• [EDITED BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 10 July, 2019 12:00 AM | Total Read Count 170
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कश्मीर में सचमुच बदल रहे हालात

तन्मय कुमार

केंद्र सरकार की ओर से जम्मू कश्मीर में हालात सुधरने का दावा तो पिछले काफी समय से किया जा रहा है। पर अब कम से कम आंकड़ों को देख कर ऐसा लग रहा है कि हालात सचमुच सुधर रहे हैं। जमीनी हालात जैसे भी हों, आम लोग अंदर ही अंदर जो भी सोच रहे हों और अलगाववादी संगठन अंदर-अंदर चाहे जो भी प्लानिंग कर रहे हों पर कश्मीर घाटी में और सीमा पर भी हालात सुधर रहे हैं। 

ताजा आंकड़ा सीमा पार से संघर्षविराम का उल्लंघन करके होने वाली फायरिंग का है। इसमें जबरदस्त कमी आई है। यानी सीमा पार से पाकिस्तानी फौज द्वारा होने वाली फायरिंग घट गई है। इससे एक दूसरी चीज भी जुड़ी हुई है। आमतौर पर पाकिस्तानी फौज की फायरिंग घुसपैठ कराने के लिए होती है। उसकी फायरिंग की आड़ में घुसपैठ होती है। पर सरकार का आंकड़ा है कि इस साल अभी तक छह महीने में सीमा पार से घुसपैठ की एक भी घटना नहीं हुई है। पहले अक्सर घुसपैठियों के साथ सुरक्षा बलों की मुठभेड़ होती थी। इसमें घुसपैठिए भी मारे जाते थे और जवान भी शहीद होते थे। पर इस साल अभी तक ऐसी कोई मुठभेड़ घुसपैठियों के साथ नहीं हुई है। 

सेना की कार्रवाई में जो आतंकवादी मारे जा रहे हैं उनमें से ज्यादातर स्थानीय नौजवान हैं। तभी रक्षी मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में दावा किया कि आतंकवादियों के पास नेतृत्व की कमी हो गई है। उनके पास कोई नेता नहीं बचा है। सुरक्षा बलों ने सारे बड़े आतंकी सरगनाओं को मार गिराया है। कश्मीर में हालात बदलने का एक संकेत यह भी है कि आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने की तीसरी बरसी पर जो बंद का आह्वान किया गया वह बहुत कारगर नहीं था और इस दौरान हिंसा भी नहीं हुई। 

सेना और सुरक्षा बलों का मानना है कि संघर्षविराम उल्लंघन की घटनाओं में कमी, घुसपैठ रूक जाने और आतंकवादी संगठनों में नेतृत्व की कमी का कारण सेना की कार्रवाई है। यह भी कहा जा रहा है कि इस साल फरवरी में भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के बालाकोट में जो कार्रवाई की उससे पाकिस्तान के हौसले पस्त हुए हैं और आतंकवादियों की कमर टूटी है। अब वहां की फौज में भी डर का माहौल है। 

भारत ने इससे पहले सितंबर 2016 में तो नियंत्रण रेखा पार करके बहुत सीमित कार्रवाई की थी। सेना के जवान अंदर गए थे और उन्होंने कुछ आतंकवादी शिविरों को तबाह किया था। पर बालाकोट एयर स्ट्राइक को बड़ा हमला माना जा रहा है। इसके अलावा भी सेना ने बाकी सुरक्षा बलों के साथ एक साझा टीम बनाई है और खुफिया सूचनाओं के तंत्र को मजबूत किया है। इससे सुरक्षा बलों को स्थानीय नौजवानों के आतंकवादी संगठनों में भरती होने की सूचना मिल रही है और उनके छिपे होने के ठिकाने का पता भी मिल रहा है। इससे उनके खिलाफ कार्रवाई करने में आसानी हो रही है। सो, सीमा पार की कार्रवाई हो या सीमा के अंदर, सेना को खुली छूट देने का असर दिखने लगा है। 

सीमा के पार और सीमा के अंदर सेना की कार्रवाई के साथ साथ कुछ और सामानांतर कार्रवाइयां चल रही हैं, जिन्होंने अलगाववादियों को कमजोर किया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी, एनआईए ने अलगाववादी नेताओं की फंडिंग के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं और ऊपर से पुरानी फंडिंग की जांच करके धनशोधन का मामला दर्ज किया है। अलगाववादियों के लिए फंडिंग करने वाले या हवाला के जरिए उन तक पैसा पहुंचाने वाले कारोबारियों के ऊपर दिल्ली और कश्मीर में अनेक जगह छापे पड़े और अनेक लोग गिरफ्तार किए गए। कई अलगाववादी नेता अब भी एनआईए की हिरासत में हैं। फंडिंग बंद होने और उसकी जांच होने से हुर्रियत कांफ्रेंस सहित दूसरे तमाम अलगाववादी संगठन कमजोर हुए हैं। 

इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनकी पोल खोलनी शुरू की। उसने दो सौ ऐसे अलगाववादियों की सूची जारी की, जिनके बेटे, बेटी, दामाद, पोते, नाती आदि विदेश में पढ़ रहे हैं या नौकरी कर रहे हैं। वे घाटी के नौजवानों को गुमराह कर रहे हैं और खुद अपने बच्चों को विदेश में पढ़ा रहे हैं। इससे उनकी छवि प्रभावित हुई और नेतृत्व पर सवाल उठे हैं। 

यह पिछले करीब तीन दशक में पहली बार हुआ कि भारत का गृह मंत्री कश्मीर के दौरे पर गया और अलगाववादी संगठनों ने घाटी में बंद का आह्वान नहीं किया। इससे पहले हर बार ऐसा आह्वान होता था और केंद्रीय गृह मंत्री के घाटी में पहुंचने पर सूनी सड़कें और बंद बाजार उसका स्वागत करते थे। पर पिछले दिनों जब अमित शाह बतौर गृह मंत्री घाटी के पहले दौरे पर गए तो बंद का आह्वान नहीं किया गया। यह घाटी में मूड बदलने का संकेत है। यह पहला मौका है, जब अलगाववादी भारत सरकार से बातचीत की अपील कर रहे हैं और सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही है। 

भाजपा के कश्मीर के प्रभारी राम माधव ने दो टूक अंदाज में कहा कि अलगाववादी तय नहीं करेंगे कि कब बात होगी। यानी सरकार अपने हिसाब से बातचीत का समय तय करेगी। ध्यान रहे पाकिस्तान से बातचीत शुरू हुए बगैर अलगाववादियों से बात करने से ज्यादा कुछ हासिल नहीं होगा। और सरकार ने तय किया है कि पाकिस्तान जब तक आतंकवाद पर लगाम नहीं लगाएगा तब तक बातचीत नहीं होगी। इसलिए अलगाववादियों को अभी और इंतजार करना होगा। 

 

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