कांग्रेस नेता के ‘पंज प्यारा’ वाले बयान को लेकर पंजाब में ताजा विवाद

हरीश रावत ने मंगलवार को उनकी और उनके कार्यकारी अध्यक्षों की तुलना गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा में शामिल किए गए “पंज प्यारों” से की।

संसद नहीं चलने से किसका भला!

अमित शाह ने अपने खास अंदाज में घटना की क्रोनोलॉजी समझाते हुए कहा कि इस तरह की चीजों से कुछ लोग विकास को पटरी से उतारना चाहते हैं। मकसद तो सरकार ने बता दिया पर बड़ा सवाल है कि कौन ऐसा कर रहा है? सरकार उसका पता क्यों नहीं लगा रही है और सबसे बड़ा सवाल यह है कि संसद नहीं चलने का फायदा किसको होना है?

विपक्ष की साझेदारी कहां है

आम आदमी पार्टी को पंजाब में इस बार ज्यादा आक्रामक तरीके से चुनाव लड़ना है। तभी आप ने कृषि बिल पर चर्चा के लिए नोटिस दिया है। कायदे से कृषि कानूनों और किसानों का मुद्दा समूचे विपक्ष को साझा तौर पर उठाना चाहिए था। कांग्रेस, लेफ्ट, एनसीपी आदि पार्टियों को एक साथ मिल कर यह मुद्दा उठाना चाहिए था।

अतिरिक्त प्रभार वाली शासन व्यवस्था

modi government administration : ऐसा नहीं है कि भारत सरकार सिर्फ एक्सटेंशन पाए अधिकारियों के सहारे चल रही है, अतिरिक्त प्रभार वाले अधिकारी, मंत्री, राज्यपाल, प्रशासक आदि भी इसमें अपना योगदान दे रहे हैं। सरकार के पास समय ही नहीं है कि वह पूर्णकालिक नियुक्ति कर सके! दिल्ली पुलिस के कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव रिटायर हुए हैं तो केंद्र सरकार ने उनकी जगह बालाजी श्रीवास्तव को दिल्ली पुलिस कमिश्नर का अतिरिक्त प्रभार सौंपा है। वे दिल्ली पुलिस के विशेष आयुक्त की अपनी मौजूदा जिम्मेदारी के साथ साथ दिल्ली पुलिस आयुक्त का काम भी संभालेंगे। ठीक इसी तरह एसएन श्रीवास्तव को एक मार्च 2020 को दिल्ली पुलिस आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार मिला था। उसके बाद वे मई 2021 तक अतिरिक्त प्रभार में ही काम करते रहे। रिटायर होने से एक महीना पहले उनको स्थायी नियुक्ति दी गई। अभी पिछले दिनों केंद्र सरकार ने बड़े शोर-शराबे के बाद सीबीआई का पूर्णकालिक निदेशक नियुक्त किया। उससे पहले चार महीने तक प्रवीण सिन्हा एडिनशल चार्ज में सीबीआई निदेशक का काम देखते रहे थे। यह भी पढ़ें: कश्मीरी पंडितों की सरकार से नाराजगी केंद्र सरकार के कई अहम मंत्रालय अतिरिक्त प्रभार में चल रहे हैं। भाजपा की सहयोगी शिव सेना अलग हुई तो उसके कोटे के… Continue reading अतिरिक्त प्रभार वाली शासन व्यवस्था

25 साल बाद अकाली और बसपा साथ

चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम हुआ है। भाजपा से अलग हुई अकाली दल ने बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनावी तालमेल कर लिया है। दोनों पार्टियां 25 साल बाद साथ आईं हैं और मिल कर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। चुनाव जीतने पर दलित उप मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान कर चुके अकाली दल को बसपा के साथ आने से बड़ा फायदा होने की उम्मीद है। शिरोमणी अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी ने शनिवार को सीटों के बंटवारे का भी ऐलान कर दिया। बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्र की मौजूदगा में प्रेस कांफ्रेंस में गठबंधन की घोषणा करते हुए अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने इस गठबंधन को पंजाब की राजनीति में नया सवेरा बताया। उन्होंने कहा- आज ऐतिहासिक दिन है, पंजाब की राजनीति की बड़ी घटना है। बादल ने कहा कि अकाली दल और बसपा साथ मिल कर 2022 विधानसभा चुनाव और अन्य चुनाव लड़ेंगे। बादल ने सीटों की घोषणा करते हुए कहा कि राज्य की 117 विधानसभा सीटों में से बसपा 20 पर चुनाव लड़ेगी और बाकी 97 सीटों पर अकाली दल के उम्मीदवार लड़ेंगे। बसपा माझा में पांच, दोआबा में आठ और मालवा इलाके में सात सीटों पर लड़ेगी। उसके… Continue reading 25 साल बाद अकाली और बसपा साथ

पंजाब में दलित वोट के लिए बड़े बड़े वादे

भाजपा और उसकी पुरानी सहयोगी पार्टी अकाली दल दोनों पंजाब में दलित वोटों के लिए बड़े बड़े वादे कर रहे हैं। अगले साल होने वाले चुनाव से पहले दोनों पार्टियों की नजर दलित वोटों पर है। इसका कारण यह है कि पंजाब में किसान, जो आमतौर पर जाट और जाट सिख हैं वे कांग्रेस का समर्थन करते दिख रहे हैं। केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध किसान पिछले 141 दिन से दिल्ली की सीमा पर आंदोलन कर रहे हैं। इन आंदोलनकारी किसानों में बड़ा हिस्सा पंजाब के किसानों का है। पिछले दिनों पंजाब में शहरी निकायों के चुनाव हुए थे, जिनमें भाजपा और अकाली दल दोनों का सुपड़ा साफ हो गया। तभी दोनों पार्टियों ने अपनी रणनीति बदली है और दलित वोट को लुभाने का प्रयास शुरू किया है। इस प्रयास में भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा वादा किया है। भाजपा ने कहा है कि राज्य में उसकी सरकार बनी तो वह किसी दलित को मुख्यमंत्री बनाएगी। ध्यान रहे देश के किसी दूसरे राज्य के मुकाबले पंजाब में ज्यादा दलित हैं। वहां 33 फीसदी आबादी दलितों की है। इसलिए कायदे से भाजपा का वादा अपील करना चाहिए पर मुश्किल यह है कि भाजपा के पास पंजाब में… Continue reading पंजाब में दलित वोट के लिए बड़े बड़े वादे

गठबंधन ऐसे ही चलता है!

