हेवन यानी उस समय जीवित होना ही वरदान था पर युवा होना तो स्वर्गिक था। असल में यह सिर्फ फ्रांस की रक्तहीन क्रांति का सच नहीं है, बल्कि हर क्रांति का सच है। क्रांति के दौर में युवा होना सचमुच स्वर्गिक होता है और अगर युवा उस क्रांति का नेतृत्व कर रहे हों तो फिर क्या बात है! 

जैसे इस समय हांगकांग में आजादी का आंदोलन चल रहा है। यह युवा उम्मीदों का आंदोलन है। वैसे लड़ाई तो तानाशाही से मुक्ति और लोकतंत्र की है पर उसका नेतृत्व जिन हाथों में है उसे देख कर लगता है कि यह युवा उम्मीदों का आंदोलन है। 22 साल के जोशुआ वोंग इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। सिर्फ 22 साल के युवा! जिस उम्र में दुनिया भर के नौजवान स्नात्तक की परीक्षा पास करके अपने करियर की चिंता में होते हैं या दिशाभ्रम का शिकार होकर अपने ‘अधिकारों’ की लड़ाई के लिए हथियार उठा लेते हैं उस उम्र में जोशुआ वोंग नई सदी की संभवतः पहली और सबसे बड़ी लोकतांत्रिक क्रांति का नेतृत्व कर रहे हैं। इस क्रांति के चरम अवस्था में पहुंचने से पहले वोंग ने स्कॉलरिज्म के नाम से हांगकांग के छात्रों का एक संगठन बनाया था और वे हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक पार्टी डेमोसिस्टो के महासचिव हैं। 

इस लड़ाई में जोशुआ वोंग का साथ दे रही हैं 22 साल की ही एग्नेश चाऊ टिंग। वे वोंग के छात्र संगठन स्कॉलरिज्म की प्रवक्ता रही हैं और उनकी पार्टी डेमोसिस्टो की स्थायी समिति की सदस्य हैं। 28 साल के एंडी चैन, भी इस आंदोलन में वोंग और चाऊ के नेतृत्व का साथ दे रहे हैं। चैन ने हांगकांग में लोकतंत्र बहाली की आवाज उठाने वाली पहली पार्टी हांगकांग नेशनल पार्टी की स्थापना की थी और अभी उसके संयोजक हैं। चीन जैसे लोकतंत्र विरोधी महाशक्ति के आगे 22 से 28 साल के युवाओं का नेतृत्व कब तक संघर्ष करता है और इस संघर्ष का अंत नतीजा क्या होता है यह वक्त बताएगा। पर अभी का वक्त लोकतंत्र पर गर्व करने, जन आंदोलन की ताकत पर खुश होने, युवाओं की शक्ति पर भरोसा करने और लाखों लोगों के लिए एक खूबसूरत भविष्य की उम्मीद पालने का है। 

यह वक्त इतिहास को याद करने का भी है। ऐसे ही सपने लेकर भगत सिंह भी आजादी के आंदोलन में शामिल हुए थे और महज 23 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूमा था। उनके साथ फांसी पर लटकने वाले सुखदेव थापर भी 23 साल के थे और शिवराम राजगुरू तो 22 साल के ही थे। 22-23 साल के उन नौजवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। देश को आजादी मिली पर उनके सपने पूरे नहीं हुए। भगत सिंह ने सिर्फ आजादी का सपना नहीं देखा था। उन्होंने इंसान की बराबरी का सपना देखा था और अंधविश्वासों से मुक्त, वैज्ञानिक सोच वाले एक प्रगतिशील भारत का सपना देखा था। फ्रांसीसी क्रांति के समय भी ऐसे ही स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का सपना देखा गया था। उसके डेढ़ सौ साल बाद रूस की बोल्शेविक क्रांति के समय भी गैर-बराबरी मिटा कर सर्वहारा के शासन का सपना देखा गया था। और अब हांगकांग के नौजवान भी चीन की तानाशाही को खत्म करने और लोकतंत्र की बहाली का सपना देख रहे हैं। कुछ समय पहले अरब देशों में भी लोगों ने ऐसे ही सपने देखे थे। 

बहरहाल, बात युवाओं के आंदोलन और सपनों की चली है तो भारत में हुए इमरजेंसी विरोधी आंदोलन को याद करना चाहिए। वह आंदोलन भी युवाओं ने शुरू किया था। 1974 गुजरात के छात्रों ने महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर नवनिर्माण आंदोलन शुरू किया, जिसकी आंच बिहार पहुंची तो वहां छात्र युवा संघर्षवाहिनी ने इसे आगे बढ़ाया। आंदोलन की कमान बेशक जयप्रकाश नारायण ने संभाली पर आंदोलन की असली ताकत युवा थे। तभी रामधारी सिंह दिनकर की 1946 में लिखी कविता, दूसरी आजादी की लड़ाई का जयगान बनी थी। उन्होंने लिखा था- लौटे तुम रूपक बन स्वदेश की आग भरी कुर्बानी का, अब जयप्रकाश है नाम देश की आतुर हठी जवानी का। पर उस आतुर हठी जवानी को क्या मिला? देश को दूसरी आजादी मिली तो 81 साल के मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने।  

 

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