• [EDITED BY : Rakesh Agnihotri] PUBLISH DATE: ; 10 July, 2019 02:02 PM | Total Read Count 166
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‘बजट’ किसको देगा ताकत ‘नाथ’ या ‘कमल’ को..!

राकेश अग्निहोत्रीः लोकसभा चुनाव से पहले लेखानुदान पेश करने वाली कमलनाथ सरकार के पहले बजट से प्रदेश की जनता को काफी उम्मीदें हैं.. जो पिछले दिनों मोदी सरकार 2 द्वारा लाए गए बजट से निराश भले ही ना हो.. लेकिन संतुष्ट भी नजर नहीं आई.. जब मोदी सरकार में गरीबों पर फोकस बनाते हुए उद्योगपतियों को भरोसे में लेने की अपनी लाइन को आगे बढ़ाया तब ऐसे में क्या मध्यप्रदेश में कमलनाथ अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिए क्या मध्यमवर्गीय को रिझा पाएंगे.. वह भी तब जब  जब भाजपा अपनी शिवराज सरकार द्वारा शुरू की गई जनहितैषी योजनाओं को बंद किए जाने का आरोप लगाते हुए किसान कर्जमाफी को लेकर आक्रामक हो चुकी है.. 

तब आर्थिक सर्वेक्षण को आधार बनाकर कांग्रेस का तथाकथित समृद्धि और विकास के नाम पर संसाधनों की लूट का आरोप लगाने में छुपे सियासी संदेशों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है.. कांग्रेस ने वचन पत्र में जो वादे किए थे उसे अमलीजामा पहुंचाने की स्पष्ट झलक क्या कमलनाथ के इस बजट में देखने को मिलेगी.. तो बड़ा सवाल पेट्रोल जैसे मुद्दे पर टैक्स लगाने में देर नहीं कर मोदी सरकार को पीछे छोड़ देने वाली कमलनाथ सरकार आखिर प्रदेश की जनता से किए गए अपने वादों पर खरा उतरकर दिखाने के लिए कितनी संजीदा नजर आएगी.. सवाल इस बजट से खासतौर से मध्यम वर्ग की उम्मीदें क्या पूरी होंगी.. जिसे मोदी सरकार पहले ही निराश कर चुकी है तो बजट आखिर नाथ या फिर कमल का फूल वाली भाजपा को ताकत  देगा.. 

मोदी के बजट से निराश 'मध्यमवर्गीय' को संतुष्ट कर पाएगा नाथ का बजटः केंद्र सरकार की योजनाओं पर राज्य सरकार की भी पैनी नजर है.. जिसके जरिए गरीबों को वह लुभाना चाहेगी तो कमलनाथ सरकार की बड़ी चिंता किसान कर्ज माफी योजना है.. जिसके लिए समुचित बजट का अभाव सरकार के लिए गले की हड्डी बन चुका है.. कांग्रेस की नजर आने वाले समय में नगरी निकाय और पंचायत चुनाव पर है तो चिंता कहीं किसान कर्ज माफी का वादा उसकी समस्या में इजाफा तो नहीं कर देगा.. सरकार के लिए चुनौती इसकी भरपाई करने की होगी.. 

कमलनाथ सरकार जो 6 माह पूरे होने का जश्न पहले ही मना चुकी है.. अब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती वचन पत्र में किए गए वादों को पूरा करते हुए दिखाई देने की होगी.. कई वचन पूरा करने का यह सरकार दावा करती रही है  लेकिन  फंड के अभाव में  कई योजनाएं अघोषित तौर पर  आगे नहीं बढ़ पा रही.. चाहे फिर पहली सबसे बड़ी प्राथमिकता किसान कर्ज माफी हो.. जो सीधे राहुल गांधी के वादे और उनके भरोसे से जुड़ी हुई है.. तो इसके अलावा शिवराज सरकार की जनहितैषी योजनाओं को और प्रभावी और रियायती बनाने के संकेत मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दिए थे.. 

