• [WRITTEN BY : Balbir Punj] PUBLISH DATE: ; 08 September, 2019 06:22 AM | Total Read Count 210
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पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम का मतलब तो...

बलबीर पुंज

‘हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और’- यह कहावत पाकिस्तान पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। गत सप्ताह जब करतारपुर साहिब गलियारे को लेकर भारत और पाकिस्तान के पदाधिकारी बैठक कर रहे थे, तब उसी कालखंड में सिख पंथ के संस्थापक गुरु नानक देवजी की जन्मस्थली ननकाना साहिब के निकट के एक गुरुद्वारे के ग्रंथी की 19 वर्षीय बेटी- जगजीत कौर का इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा जबरन मतांतरण के बाद मुस्लिम युवक से उसका निकाह कर दिया गया। इसी तरह, सिंध में भी एक और हिंदू युवती रेणुका कुमारी, जगजीत जैसी नियति की शिकार हो गई। 

आखिर पाकिस्तान का रवैया- ‘मुंह में राम और बगल में छुरी’ जैसा क्यों है? एक तरफ यह इस्लामी देश करतारपुर गलियारे को मूर्त रूप देने की बात करता है, तो दूसरी तरफ गुरु के सिखों की अस्मत के साथ खिलवाड़ जारी रखता है। यह विरोधाभास क्यों? इस इस्लामी देश को जन्म देने वाले चिंतन और उसे एक राष्ट्र के रूप में जीवित रखने की प्राणवायु विकृत ‘काफिर-कुफ्र’ दर्शन से मिलती है। इसलिए इस देश में केवल "सच्चे मुस्लिम" को सामान्य जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है, जबकि शेष गैर-मुस्लिमों (इस्लाम से निष्काषित अहमदिया समुदाय आदि सहित) को इससे वंचित रखा जाता है और इस्लामी वैचारिक दर्शन के अनुरूप उनका काफिर होने के नाते उत्पीड़न किया जाता है। 

सच तो यह है कि पाकिस्तान सत्ता-अधिष्ठान अपने आधारभूत चिंतन के कारण ‘काफिर’ भारत की एकता और अखंडता को नष्ट करके, उसे दार-उल-इस्लाम में परिवर्तित करने के सदियों पुराने अधूरे अभियान को पूरा करना चाहता है। जब चारों प्रत्यक्ष युद्ध में उसे मुंह की खानी पड़ी, तो उसने अपने इसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु 1980 के दशक में पहले विकृत खालिस्तान आंदोलन को जन्म दिया और अब उसे संरक्षण दे रहा है। चाहे कनाडा हो या फिर ब्रिटेन- वहां बसे अलगाववादी तत्वों को आई.एस.आई. प्रोत्साहित करता रहता है। उसी कड़ी में करतारपुर साहिब गलियारे को पाकिस्तान नेतृत्व द्वारा प्राथमिकता देना किसी प्रकार सद्भाव या समरसता का प्रतीक ना होकर विशुद्ध रूप से भारत विरोधी एजेंडे का ही विस्तृत रूप है- जिससे अधिकतर भारतवासी आज परिचित भी है। 

यह प्रपंच भले ही पाकिस्तानी सत्ता-अधिष्ठान के शीर्ष स्तर पर बुना जा रहा हो, किंतु वहां के सामान्य लोग इस षड़यंत्र से अनजान है। वहां की जनसंख्या का बहुत बड़ा वर्ग स्वयं को क्रूर मोहम्मद बिन कासिम, गजवनी, गौरी, बाबर, औरंगजेब आदि का वंशज मानता है, जिन्होंने अपने जीवनकाल में "काफिर"- हिंदू, सिख सहित अन्य गैर-मुस्लिमों के खिलाफ मजहबी अभियान चलाकर उन्हे मौत के घाट उतारा था, तलवार के बल पर उनका मतांतरण किया और उनके पूजास्थलों को जमींदोज किया था। पाकिस्तान में जगजीत कौर या रेणुका कुमारी का मामला, उसी विषाक्त चिंतन का परिचायक है। 

