• [WRITTEN BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 23 August, 2019 07:43 AM | Total Read Count 139
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आरक्षणः बहस की जरूरत है या नहीं?

अजित कुमार

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि देश में लागू आरक्षण की व्यवस्था पर विचार करने की जरूरत है। इससे पहले भी उन्होंने 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले इस बारे में बयान दिया था। उन्होंने इसकी समीक्षा की जरूरत बताई थी। तब नीतीश कुमार भाजपा से अलग हो गए थे और राजद के साथ मिल कर विधानसभा का चुनाव लड़ रहे थे। उन्होंने और लालू प्रसाद ने भागवत के इस बयान को बड़ा मुद्दा बना दिया। आरक्षण को लेकर जीने-मरने की कसमें खाई जाने लगीं और अंततः चुनाव इस मुद्दे पर आ गया, जिसका फायदा सामाजिक न्याय के आंदोलन से जुड़ी पार्टियों जदयू और राजद को मिला। 

भागवत के इस बयान का भाजपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। अभी फिर उन्होंने वहीं बात कही है। पर आरक्षण के सवाल पर जीने-मरने की कसमें खाने वाले नीतीश कुमार चुप हैं और भाजपा के दूसरे सहयोगी रामविलास पासवान ने दो टूक अंदाज में कहा कि इस पर विचार की कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि आरक्षण भारत की हकीकत है, यह व्यवस्था रहेगी और भविष्य में और बढ़ेगी। ध्यान रहे पासवान नेताओं की उस जमात में शामिल हैं, जो निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने की वकालत करती है। 

दुर्भाग्य से मोहन भागवत के बयान पर हर बार राजनीतिक बहस से असली मुद्दा गायब हो जाता है। यह कोई नहीं बताता कि मोहन भागवत या आरक्षण की व्यवस्था पर बहस की सलाह देने वाला कोई व्यक्ति यह नहीं कहता है कि इसे खत्म कर दिया जाए। विचार करने का यह मतलब भी तो हो सकता है कि इसे तर्कसंगत बनाया जाए या बड़ा किया जाए या जिनको आरक्षण का लाभ मिल चुका है उन्हें इस व्यवस्था से बाहर किया जाए? इस बारे में अच्छी या बुरी कोई भी बात तभी होगी, जब इस पर विचार होगा। रामविलास पासवान के सांसद बेटे चिराग पासवान कई बार कह चुके हैं कि जिन लोगों को आरक्षण का कई बार लाभ मिला है और जो अच्छी सामाजिक-आर्थिक हैसियत में हैं उनको आरक्षण का लाभ नहीं लेना चाहिए। सवाल है कि जब इस पर विचार ही नहीं किया जाएगा तो कैसे पता चलेगा कि कौन कितनी बार आरक्षण का लाभ ले चुका है और किसे इस व्यवस्था से बाहर हो जाना चाहिए? क्या गैस सिलिंडर की सब्सिडी छोड़ने की तरह से स्वैच्छिक बनाया जाए का जिसे छोड़ना है वह आरक्षण छोड़ दे? ऐसा भी व्यवस्था बनानी होगी तो पहले विचार करना होगा। 

आखिर अदालत ने इस पर विचार किया तभी आरक्षण की 50 फीसदी की अधिकतम सीमा लागू हुई। इस पर विचार किया गया तभी क्रीमी लेयर का सिद्धांत बना। इस पर विचार किया गया तभी आरक्षण के भीतर आरक्षण का व्यवस्था लागू हुई। आरक्षण की व्यवस्था पर विचार करके ही इसमें नई जातियों को शामिल किया जा रहा है और आरक्षण की सीमा बढ़ाई जा रही है। विचार करके ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया। 

ध्यान रहे संविधान में आरक्षण का प्रावधान करने वाले अनुच्छेद में आर्थिक आधार नहीं बताया गया था। उसके मुताबिक सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया जाएगा। पर अब सरकार ने उसमें आर्थिक आधार भी जोड़ दिया है। यह आरक्षण की व्यवस्था पर विचार किया गया तभी संभव हो पाया। इसलिए रामविलास पासवान का यह मुख्य विपक्षी कांग्रेस और दूसरी पार्टियों का यह कहना ठीक नहीं है कि इस पर बहस ही नहीं होनी चाहिए। 

भारत में आरक्षण की व्यवस्था आजादी के बाद से ही चल रही है। एससी और एसटी आरक्षण पहले से था और 1990 में मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद ओबीसी आरक्षण भी शुरू हो गया। इस साल से सरकार ने गरीब सवर्णों का आरक्षण भी शुरू कर दिया। यानी अब देश की हर जाति आरक्षण के दायरे में है। सबको किसी न किसी रूप में आरक्षण मिल रहा है। जब तक एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण मिल रहा था तब तक सवर्ण समाज के लोग उन्हें हेय दृष्टि से देखते थे। आरक्षण के जरिए किसी पद पर पहुंचे लोगों को कामकाज के लिहाज से अच्छा नहीं मानते थे। पर अब सवर्ण भी आरक्षण ले रहे हैं। इसलिए आरक्षण को लेकर कमतरी का जो भाव समाज में प्रचलित था वह खत्म हो गया है। अब सिर्फ जाति के आधार पर आरक्षण का विरोध कोई नहीं कर सकता क्योंकि सारी जातियों के लोग आरक्षण ले रहे हैं। यह आरक्षण की व्यवस्था में बुनियादी बदलाव करने या खत्म करने का पहला चरण हो सकता है। 

मोहन भागवत ने पता नहीं किस मकसद से आरक्षण की व्यवस्था पर बहस की जरूरत बताई थी। पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसे तर्कसंगत बनाने के लिए इस पर विचार की जरूरत है। कई पीढ़ियों से आरक्षण का लाभ ले रहे लोगों को इसके दायरे से बाहर करना चाहिए। बिल्कुल हाशिए पर के और वंचित लोगों को यानी वास्तविक जरूरतमंदों को इसका लाभ देना चाहिए। राजनीतिक मकसद से आरक्षण का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए जैसा कि मराठा आरक्षण देकर भाजपा ने महाराष्ट्र में किया है। 

वोट की राजनीति के लिए आरक्षण को हथियार बनाया जा रहा है। इसी वजह से सरकारें नई जातियों को आरक्षण में शामिल कर रही हैं। आरक्षण की सीमा बढ़ा रही हैं और निजी क्षेत्र में आरक्षण देने की मांग कर रही हैं। इस तरह के प्रयासों को रोकना चाहिए। जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने अनुच्छेद 370 के लिए कहा था कि इससे क्या लाभ हुआ इस पर विचार होना चाहिए वैसे ही आरक्षण से क्या लाभ हुआ इस पर भी विचार होना चाहिए और जहां जरूरी हो वहां बदलाव करना चाहिए। 

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