• [WRITTEN BY : Rakesh Agnihotri] PUBLISH DATE: ; 13 August, 2019 01:08 PM | Total Read Count 142
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'सोनिया' फिर तो कितने मुफीद 'प्रदेश अध्यक्ष 'दिग्विजय'...!

राकेश अग्निहोत्री

कांग्रेस की कमान एक बार फिर सोनिया गांधी के हाथों में आने के साथ बदलते परिदृश्य में कुछ नए सवाल फिर खड़े हो गए .. सवाल  मोदी शाह से लेकर बीजेपी और संघ से  सीधे मुकाबले की  रणनीति पर खड़े हो सकते  लेकिन बड़ी चुनौती  और सवाल कांग्रेस की बदलती व्यवस्था को लेकर अंदर से ही खड़े होते.. सवाल क्या राहुल गांधी का सीधा हस्तक्षेप कांग्रेस की इंटरनल पॉलिटिक्स में कम हो जाएगा या फिर बरकरार रहेगा.. क्या राहुल के साथ कांग्रेस के अंदर असहज महसूस करने वाले पुरानी पीढ़ी के नेताओं के अच्छे दिन फिर आ जाएंगे ..सोनिया गांधी की प्राथमिकता यदि एक बार फिर कांग्रेस का कायाकल्प होगा तो क्या इस बार राहुल की जगह प्रियंका गांधी को भविष्य में पार्टी की कमान सौंपी जाने की पटकथा को क्या वह अंजाम तक पहुंचा पाएंगी...ऐसे में जिस जिम्मेदारी जवाबदेही  का एहसास करा कर अपनों से अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर जिद के चलते राहुल गांधी ने अध्यक्ष का पद छोड़ दिया.. क्या सहयोगियों से वही अपेक्षाएं सोनिया गांधी की अभी भी बरकरार रहेंगी ..या फिर पीढ़ी परिवर्तन की बात पुरानी और नए सिरे से समन्वय और सामंजस्य की सियासत को आगे बढ़ाना कांग्रेस की मजबूरी रहेगी और राहुल के मापदंड अब कोई मायने नहीं रखते... तो बड़ा सवाल मध्यप्रदेश में पूरे फॉर्म में नजर आ रहे पुरानी पीढ़ी के दिग्विजय सिंह हो या फिर नई पीढ़ी के राहुल गांधी दो कदम पीछे आकर सही वक्त पर लंबी छलांग लगाने की कहावत को चरितार्थ करते हुए नजर आएंगे ...तो लाख टके का सवाल यदि सोनिया गांधी कॉन्ग्रेस की कमान संभाल सकती हैं.. तो फिर मध्य प्रदेश में सरकार को स्थिर और संगठन को मजबूत करने के लिए बतौर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिग्विजय सिंह कितने मुफीद साबित हो सकते.. जो कमलनाथ के साथ कदमताल तो कर रहे. फिर भी सूबे की  सियासत में  दखल और प्रतिष्ठा के बावजूद जिन्हें पद के साथ घोषित जवाबदेही क्यों नहीं सौंपी जा सकती.. चाहे फिर वह कमलनाथ के उत्तराधिकारी के तौर पर ही सही प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष की जिम्मेदारी ही क्यों न हो... वह बात और है कि सोनिया गांधी रिटर्न के साथ चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज के लिए कोई नई भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता..