आखिर इन दोनों के साथ क्या हुआ था? जहां 27-28 अगस्त को ननकाना साहिब स्थित गुरुद्वारा तंबू साहिब के ग्रंथी की बेटी जगजीत कौर का अपहरण के बाद जबरन मतांतरण और मुस्लिम युवक से निकाह कर दिया गया, तो उसके कुछ घंटे बाद 31 अगस्त को सिंध प्रांत के सुक्कुर में हिंदू लड़की रेणुका कुमारी का उसी शिक्षण संस्थान से अपहरण करके इस्लाम मतांतरित कर दिया गया, जहां वह स्नातक शिक्षा ग्रहण कर रही थी। यह दोनों मामले पाकिस्तान के लिए नए नहीं है। अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ी हजारों लड़कियों का इसी तरह जबरन मतांतरण कर निकाह किया जा चुका है।

पाकिस्तान में येन-केन-प्रकारेण, जब भी इस प्रकार के मामले में सामने आते है, तो मजहबी कारणों से इसकी अनदेखी कर दी जाती है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर से आवाज उठती है, तो जांच के नाम पर खानापूर्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं किया जाता। अभी जब जगजीत मामले में भारत की ओर से सख्त कार्रवाई की मांग हुई, तब स्थानीय प्रशासन ने कार्रवाई का नाटक करते हुए दावा किया कि जगजीत ने अपनी इच्छा से मुस्लिम युवक मोहम्मद अहसान से निकाह किया है और वह अब अपने घर लौटना नहीं चाहती है। इस पृष्ठभूमि में क्या यह सत्य नहीं कि सोशल मीडिया पर वायरल तथाकथित "कबूलनामा" वीडियो में जगजीत कौर के चेहरे पर दिख रहा भय और दवाब का भाव, सच्ची कहानी को बयां कर रहा है? 

पाकिस्तान की नीयत तो उसके मिसाइल कार्यक्रम से भी झलकती है। क्या यह सत्य नहीं कि वहां मिसाइलों के नाम उन्हीं क्रूर इस्लामी आक्रांताओं- गजनवी, बाबर, गौरी आदि के नाम पर रखे गए है, जिसके विषैले चिंतन से संघर्ष करते हुए सिख गुरुओं सहित अनेकों शूरवीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था? जबकि भारत में मिसाइलों के नाम प्राकृतिक तत्वों से प्रेरित पृथ्वी, अग्नि, आकाश इत्यादि रखा गया है। 

इस इस्लामी देश में सिखों की स्थिति का अंदाजा, इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 2017 की जनगणना में उन्हे शामिल ही नहीं किया गया था। सिख बुद्धिजीवियों के अनुसार, पिछले दो दशकों में पाकिस्तान में सिखों की संख्या तेजी से गिरी है। वर्ष 2002 में जहां सिखों की आबादी 40,000 थी, वह अब घटकर 8,000 रह गई है। स्वतंत्रता के समय स्थिति ऐसी नहीं थी। विभाजन के बाद पाकिस्तान के हिस्से में आए क्षेत्रों में हिंदू-सिख, कुल जनसंख्या के लगभग एक चौथाई- 24 प्रतिशत थे। अकेले लाहौर शहर की कुल आबादी में हिंदू-सिखों का अनुपात 60 से 65 प्रतिशत था। पूरे नगर में अनेकों ऐतिहासिक मंदिर और गुरुद्वारे थे। किंतु आज वहां एक-दो ऐतिहासिक गुरुद्वारों को छोड़कर, सभी गैर-मुस्लिम पूजास्थल (मंदिर और गुरुद्वारा सहित) लुप्त हो गए है।

विडंबना देखिए कि जिस क्षेत्र पर सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने 180 वर्ष पहले 38 वर्षों तक शासन किया था, वहां योजनाबद्ध इस्लामी अभियान के बाद आज सिखों की आबादी को उंगलियों पर गिना जा सकता है। प्रभु श्रीराम के पुत्र लव के नाम पर बसे हुए लाहौर में आज एक भी मर्यादापुरुषोत्तम दशरथ नंदन का मंदिर नहीं है। 

