केरल का उल्टा अध्यादेश

केरल की वामपंथी सरकार को हुआ क्या है ? उसने ऐसा अध्यादेश जारी करवा दिया है, जिसे अदालतें तो असंवैधानिक घोषित कर ही देंगी, उस पर अब उसके विपक्षी दलों ने भी हमला बोल दिया है।

कृषि कानूनों के पहले से थी तैयारी

केंद्र सरकार ने तीन कृषि कानून तो अब पास किए हैं पर रिलायंस और अदानी समूह कृषि व खाने-पीने की चीजों के कारोबार में बहुत पहले से उतर गए थे।

विपक्षी सरकारें कृषि कानूनों पर क्या करेंगी?

संविधान की व्यवस्था के मुताबिक कृषि राज्यों का विषय है। राज्यों को इस पर कानून बनाने और अमल करने का अधिकार होता है। लेकिन इसके साथ ही समवर्ती सूची में भी इसका जिक्र किया गया है और कहा गया है कि केंद्र व राज्य दोनों मिल कर उत्पादन, आपूर्ति, वितरण आदि का नियंत्रण करेंगे।

क्या किसानों के साथ आएगा पूरा विपक्ष?

देश के कई राज्यों में चल रहे किसान आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास हो रहा है। कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार की सहयोगी पार्टियों से भी अपील की है कि वे किसानों का समर्थन करें। भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगियों में से एक अकाली दल ने किसानों के मसले पर भाजपा का साथ छोड़ा है।

देश भर में किसानों का प्रदर्शन

कृषि से जुड़े तीन कानूनों को लेकर देश भर में प्रदर्शन जारी है। इन कानूनों के विरोध में भारत बंद के आयोजन के दो दिन बाद सोमवार को एक बार फिर पूरे देश में किसान सड़कों पर उतरे और प्रदर्शन किया।

केंद्र का कानून खारिज करेंगी कांग्रेस सरकारें

कांग्रेस पार्टी की राज्य सरकारें कृषि सुधार के नाम पर बनाए गए तीन नए कानूनों को खारिज करने की तैयारी कर रही हैं। कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इसका संकेत देना शुरू कर दिया है और इसके बीच कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी उन्हें ऐसा करने के लिए कहा है।

कृषि विधेयकों को राष्ट्रपति से मंजूरी

विपक्षी पार्टियों की मांग और देश के कई हिस्सों में चल रहे किसान आंदोलन की अनदेखी करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने विवादित कृषि विधेयकों को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति कोविंद ने तीन कृषि विधेयकों पर दस्तखत कर दिए है।

कई राज्यों में दिखा बंद का असर

तीन विवादित कृषि विधेयकों के विरोध में देश भर के किसान संगठनों की ओर से आयोजित भारत बंद का असर कई राज्यों में दिखा है। शुक्रवार को पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि इलाकों में बंद का जबरदस्त असर दिखा।

आज किसानों का भारत बंद

कृषि से जुड़े तीन विवादित विधेयकों को ध्वनि मत से पास कराए जाने के मसले पर संसद में कई दिनों तक चली राजनीति अब सड़कों पर आ गई है। देश भर के किसान संगठनों ने शुक्रवार को भारत बंद का आह्वान किया है।

संसदीय समितियां और कृषि विधेयक

मोदी सरकार ने जिस तरह से विपक्ष की परवाह न करते हुए तीनो विवादास्पद कृषि विधेयक को संसद के दोनों सदनो में पारित करवाया है उससे कमोबेश देश में कई जगह सड़को पर विरोध शुरू हो गया है।

फिर संसद की जरूरत क्या है?

संसद का मॉनसून सत्र महज 18 दिन का होना था और वह भी दस दिन में ही खत्म कर दिया गया। सत्र चला भी तो उसमें कई संसदीय गतिविधियों को सीमित कर दिया गया। सत्र के दौरान मोटे तौर पर सिर्फ सरकारी कामकाज हुआ।

विपक्ष ने राष्ट्रपति से की शिकायत

विवादित कृषि विधेयकों को लेकर विपक्षी पार्टियों के सांसदों ने बुधवार को संसद भवन परिसर में मोर्चा निकाला। उसके बाद विपक्षी पार्टियों का एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति से मिला और उनसे अनुरोध किया कि वे कृषि संबंधी विधेयकों पर दस्तखत नहीं करें। विपक्षी पार्टियों ने राष्ट्रपति से कहा कि राज्यसभा में ध्वनि मत से पास कराए गए इन विधेयकों पर सदन में दोबारा वोटिंग होनी चाहिए।

सरकार ने विपक्ष को एक कर दिया

केंद्र सरकार की राजनीति अब तक विपक्ष को बांटने की रही है लेकिन विवादित कृषि विधेयकों पर केंद्र सरकार की राजनीति ने समूचे विपक्ष को एक कर दिया है। विपक्ष की यह एकता संसद के अंदर तो दिख ही रही है, बाहर भी विपक्ष एक होकर सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है।

कांग्रेस-भाजपा की बदली भूमिका

लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और भाजपा की भूमिका बदल गई है। भाजपा सरकार में है और कांग्रेस कमजोर विपक्ष है। भूमिका बदलने के साथ ही दोनों पार्टियों की सोच भी बदल गई है। पहले भाजपा सरकारी अनाज मंडियों और आढ़तियों की व्यवस्था का समर्थन करती थी और पूरी ताकत वालमार्ट जैसी खुदरा कारोबार की कंपनियों का विरोध करती थी।

किसानों पर घटिया राजनीति

किसानों के बारे में लाए गए विधेयकों पर राज्यसभा में जिस तरह का हंगामा हुआ है, क्या इससे हमारी संसद की इज्जत बढ़ी है ? दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश भारत है। पड़ौसी देशों के सांसद हमसे क्या सीखेंगे

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