• [EDITED BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 11 July, 2019 06:39 AM | Total Read Count 85
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चंदा तो सिर्फ सरकारी पार्टी को!

शशांक राय

पहले भी ऐसा होता था कि जो पार्टी सरकार में होती थी उसे ज्यादा चंदा मिलता था और विपक्षी पार्टियों को कम चंदा मिलता था। इसका कारण क्या है वह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। एक तो कंपनियों और कारोबारियों को सरकार से ही काम होता है इसलिए वे सरकार को खुश करने के लिए चंदा देती हैं। दूसरे जो पार्टी सरकार में होती है उसके पास दूसरे स्रोत से पैसे की आमद ज्यादा होती है, जिसे चंदे के तौर पर दिखाया जाता है। 

इस काम के लिए पार्टियों का पूरा तंत्र काम करता है, जो बिना पता और पैन कार्ड के चंदे की रसीद काटता रहता है। उस किस्म का चंदा हर पार्टी को मिलता है। यह प्रक्रिया दशकों से चली आ रही है। कितनी बार इस मुद्दे पर चिंता जताई गई कि काले धन को सफेद बनाने के लिए लोग पार्टियां बना रहे हैं। ऐसी सैकड़ों पार्टियां हैं, जो कभी चुनाव नहीं लड़ती है। बहरहाल, वह अलग चर्चा का मुद्दा है। अभी असली सवाल यह है कि चंदे की पूरी प्रक्रिया सांस्थायिक रूप लेती जा रही है। अब यह संस्थागत रूप से सुनिश्चित किया जा रहा है कि चंदा सिर्फ सरकारी पार्टी को मिले और विपक्षी पार्टियां कंगाल हो जाएं। 

चंदे को लेकर कारपोरेट का रवैया ऐसा हो गया है कि उसे विपक्षी पार्टियों की कोई परवाह नहीं है। ऊपर से सरकार ने इलेक्टोरल बांड के जरिए चंदा देने की प्रक्रिया लागू की है, जिसकी वजह से कंपनियों के लिए सरकार की नजर में आए बिना विपक्षी पार्टियों को चंदा देना मुश्किल हो गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि विपक्षी पार्टियों को मिलने वाला चंदा साल दर साल कम होता जा रहा है और सरकारी पार्टी यानी भाजपा का चंदा बढ़ता जा रहा है। 

वैसे तो राजनीतिक पार्टियां अपने खाते में आधिकारिक रूप से जो चंदा दिखाती हैं वह हाथी के दिखाने के दांत होते हैं। खाने के दांत उससे बहुत अलग और बहुत ज्यादा होते हैं। फिर चंदे का जो आधिकारिक आंकड़ा होता है कि उससे वास्तविक और कानूनी दोनों किस्म के चंदों की हकीकत पता चल जाती है। जिस पार्टी को जिस अनुपात में आधिकारिक चंदा मिला होता है वास्तविक चंदा भी उसी अनुपात में मिलता है। 

राजनीतिक दलों के चंदे आदि का विश्लेषण करने वाली संस्था एडीआर की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले दो साल में देश की छह राष्ट्रीय पार्टियों को कुल 1059 करोड़ रुपए का चंदा मिला है। इसमें 969 करोड़ रुपए अकेले भारतीय जनता पार्टी को मिला है। इसमें कारपोरेट का चंदा 985 करोड़ रुपए का है, जिसमें से भाजपा को 916 करोड़ रुपए मिले हैं। सोचें, कुल चंदे का 93 फीसदी और कारपोरेट चंदे का 94 फीसदी सिर्फ एक पार्टी को मिला है। बचे हुए छह-सात फीसदी में बाकी पांच पार्टियां हैं। 

कांग्रेस पार्टी को दो साल में कुल 69 करोड़ रुपए का चंदा मिला, जिसमें से कारपोरेट चंदा 55 करोड़ रुपए का था। शरद पवार की पार्टी को कुल साढ़े आठ करोड़ चंदा मिला, जिसमें कारपोरेट चंदे का हिस्सा 7.7 करोड़ रुपए है। ध्यान रहे पवार की पार्टी महाराष्ट्र केंद्रित है और मुंबई में सारे कारपोरेट के मुख्यालय हैं, फिर भी उनकी पार्टी चंदे के मामले में फिसड्डी रही। सीपीएम को आठ करोड़ रुपए का चंदा मिला, जिसमें से करीब आधा चंदा कारपोरेट का है और बाकी खुदरा चंदा है। 

पार्टियों को मिलने वाले चंदे और उनकी वास्तविक आमदनी में कितना ज्यादा फर्क होता है यह एडीआर के ही एक दूसरे आंकड़े से पता चलता है। एडीआर का आकलन है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टियों ने 27 हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं। सवाल है कि एक साल में जिसको सबसे ज्यादा चंदा मिलता है वह भी पांच सौ करोड़ रुपए से ज्यादा नहीं होता है तो फिर इतना रुपया कहां से आता है और कैसे आता है? इसी संस्था ने 2017 के कर्नाटक चुनाव का आकलन करके बताया था कि कर्नाटक की 224 विधानसभा सीटों पर हुए चुनाव में पार्टियों ने दस हजार करोड़ रुपए खर्च किए। उस लिहाज से लोकसभा चुनाव का उसका आंकड़ा बहुत कम खर्च दिखा रहा है। फिर भी इसे ही सही मानें तो इसमें किसी भी छोटी पार्टी के लिए या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के लिए भी कहां लड़ने की गुंजाइश बचती है? चुनाव पूरी तरह से पैसे का खेल बन गया है। चुनाव में इतना रुपया खर्च हो रहा है कि किसी भी छोटी पार्टी या निर्दलीय उम्मीदवार के लिए चुनाव लड़ना और जीतना नामुमकिन हो गया है। चुनाव में पैसे की भागीदारी सिर्फ लड़ने तक ही नहीं है, बल्कि टिकट हासिल करने में भी इसका बड़ा योगदान है तभी लोकसभा में करोड़पति सांसदों की संख्या बढ़ती जा रही है। 

जब हम स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की बात करते हैं तो उसका बुनियादी मतलब यह होता है कि सभी पार्टियों और उम्मीदवारों को बराबरी का मैदान हासिल हो। तभी आचार संहिता उल्लंघन के नियम बनाए गए हैं और हर उम्मीदवार के लिए खर्च की एक समान सीमा तय की गई है। पर वहां भी सत्तारूढ़ पार्टियों को आधिकारिक रूप से कई किस्म के एडवांटेज मिलते हैं। सुरक्षा के नाम पर उनके नेता को सरकारी वाहनों, हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर के इस्तेमाल की इजाजत होती है। ऊपर से आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में सत्ता पक्ष के नेताओं के प्रति पूर्वाग्रह अक्सर देखने को मिला। 

इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने प्रधानमंत्री के खिलाफ दर्जनों शिकायतें कीं, जिनमें से कई शिकायत पर तो एक चुनाव आयुक्त कार्रवाई भी चाहते थे पर अंततः किसी में कुछ नहीं हुआ। सो, एक तरफ आचार संहिता के उल्लंघन में पूर्वाग्रह है और दूसरी ओर हजारों करोड़ रुपए के खर्च का अंतर है। ऐसे में चुनाव को कैसे स्वतंत्र व निष्पक्ष माना जा सकता है। अच्छा है, जो राज्यसभा में चुनाव सुधारों पर चर्चा हुई। ऐसी चर्चा और होनी चाहिए, जिसमें इन तमाम मुद्दों पर विचार करके सबके लिए बराबरी का मैदान सुनिश्चित करना चाहिए। 

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