अकाली दल को शिकायत है कि भाजपा अब पहले वाली भाजपा नहीं रह गई है। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के समय सहयोगी पार्टियों को जैसा सम्मान मिलता था, वैसा सम्मान अब नहीं मिलता है।

मोदी सरकार, कृषि बिल और अकाली

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर राज कर रहे जिस प्रधानमंत्री का हर दिन उनके जन्मदिन जैसा ही होता है उन्हें अपने 70वें जन्मदिन पर ऐसी सौगात मिलेगी इसकी उन्होंने स्वयं में भी कल्पना नहीं की होगी।

बादल परिवार क्या चाहता है?

पंजाब में लंबे समय तक सरकार चला चुकी अकाली दल में इन दिनों घमासान चल रहा है। पार्टी के अनेक पुराने नेताओं ने पार्टी छोड़ी है। पार्टी के राज्यसभा सांसद सुखदेव सिंह ढींढसा ने खुलेआम बादल परिवार पर सवाल उठाए।

भाजपा के जीते विधायकों का क्या होगा

दिल्ली के चुनाव में सबकी नजर इस बात पर है कि पिछली बार भाजपा के जो तीन विधायक जीते थे उनका क्या होगा? पिछली बार भाजपा विश्वास नगर, मुस्तफाबाद और रोहिणी सीट से जीती थी। ओपी शर्मा, जगदीश प्रधान और विजेंद्र गुप्ता को कामयाबी मिली थी।

मनसे आएगी, अकाली बाहर होंगे

अकाली दल और भाजपा का तालमेल क्या खत्म होने वाला है? अकाली दल के नेता सुखबीर बादल ने हालांकि इससे इनकार किया है। उन्होंने दिल्ली के चुनाव में भाजपा का समर्थन भी कर दिया है। पर भाजपा को समर्थन करने का फैसला बहुत बाद में और बहुत मान मनौव्वल के बाद आया है।

जजपा, अकाली दल क्यों नहीं लड़े?

जिस तरह दिल्ली के चुनाव में यह बड़ा सवाल है कि जदयू और लोजपा ने भाजपा से क्यों तालमेल कर लिया उसी तरह का सवाल है कि अकाली दल और हरियाणा में भाजपा की सहयोगी जननायक जनता पार्टी चुनाव क्यों नहीं लड़े? पहले कहा जा रहा था कि भाजपा अकाली दल को चार सीटें देने जा रही है और जजपा को पांच-छह सीट दी जा सकती है।

बगावत है या नीतीश का खेल?

लखनऊ में हुए अमित शाह के भाषण ने बहुतेरों की नींद उड़ा दी है। उन्होंने दो टूक शब्दों में चुनौती देते हुए कहा है कि नागरिकता संशोधन क़ानून किसी भी हालत में वापस नहीं होगा। जिस को जो करना है कर ले। वैसे शाहीन बाग़ के अलावा दश में कहीं कुछ हो भी नहीं रहा। यहाँ तक कि बंगाल में भी ममता शाहीन बाग़ जैसा विरोध नहीं दिखा पा रहीतो अमित शाह की चुनौती सीधे शाहीन बाग़ में धरने पर बैठे मुसलमानों को है| कांग्रेस शाहीन बाग़ के धरने को सेक्यूलर बनाने की भरसक कोशिश कर रही है लेकिन एक बार जो छवि बन जाती हैवह टूटती नहीं| अलबत्ता कांग्रेसियों के वहां जाने से हिन्दुओं को फिर से हिन्दू आतंकवाद वाले जुमले ही याद आ रहे हैं। कांग्रेस ने नागरिकता संशोधन क़ानून के नाम पर शाहीन बाग़ से ले कर मुम्बई तक मुसलमानों को साधना शुरू दिया हैजबकि मुसलमानों का नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध उन की भारत के प्रति प्रतिबद्धता को ही कटघरे में खडा कर रहा है। नागरिकता संशोधन क़ानून का भारत के हिन्दू या मुस्लिम की नागरिकता से कुछ लेना देना है ही नहीं। देश की आम जनता यह मान रही है कि मुसलमानों का विरोध इस… Continue reading बगावत है या नीतीश का खेल?

छोटी सहयोगी पार्टियों का क्या होगा?

भाजपा की छोटी सहयोगी पार्टियां भी मंत्रिपरिषद के विस्तार की आस लगाए बैठी हैं। वैसे अपनी पार्टी के इकलौते सांसद रामदास अठावले को पिछली बार में ही मंत्री बना बना दिया गया था। इसी तरह दो सांसदों वाली पार्टी अकाली दल को भी एक मंत्री पद मिल गया था।

भाजपा दिल्ली में करेगी तालमेल!

भारतीय जनता पार्टी के पास कोई चेहरा आगे करके चुनाव लड़ने की बजाय दो पार्टियों के साथ तालमेल करके सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने का विकल्प भी है। भाजपा की दो सहयोगी पार्टियों, अकाली दल और दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी के साथ तालमेल की बात चल रही है।

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