• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 18 June, 2019 08:00 AM | Total Read Count 135
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एक साथ चुनाव कैसे होगा?

शशांक राय -- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर एक राष्ट्र, एक चुनाव का विचार ठंड़े बस्ते में झाड़ पोंछ कर निकाला है और इस पर अमल का विचार बनाया है। उन्होंने पिछली बार चुनाव जीतने के बाद भी कहा था कि देश में एक साथ ही चुनाव होने चाहिए। ध्यान रहे भारत में हर साल कोई न कोई चुनाव होता रहता है। हर साल किसी न किसी राज्य में विधानसभा के चुनाव होते हैं। स्थानीय निकायों और पंचायती चुनाव अलग हैं। इसमें समय की बरबादी होती है, संसाधन ज्यादा लगते हैं और हर चुनाव से पहले लगने वाली आचार संहिता की वजह से कामकाज भी ठप्प होता है। 

तभी बरसों से भारत के नेता इस पर विचार कर रहे हैं कि अगर सारे चुनाव एक साथ कराए जाएं तो खर्च, समय सब कुछ बच सकता है। देश सारे समय चुनाव के मोड में रहता है उसे भी बदला जा सकता है। पर सवाल है कि यह काम होगा कैसे? अगर पिछले पांच साल में नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस पहल की होती तो अब तक शायद इसका एक स्वरूप सामने आया होता। पर पांच साल में कोई ठोस पहल नहीं हुई। 

अब प्रधानमंत्री ने 19 जून को सभी पार्टियों के अध्यक्षों की बैठक बुलाई है, जिनके साथ इस विषय पर विचार होगा। अगर इस पर सहमति बनती भी है तो इसकी शुरुआत कैसे होगी और राज्यों के चुनाव किस तरह से कराए जाएंगे, कि अगले लोकसभा चुनाव तक सारे राज्यों के चुनाव एक साथ कराने की स्थिति बने? क्या यह संभव है कि कुछ राज्यों के चुनाव रोक कर और कुछ के पहले करा कर लोकसभा का मध्यावधि चुनाव कराया जाए? इसके आसार कम लग रहे हैं। 

भारत में पहले तीन आम चुनावों के साथ ही राज्यों के विधानसभा चुनाव होते थे। 1952, 1957 और 1962 के आम चुनावों के साथ ही राज्यों के चुनाव हुए थे। पर 1967 से पहले यह क्रम टूट गया। उसके बाद से यह क्रम टूटा हुआ है। यह क्रम टूटने के कई कारण थे। एक कारण तो गठबंधन की सरकारों के समय से पहले गिरने का था तो दूसरा कांग्रेस की केंद्र सरकार द्वारा राज्यों की चुनी हुई सरकारों को बरखास्त करना और राष्ट्रपति शासन लगाना भी था। 

अब स्थिति यह है कि हर बार लोकसभा चुनाव के साथ चार-पांच राज्यों के चुनाव होते हैं और बचे हुए राज्यों के चुनाव अगले पांच साल तक चलते रहते हैं। जैसे अभी लोकसभा के साथ आंध्र प्रदेश, ओड़िशा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के चुनाव हुए। तेलंगाना का चुनाव भी लोकसभा के साथ ही होना था पर वहां की सरकार ने विधानसभा भंग करके पहले ही चुनाव करा लिया। बहरहाल, लोकसभा चुनाव के चार महीने बाद झारखंड, महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव होने हैं। अगले साल दिल्ली और बिहार के चुनाव हैं। 

उसके बाद 2021 में केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम आदि के चुनाव हैं। 2022 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात आदि के अलग अलग चुनाव हैं। 2023 में कर्नाटक, राजस्थान, मध्य  प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलग अलग चुनाव होंगे और फिर 2024 में लोकसभा का चुनाव आ जाएगा। 

अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पहले कार्यकाल में ईमानदार और ठोस पहल की होती तो इस साल अक्टूबर में चुनाव कराने की जरूरत नहीं रह जाती। जिन राज्यों में अक्टूबर में चुनाव होने हैं वे सारे भाजपा शासित राज्य हैं। अगर मोदी सचमुच गंभीर होते तो महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा के चुनाव लोकसभा के साथ करा लेते। जम्मू कश्मीर के चुनाव भी साथ ही कराए जा सकते थे। 

सरकार अगर गंभीर होती तो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव थोड़े दिन टालने का प्रयास करती। ध्यान रहे ये चुनाव पिछले साल के अंत में हुए। अगर सरकार ऐसा करती तो इस लोकसभा के साथ 11 राज्यों के चुनाव हो जाते। उन्हें दिल्ली और बिहार के चुनाव भी साथ कराने का प्रयास करना चाहिए था। पर वह नहीं हुआ। न कोई चुनाव टाला गया और न कोई चुनाव समय से पहले कराया गया। तभी यह सवाल उठता है कि क्या सचमुच सरकार की मंशा एक साथ चुनाव कराने की है? 

अब कहा जा सकता है कि जब जागे तभी सबेरा। पर उसके लिए भी सरकार को विपक्ष के साथ सहमति बना कर ठोस कार्य योजना पेश करनी होगी। सरकार चाहे तो अगले साल के अंत में होने वाले बिहार चुनाव को टाले और 2021 के पांच राज्यों के साथ कराए। अच्छा होगा अगर 2022 में होने वाले चुनावों को भी 2021 में कराया जाए। और 2023 में होने वाले चार-पांच राज्यों के चुनाव को एक साथ जोड़ा जाए और लोकसभा चुनाव समय से पहले कराया जाए। 

लोकसभा चुनाव के आगे पीछे होने वाले सारे चुनावों को इसके साथ जोड़ दिया जाए। ऐसा करने पर ही 2023 में लोकसभा और सभी राज्यों के चुनाव साथ कराए जा सकते हैं। ऐसा करने के बाद इसके नियम बनाने होंगे ताकि विधानसभाओं और लोकसभा का पांच साल का कार्यकाल तय किया जा सके। हालांकि इसे लेकर लोकतंत्र के कई बुनियादी सवाल उठेंगे पर अगर कानून बना कर ऐसा नहीं किया गया तो फिर धीरे धीरे चुनाव की गाड़ी उसी पटरी पर लौट आएगी। 

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