उस लाइन पर भी सरकार को आगे बढ़ते हुए नजर आना होगा.. वह भी तब जब दीनदयाल रसोई योजना हो या फिर दूसरी योजनाओं को बजट के अभाव में बंद कर देना के आरोप कांग्रेस की सरकार पर लग रहे.. सदन के अंदर यदि कांग्रेस सरकार के मंत्री और विधायक अभी भी पिछले 15 साल का हवाला देकर यदि भाजपा को कोस रहे तो उनकी दिलचस्पी अपनी सरकार की कमजोरियों को छुपाने में भी नजर आती है.. दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने जिस तरह पहली बार सदन के अंदर किसान कर्ज माफी को एक बड़ा मुद्दा बनाने के स्पष्ट संकेत दिए हैं.. 

उसे भी इस सरकार को समझना होगा.. भाजपा हो या कांग्रेस के विधायक दल की बैठक में बनी रणनीति से पहले ही यह संदेश निकलकर आ चुका कि एक-दूसरे की घेराबंदी के लिए अब सरकार की उपलब्धियों और उनकी खामियों को सामने रखा जाएगा.. कमलनाथ सरकार को केंद्र की मोदी सरकार से जो आर्थिक सहायता और प्रदेश को उसका हक देने की जो उम्मीदें थी.. अब उसके आरोप-प्रत्यारोप में तब्दील होने से इनकार नहीं किया जा सकता.. बजट से पहले सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष की ओर से भी एक-दूसरे को संकेत दिए जा चुके हैं.. कर्ज माफी को लेकर सदन में हंगामे के बीच बीजेपी का वॉकआउट.. सड़क पर आंदोलन की चेतावनी.. पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा शून्यकाल में लाए गए स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा की मांग स्वीकार नहीं किए जाने के कारण यह स्थिति निर्मित हुई.. 

शिवराज ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अपने वचन पत्र में वादा किया था कि 200000 तक के किसानों के कर्ज माफ किए जाएंगे.. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है.. अब सिर्फ अल्पकालीन ऋण माफ किए जा रहे.. कर्ज माफी के लिए 48 हजार करोड़ चाहिए.. जबकि सरकार ने सिर्फ 5000 करोड़ रुपए का ही प्रावधान किया है.. इससे किसान परेशान हैं.. बैंक ऋण नहीं दे रहा है.. वह पुराना कर्ज चुकाने की बात कर रहा है.. इसके चलते किसान साहूकारों से खाद-बीज ले पा रहा.. लोक महत्व के विषय पर सभी काम रोक कर चर्चा की मांग करते हुए शिवराज के नेतृत्व में भाजपा ने वॉकआउट किया.. तो नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि किसान आत्महत्या कर रहा है चर्चा होना चाहिए..

बाद में सदन मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दिया गया.. वित्त मंत्री तरुण भनोट ने कमलनाथ सरकार के पहले बजट पर स्पष्ट किया है कि जनता को वह निराश नहीं करेंगे.. जो काम केंद्र सरकार के बजट में किया जा चुका है.. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने जरूर प्रदेश के बेरोजगार युवाओं को ज्यादा अवसर उपलब्ध कराए जाने की घोषणा प्रश्नकाल के दौरान की.. उन्होंने भरोसा दिलाया कि प्रदेश में आने वाले निजी क्षेत्रों के उन्हें उद्योगों को शासकीय स्तर पर सुविधाएं दी जाएंगी.. 

जो 70% पदों पर प्रदेश के युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराएंगे.. इस बीच प्रस्तावित बजट से ठीक पहले कांग्रेस नेता शोभा ओझा और अभय दुबे ने आर्थिक सर्वेक्षण को आधार बनाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की और आरोप लगाया कि बीते 15 वर्षों में भाजपा सरकार ने प्रदेश को भयावह स्थिति में पहुंचा दिया.. जिससे सामाजिक आर्थिक विकास चुनौतियां खड़ी हो गई हैं.. तथाकथित समृद्धि और विकास के नाम पर संसाधनों की लूट की गई और पूरे प्रदेश को गरीबी की आग में झोंक दिया गया.. यही वजह है कि मध्यप्रदेश में प्रति व्यक्ति आय देश और समान परिस्थितियों वाले राज्यों के तुलना में कम है.. 

