• [WRITTEN BY : Ajit Dwivedi] PUBLISH DATE: ; 20 August, 2019 07:13 AM | Total Read Count 170
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एक देश एक चुनाव की पहल कब?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अपने छठे भाषण में फिर एक देश, एक चुनाव की बात कही। वे 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से यह बात कह रहे हैं पर इस पर अमल को लेकर कोई ठोस पहल अभी तक नहीं हुई है। उनके पहली बार प्रधानमंत्री बनने से लेकर दूसरी बार शपथ लेने तक देश में चुनावों का एक चक्र पूरा हो गया। लोकसभा के दो चुनावों के बीच पांच साल में देश के सभी राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए। पर एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी इन चुनावों को एक साथ कराने के लिए जुबानी जमा खर्च के अलावा कोई ठोस प्रयास कर रही है। 

तभी जब फिर से प्रधानमंत्री ने एक देश, एक चुनाव की बात कही है तो यह सवाल उठा कि इसकी शुरुआत कैसे और कब होगी? क्या अगले छह महीने में होने वाले विधानसभा चुनावों में इसकी ठोस पहल हो जाएगी? हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल अगले छह महीने में पूरा होने वाला है। जम्मू कश्मीर में भी राष्ट्रपति शासन है और चुनाव आयोग वहां भी चुनाव कराने को तैयार था। पर बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए जम्मू कश्मीर का मसला छोड़ दें तब भी कम से कम चार राज्यों में एक साथ चुनाव हो सकते हैं। 

पर ऐसा लग रहा है कि जिस तरह पिछली बार इन चार राज्यों में तीन बार में अलग अलग चुनाव हुआ वैसा ही इस बार भी होगा। पहले अक्टूबर में हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव होंगे, फिर नवंबर-दिसंबर में कई चरणों में झारखंड के चुनाव होंगे और फिर फरवरी में दिल्ली के चुनाव होंगे। अगर सरकार सचमुच एक देश, एक चुनाव के जुमले को लेकर गंभीर है तो उसे इस साल इस फार्मूल पर अमल शुरू करना चाहिए। तीन राज्यों में खुद भाजपा की सरकार है। एक केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से बात करें और एक साथ चुनाव के लिए तैयार करें। चुनाव आयोग से बात करके और सभी पार्टियों की सहमति बना कर यह काम किया जा सकता है। य़ह अच्छा और सबसे आसान मौका है, जहां से शुरुआत हो सकती है। 

अगर इस बार सरकार ने शुरुआत कर दी तो आगे के चुनावों का रास्ता बनता जाएगा। पहले चरण में सरकार और चुनाव आयोग के लिए सारे चुनाव एक साथ कराने संभव नहीं है। पहले चरण में इसे दो बार में कराया जा सकता है। इसके लिए एक फार्मूला यह बन सकता है कि अगले साल के आखिर में होने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव को थोड़ा टाला जाए। राज्य में विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने के बाद राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए और 2021 में होने वाले पांच राज्यों के साथ उसका चुनाव कराया जाए। 2021 में पांच राज्यों- पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पुड्डुचेरी और असम में चुनाव होने वाले हैं। इसके अगले साल यानी 2022 के शुरू में पांच राज्यों- उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में और 2022 के आखिर में गुजरात व हिमाचल प्रदेश के चुनाव होंगे। इन सात राज्यों के चुनाव को समय से पहले कराने की पहल हो। यानी अगर गंभीरता से पहल हो और सर्वदलीय बैठक बुला कर सहमति बनाई जाए तो 2021 के मध्य में 13 राज्यों में चुनाव हो सकते हैं। 

ध्यान रहे इन 13 राज्यों में से नौ राज्यों में भाजपा या उसकी सहयोगी पार्टियों की सरकार है, जिन्हें समय से पहले या बाद में चुनाव कराने के लिए तैयार करना मुश्किल नहीं होगा। बाकी बचे हुए चार राज्यों- केरल, पश्चिम बंगाल, पुड्डुचेरी और पंजाब के लिए कांग्रेस, लेफ्ट और तृणमूल से बात करनी होगी। अगर भाजपा अपने शासन वाले राज्यों में समय से पहले चुनाव के लिए तैयार होगी तो बाकी पार्टियों को भी तैयार कराया जा सकता है। अगर ठोस पहले हो तो 2021 में पहले चरण में 13 राज्यों के चुनाव होंगे और 2023 में लोकसभा के चुनाव एक साल पहले करा कर बाकी राज्यों के विधानसभा चुनाव उसके साथ हो सकते हैं। पर इसके लिए अपनी कही बात के लिए प्रतिबद्धता और मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत होगी और साथ ही एक विशाल बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी। यह फिलहाल तो नहीं दिख रहा है। 

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