मध्य प्रदेश में 15 साल बाद सरकार में लौटी कांग्रेस के अंदर दिग्विजय सिंह की गिनती  मुख्यमंत्री कमलनाथ के बाद नंबर दो सबसे बड़े नेता के तौर पर होती है .. जिन्होंने  दिल्ली से दूर रहकर  मध्यप्रदेश में सधे हुए कदम आगे बढ़ाकर अपने समर्थकों को एक नई ताकत दी.. जो लोकसभा का चुनाव जरूर हार गए लेकिन रसूख और जलवा जिनका लगातार बढ़ता जा रहा है.. जो कभी मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर अपने फैसले करवाते हैं ..तो परदे के पीछे रहकर उनका हस्तक्षेप मंत्रिमंडल से लेकर बल्लभ भवन और मैदानी क्षेत्र में अधिकारियों की जमावट में उनकी दूरदर्शिता का एहसास कराती है.... जो भोपाल से लोकसभा का चुनाव प्रज्ञा ठाकुर से हारने के बावजूद लगातार क्षेत्र में सक्रिय  तो जिनका राज्यसभा का कार्यकाल खत्म होने वाला है.. आतंकवाद, धारा 370 , आर्थिक मंदी संघ से जुड़े  ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दों पर उनके बेबाक बयान हो उन्हें चर्चा में बनाए रखते हैं.. संघ से लेकर नरेंद्र मोदी हो या फिर अमित शाह से सीधे तकरार को हमेशा तैयार रहते.. मध्य प्रदेश की सियासत में भाजपा सरकार के 15 साल के दौरान विकास की आड़ में कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सवाल खड़े कर वह अपनी मौजूदगी का एहसास लगातार करा रहे ...यही नहीं भोपाल लोकसभा क्षेत्र से चुनाव हार जाने के बावजूद क्षेत्र के विकास के विजन को लेकर अपना दखल बनाए हुए ..यह सच है कि राष्ट्रीय राजनीति से दूरी बनाने के बाद उनके पास कांग्रेस के अंदर भले ही कोई बड़ा पद नहीं है ..बावजूद इसके सुरेश पचौरी से लेकर अजय सिंह अरुण यादव ,विवेक तंखा के मुकाबले उनका जलवा बरकरार... दिग्विजय सिंह ने नर्मदा परिक्रमा के बाद विधानसभा चुनाव के दौरान समन्वयक की भूमिका जिस तरह निभाई उससे एकता का सूत्रपात पार्टी के अंदर हुआ ..कई विरोधी उनके साथ खड़े नजर आए चाहे फिर वह ज्योतिरादित्य सिंधिया  हो या सत्यव्रत चतुर्वेदी से लेकर सुरेश पचौरी और अंचल के दूसरे नेता लेकिन सरकार बनने के बाद कांग्रेस के अंदरूनी समीकरण भी बदल गए.. जो पिछले कुछ सालों के दौरान राहुल के भरोसेमंद बनकर उभरे.. उनके मुकाबले दिग्विजय सिंह की सक्रियता ज्यादा गौर करने लायक है ..ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है... कारण कुछ भी हो जब राष्ट्रीय स्तर पर सोनिया गांधी पर सीडब्ल्यूसी नए सिरे से भरोसा करने को मजबूर हुई ..तो फिर प्रदेश कांग्रेस की कमान अनुभवी दिग्विजय सिंह को क्यों नहीं सौंपी जा सकती ..क्योंकि ज्योतिरादित्य को अध्यक्ष बनाया जाना राहुल गांधी के अध्यक्ष रहते जब संभव नहीं हुआ तो क्या  आदिवासी ,दलित, ब्राह्मण क्षेत्र और जाति के समीकरण पर राजा अपने अनुभव के दम पर भारी साबित नहीं हो सकते.. क्योंकि लोकसभा चुनाव सिर्फ दिग्विजय सिंह नहीं बल्कि ज्योतिरादित्य भी हार चुके.. तो उम्र के मापदंड पर जब सोनिया स्वीकार्य तो फिर दिग्गी राजा को कैसे खारिज किया जा सकता है .. जो मुख्यमंत्री कमलनाथ  के संकटमोचक बने हुए.. जिन्होंने सीएम इन वेटिंग के दो दावेदारों में से ज्योतिरादित्य के मुकाबले कभी कमलनाथ को पहली और आखरी पसंद  बताया था ..तो क्या यह वक्त कमलनाथ को इजाजत देगा कि वह दिग्विजय सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी सुनिश्चित करवाएं.. यह काम राहुल गांधी के रहते भले ही संभव नहीं हो पाया .. और लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद  यह असंभव  हो गया ..लेकिन बदलते परिदृश्य में  अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी के सामने आने के बाद असंभव ही नजर नहीं आता है .. कमलनाथ सरकार के साथ नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए नगरीय निकाय के चुनाव बड़ी चुनौती होंगे ..जो कमलनाथ की नेतृत्व क्षमता और सरकार की लोकप्रियता का आंकलन भी होंगे क्योंकि लोकसभा में 29 में से 28 सीट पर कमल खिला.. पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के साथ राष्ट्रीय महासचिव की बड़ी जिम्मेदारी निभा चुके दिग्विजय के लिए भी बड़ी चुनौती अपनी स्वीकार्यता साबित करने की होगी ..कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की इस जोड़ी से ज्योतिरादित्य और दूसरे दिग्गज नेता शायद खुश नहीं हो लेकिन मोदी और शाह की बीजेपी से निपटने के लिए यह जोड़ी कांग्रेस को एक नई ताकत जरूर दे सकती है.. लेकिन बड़ा सवाल क्या दिग्विजय सिंह यह जोखिम मोल लेंगे जब उनके पुत्र जयवर्धन सिंह कमलनाथ कैबिनेट में मंत्री  और विधायक भाई लक्ष्मण सिंह है.. तब राष्ट्रीय नेतृत्व को दिग्विजय सिंह को बतौर प्रदेश अध्यक्ष कितना रास आएंगे.. क्योंकि इसके साथ ही राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले ज्योतिरादित्य के लिए एक तरह से प्रदेश की राजनीति संभावनाओं पर भी विराम लग जाएगा ...जो सवाल यह भी खड़ा होता  सोनिया गांधी- कमलनाथ की केमिस्ट्री क्या मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लिए नई पीढ़ी को तैयार करेगी या फिर पुरानी पीढ़ी के भरोसे ही  जोखिम मोल ना लेते हो सरकार चलाना और उसके लिए संगठन को मजबूत करना प्राथमिकता बनी रहेगी.. ध्यान रखना होगा दिग्विजय सिंह ने 10 साल सरकार चलाई तो उसके बाद कांग्रेस हार की हैट्रिक बनाने को मजबूर हुई यानी 15 साल बाद कांग्रेस की सरकार में वापसी संभव हो पाई..