इसी वर्ष मई में लाहौर से लगभग 100 किलोमीटर दूर नारोवाल में ऐतिहासिक चार शताब्दी पुराने गुरु नानक महल के बड़े हिस्से को इस्लामी कट्टरपंथियों ने ध्वस्त कर दिया था। यही नहीं, गत 10 अगस्त को लाहौर किले स्थित महाराजा रणजीत सिंह की उस प्रतिमा को भी क्षतिग्रस्त कर दिया, जिसे जून माह में ही स्थापित किया गया था। विरोधाभास देखिए कि जब पाकिस्तान में मजहबी जुनून के कारण सिख समाज जिस प्रकार नगण्य होने के कगार पर है, तब कनाडा, ब्रिटेन आदि विकसित देशों में बसे संपन्न सिख प्रवासी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस विकराल दृष्टांत पर मौन धारण किए रहते है। क्यों? 

सिखों की आस्था के प्रति पाकिस्तानी सत्ता अधिष्ठान और जनमानस का व्यवहार कैसा रहा है- उसका प्रत्यक्षदर्शी तो मैं भी रहा हूं। लगभग डेढ़ दशक पहले वर्ष 2003 में बतौर राज्यसभा सांसद, मुझे साफमा प्रतिनिधिमंडल सदस्य के रूप में पाकिस्तान जाने का अवसर मिला था। सौभाग्यवश जब मैं ननकाना साहिब के दर्शन करने पहुंचा, तब वहां के मुख्य ग्रंथी ने मुझे बताया कि यहां के गुरुद्वारों पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई का कब्जा है और चढ़ावे का पैसा सीधे आई.एस.आई. के खजाने में जाता है। यही नहीं, उस समय मेरे साथ आए पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों के काफिले ने सिख पंथ की मर्यादा का अपमान करते हुए जूते पहनकर और बिना सिर ढके, गुरुद्वारे में प्रवेश कर लिया था। जब अधिकारियों के समक्ष मैंने इसका सख्त विरोध किया, तब जाकर मेरे साथ आए सुरक्षाकर्मी सिख मर्यादा का सम्मान करने को बाध्य हुए और साथ चलने लगे। मेरे निर्देश पर जब सुरक्षाकर्मी और अधिकारी गुरुद्वारे से बाहर गए, तब ग्रंथी ने उपरोक्त जानकारी साझा की। 

ननकाना साहिब का महत्व इसलिए भी अधिक है कि सिखों के साथ हिंदू भी इस पवित्रस्थल को अपनी सांस्कृतिक आस्था का केंद्र मानते है। मुझे याद है कि उस समय ननकाना साहिब के प्रांगण में दो-तीन शादियां हो रही थी, जिसमें गिने-चुने 20-25 लोग ही शामिल हुए थे और भोजन की व्यवस्था भी सामान्य से नीचे थी। वर-वधू के एक जोड़े को मुझे आशीर्वाद देने का सौभाग्य भी मिला था, जहां मुझे गुरुद्वारे के प्रांगण में वैदिक रीति-रिवाज और सिख परंपरा से विवाह संस्कार होते हुए दिखाई दिए थे। 

भारत और पाकिस्तान के संबंधों में "काफिर-कुफ्र" की विषैली मानसिकता ही सबसे बड़ा पेंच भी बनी हुई, जिसने इस्लामी आक्रांताओं को आठवीं शताब्दी में भारत पर आक्रमण करने, 19 शताब्दी के अंतिम वर्षों में अखंड भारत के मुसलमानों को देश का रक्तरंजित विभाजन करने और कश्मीर संकट की नींव रखने के लिए प्रेरित किया। पाकिस्तान में इसी विषाक्त चिंतन को चाहे लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गए नेता जुल्फिकार अली भुट्टो हो या फिर उन्हें फांसी पर लटकाने वाले सैन्य तानाशाह जिया उल हक- लगभग सभी शासकों ने उसे पहसे से और अधिक पुष्ट किया है। वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान खान, पाकिस्तानी सेना की कठपुतली बनकर उसी जहरीली परंपरा को आगे बढ़ा रहे है।

 

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