• [EDITED BY : Devdutt Dubey] PUBLISH DATE: ; 19 July, 2019 01:56 PM | Total Read Count 241
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सदन में भाजपा की कुआं और खाई जैसी स्थिति

देवदत्त दुबेः प्रदेश में 15 वर्षों तक लगातार भाजपा सत्ता में रही। इस दौरान प्रमुख विपक्षी दल के नाते कांग्रेस भाजपा सरकार पर कई प्रकार के आरोप लगाती रही। अब जबकि कांग्रेस सत्ता में है और भाजपा विपक्ष में, तब भी कांग्रेस के विधायक और मंत्री भाजपा सरकार के घोटालों की चर्चा करते हैं। इस पर यदि भाजपा के विधायक और नेता प्रतिपक्ष चुप रहते हैं तो माना जाएगा कि कांग्रेस के आरोप सही हैं और भाजपा सरकार के आगे झुक रही है लेकिन यदि भाजपा सदस्य कांग्रेस के विधायक और मंत्रियों को जांच करा लेने की चुनौती देते हैं तो माना जाता है कि भाजपा के ही सदस्य पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की जांच कराना चाहते हैं।

भाजपा सदस्यों की यह स्थिति कुआं और खाई के बीच में खड़े होने जैसी मानी जा रही है। दरअसल सरकार कोई भी हो यदि 15 वर्षों तक सरकार में रहेगी तो स्वाभाविक रूप से उसके खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप लगने का क्रम चलता ही रहेगा लेकिन यदि कुछ गंभीर आरोप लगते हैं तो फिर उसका विरोध करना स्वाभाविक हो जाता है। अन्यथा आरोपों का सिलसिला जारी रह सकता है।

ऐसी स्थिति का सामना दोनों दलों को विपक्ष में होने के दौरान करना पड़ता है। प्रदेश में 10 साल तक मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह पर भाजपा 15 साल तक बंटाधार मुख्यमंत्री का आरोप लगाती रही। अब ऐसे ही आरोप कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज से लगा रही है। भाजपा के सदस्य यदि चुप रहते हैं तो माना जाएगा कि वे शिवराज सिंह का बचाव नहीं कर रहे और यदि जांच कराने की चुनौती देते हैं तो आरोप लगेगा कि शिवराजसिंह को घोटालों की जांच करा कर  फंसाना  चाहते हैं।

लेकिन राजनीति में आरोप लगाना आसान है उन्हें सिद्ध करना बेहद कठिन। जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह 15 साल तक भाजपा नेताओं को चुनौती देते रहे कि उनके खिलाफ मुकदमा कायम करें, उन्हें गिरफ्तार करें। एक बार वह थाने में गिरफ्तारी देने भी गए। विधानसभा के मामले में जो एफआईआर उनके खिलाफ हुई उस पर भी आज तक कुछ नहीं हुआ। दिग्विजय सिंह नाम लेकर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और उनकी पत्नी पर आरोप लगाते थे और साथ में कहते थे यदि मैं गलत हूं तो मेरे ऊपर मानहानि का मुकदमा दायर करें और ऐसा कुछ नहीं हुआ।

कुल मिलाकर विधानसभा में जिस तरह से कांग्रेस भाजपा के 15 वर्षों के कार्यकाल पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रही है। व्यापम, वृक्षारोपण पर घोटाले होने के आरोप बार-बार लगा रही है। ऐसे में सदन में मौजूद चाहे नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव एवं शिवराज सिंह चौहान हों या नरोत्तम मिश्रा हों सभी का दायित्व बनता है कि वे कांग्रेस सरकार को चुनौती दें कि वे घोटालों की जांच करें और आरोपों को सिद्ध करें लेकिन राजनीति में जैसा होता है राजनीतिक विश्लेषक बाल की खाल निकालते हैं।

ऐसा ही इस समय हो रहा है। गोपाल भार्गव और नरोत्तम मिश्रा के बारे में कहा जा रहा है यह कांग्रेस को चुनौती देकर क्या इन घोटालों की असलियत में जांच कराना चाहते जबकि नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव का स्वभाव ही ऐसा है कि वे हमेशा बात को बड़ी बेबाकी और चुनौतीपूर्ण अंदाज में रखते हैं। हाल ही में सदन में ऐसे अवसर आए हैं जब उन्होंने सत्ताधारी दल के मंत्रियों को चुनौती दी है। बुधवार को ही उन्होंने लोक निर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा को चुनौती दी कि राष्ट्रीय राजमार्ग की जितनी सड़कें केंद्र की भाजपा सरकार के कार्यकाल में बनी हैं उतनी सड़कें कांग्रेस के 65 वर्षों की कार्यकाल में नहीं बनीं।

जाहिर है सदन के अंदर भाजपा भले ही मजबूत स्थिति में हो उसके पास 108 विधायकों का समर्थन हो अनुभवी नेता प्रतिपक्ष हो साथ में 13 साल तक मुख्यमंत्री रहने वाले शिवराज सिंह चौहान हों, सदन के अंदर भाजपा यदि कांग्रेस के आरोपों का विरोध करती है या फिर मौन रहती है दोनों ही स्थितियों में भाजपा को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा के लिए अभी मुख्यमंत्री कमलनाथ के रुख का इंतजार रहेगा जो बोलते कम हैं और काम ज्यादा करते हैं। वे ना तो दिग्विजय सिंह और शिवराज सिंह जैसे भाषण देते हैं और ना बयान देते।

बस यह जरूर कहते हैं कि कमलनाथ की चक्की धीमी जरूर चलती है लेकिन बारीक पिसती है। सो सदन में अब तक कितनी ही बार घोटालों पर हंगामा हुआ कितनी बार जांच कमेटियां बैठी और कितनी बार चुनौतियां दी गई लेकिन अंत में छोटे-छोटे कर्मचारी-अधिकारियों पर कार्रवाई हो जाती है। बड़े अधिकारी और बड़े नेता निशाने पर जरूर रहते हैं लेकिन कार्रवाई अब तक किसी पर नहीं हो पाई।

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