मध्यप्रदेश में राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते विधानसभा का चुनाव लड़ा गया ..जिसकी के बिसात अरुण यादव की जगह कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर शुरू की गई थी.. उस वक्त प्रदेश प्रभारी की भूमिका में दीपक बावरिया थे ...जो राहुल गांधी के इस्तीफे के साथ इस्तीफे की पेशकश कर चुके.. इस्तीफा मध्य प्रदेश से लोकसभा का चुनाव हार चुके राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी दिया था जो उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे.. सीडब्ल्यूसी द्वारा एक बार फिर सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाए जाने के साथ मध्य प्रदेश में नए कांग्रेस अध्यक्ष से लेकर प्रदेश प्रभारी को लेकर कयास बाजी शुरू हो चुकी.. कमलनाथ मुख्यमंत्री के साथ फिलहाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं लेकिन मध्य प्रदेश को लेकर कई महत्वपूर्ण फैसले कांग्रेस को जल्द लेना होंगे क्योंकि सरकार बनने के बाद कमलनाथ संगठन के साथ न्याय नहीं कर पा रहे और इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं कमलनाथ सरकार की उपलब्धियों के प्रचार प्रसार में मंत्रियों और विधायकों के साथ जो जिम्मेदारी पदाधिकारियों को निभाना चाहिए वह कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप नजर नहीं आती तो चुनाव के दौरान प्रदेश से लेकर जिला स्तर पर हजारों कार्यकर्ताओं की नियुक्ति ने माहौल पहले ही बदल दिया है.. मंत्रिमंडल विस्तार हो या फिर निगम मंडल की नियुक्तियां ज्यादा दिन तक टाली नहीं जा सकती... चाहे फिर वजह है मंत्रियों का परफॉर्मेंस और चुनाव नहीं लड़ने वाले और चुनाव हार जाने वाली दिग्गजों के साथ दूसरे नेताओं की निगम मंडल में दावेदारी.. भाजपा खेमे से बगावत कर कमलनाथ सरकार को समर्थन देने आए दो विधायकों के एपिसोड के बाद पहले ही सियासत गरमा चुकी है... बसपा सपा और निर्दलीय विधायकों की मंत्रिमंडल में दावेदारी ऐसे में एक नया सिरदर्द बन गई जब कुछ लोगों को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता.. तो सवाल नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उसकी अहमियत का खड़ा हो जाता है.. मुख्यमंत्री कमलनाथ को मजबूती देना या फिर सोनिया गांधी की अपेक्षाओं पर नए सिरे से खड़ा उतर कर दिखाना नए अध्यक्ष के सामने बड़ी चुनौती होगी... वह बात और है कि अमित शाह की बीजेपी के एजेंडे ने जब राज्यों के कांग्रेस  नेताओं के लिए अपने दरवाजे खोल रखे हैं ...तब कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए अनुभवी नेता की दरकार ज्यादा महसूस हो सकती है जो सबको साथ लेकर चल सके... कमलनाथ हो या दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बनने से पहले प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके.. ऐसे में इस पद के महत्व को समझा जा सकता है.. राहुल गांधी की अपेक्षा कमलनाथ लंबे समय से सोनिया गांधी के ज्यादा नजदीक तो ज्योतिरादित्य के मुकाबले दिग्विजय सिंह की कमलनाथ से निकटता किसी से छुपी नहीं.. फिर भी बड़ा सवाल सोनिया गांधी भले ही कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बन गई लेकिन क्या राहुल और प्रियंका जिन्हें अभी भी पार्टी का भविष्य माना जा रहा उनकी पसंद और सलाह को नजरअंदाज कर सोनिया सिर्फ पुरानी पीढ़ी के भरोसे आगे बढ़ेगी.