नाथ के वचनः  भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आयोग का गठन 2 किसानों का बिजली बिल आधा 3 किसानों का कर्ज माफ़ होगा 4 सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि 300 से बढ़ाकर 1000 5 महिलाओं के स्वसहायता समूह के क़र्ज़ माफ़ 6 बच्चियों के विवाह के लिये 51000 का अनुदान

7 विधान परिषद का गठन 8 10000 प्रतिमाह हर परिवार के एक बेरोज़गार को सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में 1 लाख युवा को नौकरी 9 पहले 100 यूनिट का एक रुपये बिजली का बिल 10 सभी फसलों और कुछ सब्जियों पर बोनस 11 पांच रुपये लीटर दूध सबके लिए घर के अधिकार का कानून 12 बेघर लोगों को 450 स्क्वायर फीट जमीन या फिर ढाई लाख रुपये 13 ड्रग्स मुक्त राज्य

14 मध्य प्रदेश के प्रोडक्ट को बढ़ावा व्यापमं मामले की फिर से जांच 15 छात्राओं को स्कूल से पीएचडी तक की मुफ्त पढ़ाई बोर्ड परीक्षा में 70 फीसदी अंक लाने वाले सभी छात्रों को लैपटॉप 16 अनुसूचित जाति के सभी लोगों को जमीन का अधिकार 17 60 साल से अधिक उम्र वाले पत्रकारों को 10 हजार रुपये पेंशन 18 नदी के उद्गम स्थल अमरकंटक को संरक्षित कर नर्मदा के अस्तित्व को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई 19 प्रदेश के सफल उद्योगपतियों को ब्रांड एंबेसडर बनाकर उनके माध्यम से नये निवेशकों से संवाद स्थापित

20 इंदौर, ग्वालियर तथा जबलपुर में ट्रांसपोर्ट हब बनाने का वादा 21 सड़कों के लिए समयसीमा में काम पूरा करने की जवाबदेही सुनिश्चित करने का वचन 22 12वीं परीक्षा के जिलेवार आला विद्यार्थियों को दुपहिया वाहन 23 महिला सुरक्षा की दृष्टि से 17 से 45 साल की महिलाओं को निशुल्क स्मार्ट फोन

24 2008 से 2018 तक की व्यापमं, पीएमटी, डीमेट, अन्य परीक्षाओं से प्रभावित प्रदेश के मूल निवासी अभ्यर्थियों के जमा शुल्क वापस होंगे 25 सभी विभागों में गैर-राजपत्रित तृतीय श्रेणी के पद संभागीय संवर्ग एवं चतुर्थ श्रेणी के पद जिला संवर्ग में मानते हुए जिला स्तर पर भर्ती। 

गरीबी के मामले में मप्र देश में 27वें पायदान परः मध्यप्रदेश सरकार ने मंगलवार को आर्थिक सर्वेक्षण जारी किया, जिसमें राज्य की गरीबी उन्मूलन व स्वास्थ्य सूचकांकों पर चिंता जताई गई है। गरीबी के मामले में राज्य देश के 29 राज्यों में से 27वें क्रम पर है, यानी देश के सबसे गरीब दो राज्यों के बाद तीसरे स्थान पर है। वहीं कुपोषण से पांच वर्ष तक के बच्चों की होने वाली मौतों की दर 77 प्रति हजार है, जो असम को छोड़कर देश में सर्वाधिक है। 

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, प्रदेश में गरीबी उन्मूलन अभी भी एक चुनौती बना हुआ है, क्योंकि 29 राज्यों में से मध्य प्रदेश 27वें स्थान पर है। जीडीपी में कृषि का योगदान वर्ष 2017-18 में 37.4 प्रतिशत था, जो घटकर 37़17 प्रतिशत हो गया है। यदि वर्ष 2011-12 से तुलना की जाए तो प्रचलित भाव में कृषि क्षेत्र का जीडीपी में योगदान 39़ 06 प्रतिशत था, जो 18-19 में 35़ 94 होने की संभावना है। प्रति व्यक्ति आय 82,941 रुपये से बढ़कर 2018-19 में 90,998 रुपये हो गई है। 

