• [EDITED BY : Ajit Dwivedi] PUBLISH DATE: ; 18 July, 2019 06:40 AM | Total Read Count 163
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही, सटीक

सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर राजनीतिक उठापटक और पक्ष-विपक्ष की बहसों से तटस्थ रहते हुए एक संतुलित फैसला सुनाया है। कर्नाटक की राजनीति पर इस फैसले के असर का विश्लेषण बाद का विषय है लेकिन उससे पहले यह रेखांकित किया जाना जरूरी है कि 14 महीने के अंतराल में कर्नाटक की राजनीति से जुड़ा मामला दूसरी बार सर्वोच्च अदालत में पहुंचा और दोनों बार अदालत का ऐसा फैसला आया, जो देश में दशकों से चल रही संवैधानिक संसदीय प्रणाली को मजबूत करने वाला रहा। 

सर्वोच्च अदालत ने दो टूक शब्दों में विधानसभा के स्पीकर के अधिकारों को स्वीकार किया और कहा कि विधायकों के इस्तीफे पर फैसला करने का अधिकार स्पीकर को ही है। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में स्पीकर को बाध्य करने वाली कोई समय सीमा नहीं तय की जा सकती। इसके साथ ही अदालत ने कांग्रेस और जेडीएस से इस्तीफा देने वाले विधायकों के अधिकारों को भी रेखांकित किया और कहा कि उन्हें सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। 

इस तरह से अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि विधायिका के कामकाज में उसका दखल का कोई इरादा नहीं है। उसने बताया कि विधायकों की योग्यता, अयोग्यता का फैसला करना स्पीकर का काम है और वह उन्हें करना चाहिए। ध्यान रहे बागी विधायक चाहते थे कि सुप्रीम कोर्ट स्पीकर को आदेश दे कि वे विधायकों का इस्तीफा मंजूर करें। अदालत ने इस दलील को नहीं माना और इस संवैधानिक व्यवस्था को स्वीकार किया कि ऐसे मामलों में स्पीकर का विशेषाधिकार सबसे ऊपर है। अदालत के सामने कुछ बड़े सवाल भी आए थे, जिनके बारे में उसने कहा है कि उन पर बाद में विचार किया जाएगा। 

बहरहाल, इसी तरह का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल मई में भी सुनाया था, जब कर्नाटक का मामला उसके सामने आया था। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के बाद राज्यपाल ने भाजपा के नेता बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी और उनको बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय दिया था। उस समय भाजपा के पास सिर्फ 105 विधायक थे। दूसरी ओर कांग्रेस, जेडीएस, बसपा और दो निर्दलीय विधायकों को मिला कर संख्या 119 की थी। सो, कांग्रेस और जेडीएस ने राज्यपाल के फैसले को चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत साबित करने का समय 15 दिन से घटा कर 24 घंटे कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद येदियुरप्पा ने इस्तीफा दे दिया था और जेडीएस-कांग्रेस की साझा सरकार बनी थी। 

यह पहला मौका नहीं था, जब न्यायपालिका ने राजनीति से ऊपर संवैधानिक प्रावधानों को महत्व देते हुए संतुलन बनाने वाला फैसला दिया था। ध्यान रहे स्पीकर के अधिकारों पर दिए गए फैसले में भी अदालत ने कहा है कि संवैधानिक संतुलन बनाना उसके लिए जरूरी है। ऐसा ही संतुलन सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश में नबम टुकी सरकार को बरखास्त करने के मामले में दिया था। सर्वोच्च अदालत ने राज्यपाल के फैसले को पलटते हुए राज्य में टुकी सरकार को बहाल करने का आदेश दिया था। ऐसे ही उत्तराखंड में हाई कोर्ट ने हरीश रावत की सरकार को बरखास्त करने के मामले में नजीर कायम करने वाला फैसला दिया था। अदालत ने राष्ट्रपति शासन लगाने के केंद्र सरकार के फैसले को पलटते हुए रावत सरकार बहाल की थी। 

यह सही है कि समय समय पर अदालती फैसलों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। न्यायपालिका पर सरकार के बढ़ते असर की भी चर्चा समय समय पर होती रही है। कुछ समय पहले सर्वोच्च अदालत के वरिष्ठ जजों ने ही प्रेस कांफ्रेंस करके ऐसी चिंता जताई थी। इसके बावजूद संवैधानिक व्यवस्था के मामलों में उच्च अदालतों के फैसले आमतौर पर तटस्थ और निष्पक्ष होते हैं और संवैधानिक संतुलन बनाने की सोच उनमें दिखाई देती है। कर्नाटक के मामले में दिया गया सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला भी इसकी मिसाल है। 

 

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