राहुल गांधी के क्राइटेरिया से  उनके खुद के साथ प्रियंका और सोनिया गांधी   पार्टी की कमान  के दावेदार नहीं थे... बावजूद इसके अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को कांग्रेस वर्किंग कमेटी द्वारा चुना गया .. मतलब साफ सियासत में फैसले परिस्थितियांजन्य लिए जाते हैं.. वह बात और है कि इस प्रक्रिया और उसके निष्कर्ष को लेकर सवाल खड़े किए जा सकते.. तो इसमें संदेश भी एक साथ कई छुपे ..जिसे पुरानी और नई पीढ़ी के कांग्रेस  नेता अपनी सुविधा से आत्मसात कर रहे ..सियासत में सामने आए संकेत जब संदेश और नए फैसलों में तब्दील होंगे.. तब समझ में आएगा कि सोनिया गांधी की कांग्रेस की इस बार आखिर दिशा क्या होगी ..चाहे फिर वह केंद्रीय राजनीति हो या फिर राज्यों की राजनीति .. फिलहाल पुरानी पीढ़ी के नेता राहत महसूस कर रहे खासतौर से जो महत्वपूर्ण पदों पर काबिज है.. राहुल गांधी जिस मोड़ पर कांग्रेस खासतौर से अपनी टीम को मझधार में छोड़ गए क्या मुख्यधारा में वह आगे भी बढ़ते हुए नजर आएंगे या फिर वक्त का तकाजा पुरानी पीढ़ी के नेताओं के नेतृत्व में कांग्रेस को मजबूती देना होगी..सवाल लोकसभा चुनाव और उसके बाद भी धारा 370 खत्म करने के बीच कांग्रेस के अंदर जो भगदड़ मची क्या वह अब रुक जाएगी.. तो उससे भी बड़ा सवाल राज्यों में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए क्या नए चेहरों को सामने लाया जाएगा ..या फिर नया फार्मूला सोनिया रिटर्न यानी पुराने नेता फिर कमान संभालेंगे.. जिन राज्यों में आने वाले समय में विधानसभा चुनाव हैं या फिर जहां कांग्रेस की सरकार ...आखिर वहां द्वंद से पार्टी कैसे बाहर निकलेगी.. जबकि नाराज और उपेक्षित कांग्रेसियों के लिए बीजेपी ने बड़े लक्ष्य को लेकर एक तरह से अपने दरवाजे खोल रखें.. राजस्थान में अशोक गहलोत को सोनिया का तो सचिन पायलट को राहुल गांधी का करीबी माना जाता ..तो इसी तरह 7 मई की कांग्रेस सरकार किस बात की गवाह मध्यप्रदेश में कमलनाथ सोनिया के साथ ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करते रहे.. तो ज्योतिरादित्य सिंधिया की गिनती राहुल के भरोसेमंद नेताओं में होती है .. जो  राहुल गांधी की बस में भले ही दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के साथ लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनाव तक सवार रहे ...लेकिन वक्त है बदलाव का नारा देने वाली कांग्रेस  के अंदर इनके बीच रिश्तो का बदलाव  किसी से छुपा नहीं.. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस का अंदरूनी संकट सोनिया को समय रहते निपटाना होगा... जहां तक बात मध्य प्रदेश की है तो मुख्यमंत्री कमलनाथ अभी भी प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं.. संक्रमण काल में जब राहुल गांधी का इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ और फैसले लिए जा रहे थे तब भी मध्य प्रदेश कांग्रेस को नए अध्यक्ष नहीं मिला.. संदेश यही गया समन्वय और सहमति नहीं बनी तो टकराहट भविष्य की कांग्रेस के लिए कोई नया बखेड़ा खड़ा न कर दे.. जिसके अपने निहितार्थ निकाले गए क्योंकि छत्तीसगढ़ में नया अध्यक्ष सामने आया ..बावजूद इसके मध्य प्रदेश पर फैसले दिल्ली नहीं थोप पाया.. वह बात और है कि कमलनाथ मंत्रिमंडल का विस्तार हो या फिर निगम मंडलों में नियुक्ति राहुल गांधी के अध्यक्ष रहते संभव नहीं हो पाई ..ऐसे में देखना दिलचस्प होगा सरकार और संगठन के बीच समन्वय या फिर संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश का फार्मूला क्या होगा ...चुनौती सोनिया के लिए सिर्फ कॉन्ग्रेस का कायाकल्प ही नहीं बल्कि यूपीए को मजबूत करना भी होगी... बीजेपी एनडीए विरोधी सियासत में सोनिया को भी अच्छी तरह मालूम होगा जब तक अपना कुनबा मजबूत कर पाएंगी तभी सहयोगियों के साथ समन्वय का रास्ता नए सिरे से प्रशस्त होगा..

 

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