• [WRITTEN BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 19 August, 2019 06:46 AM | Total Read Count 181
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आरक्षण सीमा बेमतलब हो गई!

अजित कुमार

छत्तीसगढ़ सरकार ने आरक्षण की सीमा बढ़ा दी है। राज्य की कांग्रेस सरकार ने अन्य पिछड़ी जातियों को मिलने वाले आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ा कर 27 फीसदी कर दिया है। अनुसूचित जातियों को मिलने वाले 12 फीसदी आरक्षण को बढ़ा कर 13 फीसदी कर दिया गया है। आदिवासी बहुल इस राज्य में अनुसूचित जनजातियों के लिए 32 फीसदी आरक्षण का प्रावधान पहले से है। इस तरह राज्य में कुल आरक्षण 72 फीसदी हो गया है। तमिलनाडु में पहले से 69 फीसदी आरक्षण की सीमा लागू है। आंध्र प्रदेश की सरकार आरक्षण की सीमा को 55 फीसदी करना चाहती है और तेलंगाना ने इसे बढ़ा कर 62 फीसदी करने का फैसला किया है। 

महाराष्ट्र में सरकार ने 16 फीसदी मराठा आरक्षण लागू किया है, जिससे वहां का कुल आरक्षण बढ़ कर 65 फीसदी हो जाएगा। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। पर हाई कोर्ट ने इस पर रोक नहीं लगाई है, बल्कि सरकार को इसे 12-13 फीसदी रखने का निर्देश दिया है। कर्नाटक में पिछले विधानसभा चुनाव में सबसे मुख्य मुद्दा आरक्षण का था और कांग्रेस के तब के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने इसे बढ़ा कर 70 फीसदी करने का वादा किया था। कई और राज्य आरक्षण की सीमा बढ़ाने की तैयारी में हैं या बढ़ा चुके हैं। 

राज्यों से इतर केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को दस फीसदी का आरक्षण दे दिया है, जिससे आरक्षण की 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन हुआ है। सवाल है कि जिस तरह केंद्र सरकार और सारे राज्य आरक्षण की सीमा बढ़ा रहे हैं, उसमें मेरिट के लिए कहां जगह बचती है और दूसरे सुप्रीम कोर्ट की लगाई सीमा का क्या मतलब रह गया?

सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में भारत सरकार बनाम इंदिरा साहनी केस की सुनवाई के दौरान यह सीमा लगाई थी और कहा था कि आरक्षण किसी हाल में 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इससे कुछ दिन पहले ही केंद्र सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू की थी, जिसमें अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने का प्रावधान था। यह आयोग 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार ने बनाया था और इसने 1980 में अपनी रिपोर्ट दी थी। पर 1980 से 1989 तक की कांग्रेस सरकारों ने इसे लागू नहीं किया। 1989 में बनी जनता दल सरकार के प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अपने राजनीतिक कारणों से 1990 में इसे लागू कर दिया। तब यह कहा गया था कि देश में कुल 52 फीसदी ओबीसी आबादी है इसलिए उसे उसी अनुपात में आरक्षण दिया जाए।

तभी सुप्रीम कोर्ट ने सीमा तय की और यह सुनिश्चित किया गया कि ओबीसी को 27 फीसदी, एससी को 15 फीसदी और एसटी को साढ़े सात फीसदी आरक्षण मिलेगा। इस तरह आरक्षण की सीमा 49.5 फीसदी तय की गई। तब तमिलनाडु इकलौता राज्य था, जो इसका अपवाद था। तमिलनाडु ने आरक्षण की सीमा 69 फीसदी रखी थी और इसे बचाए रखने के लिए उसने 1993 में एक नया कानून बनाया, जिसे संविधान के 76वें संशोधन के जरिए संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल दिया गया ताकि उसे न्यायिक समीक्षा से बचाया जा सके। पर अब तमिलनाडु अपवाद नहीं है और राज्यों अपने आरक्षण कानून को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए नौवीं अनुसूची का सहारा भी नहीं ले रहे हैं और न उच्च अदालतें खुद संज्ञान लेकर पूछ रही हैं कि आखिर कैसे आरक्षण की सीमा का उल्लंघन किया जा रहा है।  

आरक्षण को हिसाब से देखें तो ऐसा लग रहा है कि देश नब्बे के दशक में चला गया है, जब हर तरफ आरक्षण का शोर सुनाई देता था। अब भी वैसा हो रहा है। हरियाणा में जाट आरक्षण का आंदोलन सुलग रहा है तो महाराष्ट्र में मराठों को शांत करने के लिए राज्य सरकार ने 16 फीसदी आरक्षण दिया। केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को आरक्षण दिया तो आंध्र प्रदेश में कापू आरक्षण का आंदोलन चला है। 

विडंबना यह है कि एक तरफ आरक्षण बढ़ाया जा रहा है तो दूसरी ओर सरकारी नौकरियों की संख्या घट रही है और सरकारी शिक्षण संस्थाओं की गुणवत्ता बिगड़ती जा रही है। तभी आरक्षण के चैंपियन नेताओं ने निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग शुरू कर दी है। निजी क्षेत्र के उद्यमी हालांकि अपने यहां विविधता को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं पर वे मोटे तौर पर अभी तक मेरिट को ही तरजीह दे रहे हैं। 

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद भाजपा समर्थकों में और सोशल मीडिया में यह प्रचार था कि अब आरक्षण पूरी तरह से खत्म होगा। पर इसका उलटा हुआ है। पांच साल में आरक्षण सबसे अहम राजनीतिक मुद्दा बना है। खुद मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण दिया है। कई भाजपा शासित राज्यों में सरकारों ने आरक्षण के नियमों में फेरबदल किया है और नए समूहों को आरक्षण देकर इसकी सीमा बढ़ाई है। 

तभी प्रत्यक्ष रूप से तो दिख रहा है कि आरक्षण की सीमा बढ़ रही है। पर दूसरी ओर केंद्र सरकार उच्च पदों पर नियुक्ति के ऐसे नियम बना रही है, जिससे ज्यादातर नियुक्तियां बिना आरक्षण के होंगी। हाल के दिनों में विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के ऐसे ही नियमों को लेकर विरोध हुआ था तो सरकार के उच्च पदों- निदेशक से लेकर संयुक्त सचिव तक के स्तर पर सीधे निजी क्षेत्र के अनुभवी लोगों को बहाल करने का नियम बना है। ये दोनों चीजें विरोधाभासी हैं। आम लोगों की नजर में आरक्षण की सीमा बढ़ रही है तो दूसरी ओर वास्तविकता में कम से कम शीर्ष पदों पर आरक्षण की अवधारणा को ही खत्म किया जा रहा है। 

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