• [WRITTEN BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 10 September, 2019 09:09 AM | Total Read Count 118
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इसरो का ख्याल रखना भी जरूरी!

सुशांत कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी हार नहीं मानने और विफलता के बावजूद नए जोश से प्रयास करने की भावना के लिए ‘इसरो स्पिरिट’ का एक नया जुमला बोला है। उन्होंने हरियाणा के रोहतक की रैली में कहा कि देश में इस समय इसरो स्पिरिट है। उन्होंने किस संदर्भ में यह बात कही यह स्पष्ट नहीं है। हकीकत यह है कि इसरो में तो इस समय यह भावना है और हमेशा रही कि वहां वैज्ञानिक सफलता-असफलता के प्रभावित हुए बगैर अपने प्रयास में लगे रहते हैं। 

पर देश में वैसी भावना की कमी हो गई है तभी सरकार की आर्थिक नीतियों से सीधे जुड़े अधिकारियों ने कहा कि देश के कारोबारियों में ‘एनिमल स्पिरिट’ की कमी हो गई है और इसी वजह से आर्थिकी रसातल में जा रही है। ‘एनिमल स्पिरिट’ और ‘इसरो स्पिरिट’ लगभग एक ही जैसी चीज है। बहरहाल, इस समय इसरो को ऐसी संघर्ष की भावना और प्रेरणा के साथ साथ कई और चीजों की जरूरत है। 

प्रधानमंत्री ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, इसरो के चेयरमैन को गले लगा कर उन्हें दिलासा दिया, कोई भले इसे प्रायोजित बताए पर उसका बड़ा मैसेज इसरो के वैज्ञानिकों और दूसरे क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों के बीच गया है। प्रधानमंत्री की यह एक प्रतीकात्मक पहल थी। हकीकत यह है कि ऐसे प्रतीकात्मक प्रोत्साहनों से इतर इसरो को कई तरह की मदद की जरूरत है और उसमें कई किस्म के सुधारों की जरूरत है। उसके वैज्ञानिकों को बेहतर वेतन भत्ते की जरूरत है और साथ ही प्रशासनिक ढांचे में और सुधार की भी जरूरत है। ध्यान रहे पिछले कुछ दिनों में इसरो के अंदर कई किस्म की गड़बड़ियों की खबरें आई हैं, जिन्हें ठीक करना जरूरी है। 

इसरो ने जुलाई में जब चंद्रयान दो लांच किया उससे कुछ समय पहले ही इसरो के वैज्ञानिकों के वेतन में कमी की गई थी। यह हैरान करने वाली बात है कि वैज्ञानिकों का वेतन घटाया गया। इसरो के वैज्ञानिकों के संगठन स्पेस इंजीनियर्स एसोसिएशन, एसईए ने इसका विरोध किया था। असल में इसरो के वैज्ञानिकों को दो वेतन बढ़ोतरी के बदले 1996 से प्रोत्साहन अनुदान मिल रहा था, जिसे सरकार ने एक जुलाई से बंद कर दिया। इससे वैज्ञानिकों को चार से सात हजार रुपए तक का नुकसान होगा। 

एसईए ने इसरो के अध्यक्ष के सिवन को पत्र लिख कर अपना विरोध जताया था और उनसे अनुरोध किया था कि वैज्ञानिकों के वेतन में कटौती के केंद्र सरकार के फैसले को निरस्त कराने में वे मदद करें। इंजीनियरों के संगठन ने यह भी कहा था कि वेतन में कटौती से बहुत मुश्किल आएगी क्योंकि इसरो के वैज्ञानिकों के पास कमाई का कोई अतिरिक्त साधन नहीं है। 

सोचें, यह कैसी हैरान करने वाली बात है कि जिस इसरो की उपलब्धियों पर सबको नाज है, जिसकी सफलता के चर्चे सारी दुनिया में हैं उसके इंजीनियरों व वैज्ञानिकों के वेतन में केंद्र सरकार ने कटौती की और वैज्ञानिकों के अनुरोध के बावजूद उसके चेयरमैन ने केंद्र से बात करके इसे रुकवाने का कोई प्रयास नहीं किया। उससे भी हैरान करने वाली बात यह है कि इक्का दुक्का खबरों के अलावा इसकी कहीं चर्चा भी नहीं हुई। इस समय जब देश में इसरो स्पीरिट की बात हो रही है तो वेतन कटौती के बाद वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की भावना के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए। 

वेतन में कटौती के साथ साथ एक दूसरा घटनाक्रम भी, जिससे इसरो का प्रशासन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। ऐसा पहली बार हुआ है कि इसरो ने दो निजी कंपनियों और एक सार्वजनिक उपक्रम के साथ 27 सेटेलाइट बनाने का करार किया। जानकारों का मानना है कि ऐसा सरकार के कहने पर ही किया गया। जिन कंपनियों को इसरो के साथ सेटेलाइट बनाने के काम में शामिल किया गया उनका रिकार्ड संदिग्ध है। उनमें से एक कंपनी का नाम पनामा पेपर्स में आया हुआ है। बहरहाल, वह अलग मामला है। 

जब इसरो ने निजी कंपनियों के साथ करार किया तो अहमदाबाद में स्थित इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के निदेशक डॉक्टर तपन मिश्रा नाराज हुए। तपन मिश्रा इसरो के अध्यक्ष के सिवन के बाद दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी थे और सिवन के बाद उनका इसरो चेयरमैन बनना तय था। पर जब उन्होंने निजी कंपनियों को सेटेलाइट बनाने के काम में शामिल करने का विरोध किया तो उनको स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के निदेशक पद से हटा दिया गया और इसरो के मुख्यालय में वरिष्ठ सलाहकार नियुक्त कर दिया गया। इस तरह उनका चेयरमैन बनने का रास्ता बंद कर दिया गया। उनको हटाए जाने के बाद देश के कई बड़े संस्थानों के वैज्ञानिकों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र भेजा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। 

एक तरफ देश में इसरो स्पिरिट की बात हो रही है और दूसरी ओर इसरो के वैज्ञानिकों को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि बंद की जा रही है और उसे परफारमेंस से लिंक किया जा रहा है। इसके अलावा निजी कंपनियों को इसरो के साथ जोड़ा जा रहा है और इस पर आवाज उठाने वाले वैज्ञानिक को सजा दी जा रही है। सवाल है कि ऐसे में कैसे इसरो के वैज्ञानिक स्वतंत्र रूप से काम कर पाएंगे? यह ध्यान रहे कि इसरो की अब तक की सफलता का राज यहीं है कि यह राजनीतिक हस्तक्षेप और मीडिया की 24 घंटे चलने वाली नौटंकी से दूर रहा है। अफसोस की बात है कि इसरो के वैज्ञानिक प्रयोगों को मीडिया हाइप का विषय बनाया जा रहा है और राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। कायदे से वैज्ञानिकों को अपना काम करने दिया जाना चाहिए और प्रोत्साहन के रूप में उनकी नियमित वेतन बढ़ोतरी होनी चाहिए, प्रोत्साहन राशि मिलनी चाहिए और बाहरी दखल से संपूर्ण संरक्षण मिलना चाहिए। 

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