मगर अभी भी यह अन्य प्रमुख राज्यों से कम है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, प्रदेश की शिशु मृत्यु दर भी देश में सबसे अधिक है। प्रदेश में यह दर प्रति हजार पर 43 है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर शिशु मृत्यु दर 33 है। हालांकि वर्ष 2017-18 से तुलना की जाए तो इस दर में सात की कमी हुई है। इसी तरह मातृ मृत्यु दर अन्य राज्यों की तुलना में काफी अधिक है। मध्यप्रदेश में जहां प्रति लाख प्रसव पर यह दर 173 है, वहीं राष्ट्रीय स्तर पर यह 130 है। 

सरकार के प्रयासों के बावजूद मध्यप्रदेश में कुपोषण अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। प्रदेश में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 77 है, जो असम को छोड़कर अन्य किसी प्रदेश से सबसे अधिक है। राज्य सरकार के आय के स्रोत से राजस्व में वृद्धि हुई है, लेकिन बिक्री कर एवं यात्री एवं माल पर कर में 24़ 28 प्रतिशत की कमी आई है।

इसी प्रकार माल तथा यात्रियों पर लगाए जाने वाले करों में यह कमी 98़ 64 प्रतिशत देखी गई है। सर्वेक्षण के अनुसार, मध्यप्रदेश में मुख्य फसलों का क्षेत्रफल घट रहा है। वर्ष 2017-18 में धान, मक्का और गेहूं 17526 हजार हेक्टेयर में बोया गया था, जो 18-19 के अनुमान के अनुसार 17127 हजार हेक्टेयर रह गया है। इसी तरह राज्य में दलहनी फसलों का क्षेत्रफल और उत्पादन कम हुआ है। 

प्रदेश के लिए चिता की बात यह है कि सोया स्टेट के नाम से मशहूर मध्यप्रदेश में सोयाबीन के क्षेत्रफल और उत्पादन में भी कमी आ रही है। सर्वेक्षण में के मुताबिक, वर्ष 2016-17 की तुलना में वर्ष 17-18 में सोया के क्षेत्रफल में 7़ 23 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि उत्पादन में यह कमी 19़ 97 प्रतिशत है। वर्ष 16-17 में सोयाबीन का उत्पादन 6649 हजार मीट्रिक टन था, जो 17-18 में घटकर 5321 हजार मीट्रिक टन रह गया है।

सर्वेक्षण के अनुसार, मध्यप्रदेश में मांस और अंडे का उत्पादन बढ़ा है। वर्ष 2016-17 में मांस का उत्पादन 79 हजार मीट्रिक टन था, जो बढ़कर 89 हजार मीट्रिक टन हो गया है। यानी इसमें 12 प्रतिशत की वृद्घि हुई है। इसी तरह अंडों के उत्पादन में 14़ 65 प्रतिशत की वृद्घि दिखाई गई है। आश्चर्यजनक बात यह है कि मांस और अंडे के उत्पादन की वृद्घि दूध उत्पादन में हुई वृद्घि से अधिक है। 

मध्य प्रदेश के उद्योग का प्रदेश की जीडीपी में योगदान कम होता जा रहा है। वर्ष 2011-12 में यह 27. 09 प्रतिशत था, जो वर्ष 17-18 में घटकर 24.14 हो गया है। हालांकि प्रदेश में एमएसएमई से संबंधित उद्योग ज्यादा स्थापित हो रहे हैं। प्राथमिक एवं माध्यमिक शालाओं में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में गिरावट आई है। वर्ष 2016-17 में प्राथमिक शालाओं में कुल नामांकन 78. 92 लाख था, जो वर्ष 2017-18 में घटकर 77. 30 लाख रह गया है। इसी तरह माध्यमिक शालाओं में कुल नामांकन 44. 61 लाख से घट कर 43. 63 लाख रह गया है। हालांकि बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में कमी आई है।

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