इंसान को जानवर बनाने के जतन!

सन 2020-21 का लम्हा इंसान को जानवर की मौत मार रहाहै। तभी जीने का तौर-तरीका बदल रहा है। ख्याल बना है इंसान बहुत जी लिया स्वछंदता व स्वतंत्रता से।

फुटपाथ बाजार है भारत का विकास!

परसों मैं वर्षों बाद दिल्ली का करोलबाग घूमा। सोमवार को बाजार बंद रहता है और फुटपाथ बाजार लगता है। 35 साल पहले मैं करोलबाग-देवनगर में रहता था तब भी सोमवार को फुटपाथ बाजार लगा करता था। पर इस सोमवार बाजार देख झनझना उठा। करोलबाग-रैगरपुरा में मुख्य सड़क या गलियों में इतनी-ऐसे दुकानें, इतनी भीड़ मानो झुग्गी-झोपड़ी में हाटबाजार, कीड़े-मकोड़ों का संसार! उफ! कितना कैसा बदला यह करोलबाग-रैगरपुरा-देवनगर इलाका। छोटी-छोटी गलियां भी बाजार में बदली हुईं और उटपटांग निर्माण तो बस्तर के हाट से भी ज्यादा भदेस चीजें, कपड़े-बिंदी से ले कर फुटपाथ पर तले जाते भटूरे, खाने-पीने की चीजें, सब्जियां, मोबाइल एक्सेसरीज। समझ नहीं आया की 35 साल पहले की स्मृतियों के देवनगर-राजेंद्रनगर के बीच के संपन्न इलाके करोलबाग में भला सौ रुपए की जिंस वाला हाट बाजार किन झुग्गी-झोपड़ियों के लिए है? विचार किया तो लगा कि करोलबाग की मुख्य सड़क भले सर्राफा बाजार माफिक सोने-चांदी की दुकानों से भरी हो लेकिन अगल-बगल की गलियों में सस्ते जूते, कपड़े बेचते सप्लायरों और रैगरपुरा-आनंद पर्वत की तंग गलियों के घरों में क्योंकि भीड़ अथाह बस गई है तो जीना भले कच्ची झुग्गी-झोपड़ी वाला न हो लेकिन वह पक्की झुग्गी-झोपड़ी से बेहतर कितना होगा? कोई माने या न माने, अपना ऑब्जर्वेशन… Continue reading फुटपाथ बाजार है भारत का विकास!

न हमें सरस्वती प्राप्त और न लक्ष्मी!

आज वसंत पंचमी है। सरस्वती उर्फ ज्ञान, बुद्धि, विद्या की देवी की पूजा का दिन। मैं पिछले तीन वर्षों से सोचता आ रहा हूं कि इस दिन से हम हिंदुओं के सनातनी ज्ञान, सत्व-तत्व, हिंदू ग्रंथों का आज की हिंदी, मौजूदा वक्त के परिप्रेक्ष्य, वक्त के मुहावरों-जुमलों, भाषा शैली, आधुनिक प्रकृति,माध्यमों में पुनर्लेखन का वह संकल्प शुरू हो, जो मैंने और अपने उद्योगपति शुभचिंतक कमल मुरारका ने फाउंडेशन के एक खांचे में सोचा है। मेरा मानना है (या गलतफहमी?) कि यदि मैंने और मेरे संपादकत्व में चार-पांच हिंदी कलमघसीटों ने अपने आपको पांच-दस साल खपा कर पुनर्लेखन व संपादन का यह काम नहीं किया तो मौजूदा और आगे की पीढ़ियों के लिए महाभारत, रामायण के दो पेज पढ़ना-समझना भी मुश्किल होगा। मेरे बाद की पीढ़ी के मेरे पाठक भी आज सौ साल पहले गीता प्रेस के जरिए प्रसारित महाभारत में हिंदी के दो पेज में दसियों बार यदि अटकते हैं, शब्द अर्थ-बोध में भटकते हैं तो 18 से 40 साल वाली मौजूदा पीढ़ी और आगे की पीढियों के लिए हिंदुओं के तमाम ग्रंथ काला अक्षर भैंस बराबर होंगे! तभी यदि हमने यह काम नहीं किया (सौ साल पहले की खड़ी बोली को पढ़-समझ, सरकारी हिंदी से दूर रहते हुए उसे… Continue reading न हमें सरस्वती प्राप्त और न लक्ष्मी!

न लक्ष्मी चंचल, न लोग चंचल!

बजट से कुछ नहीं सधेगा-1: सन 2020 का मनोभाव है कि यदि सरकार किसी को लाख रुपए दे तो वह खर्च नहीं करेगा, बल्कि उसे दबा कर रख लेगा! मतलब लोगों में भरोसा खत्म है तो वह क्यों कुछ करें? लक्ष्मीजी रूठ गई हैं, घर बैठ गई हैं तो लोग भी, उद्योगपति, धन अर्जन कराने वाले उद्यमी, पुरुषार्थी सब रूठ कर घर बैठ गए हैं। इसलिए सन् 2020-21 के आम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कुछ भी कर लें, साल बाद आर्थिकी एक इंच आगे बढ़ी हुई नहीं होगी। संभव है खड्डे में और ज्यादा फंसी हुई हो। पिछले सप्ताह रिजर्व बैंक के गर्वनर ने सुझाव दिया कि मौद्रिक नीति के उपायों की बजाय आर्थिक सुधार किए जाने चाहिए। सवाल है क्या तो सुधार और किसे चाहिए सुधार? भारत में, भारत की मोदी सरकार में ताकत नहीं जो वह सिस्टम पर कुंडली मारे बैठे नौकरशाहों का लक्ष्मीजी के घर में जबरदस्ती की वसूली का रोल खत्म कर दे। लक्ष्मीजी के पांवों में बेड़ियां डाले मजदूर कानूनों, फैक्टरी-ईएसआई-पीएफ-प्रदूषण-अप्रत्यक्ष कर के प्रशासन आदि के इंस्पेक्टरों-अफसरों की घेरेबंदी को खत्म कर दे। जब ऐसा नहीं हो सकता तो सुधार के नाम पर नौटंकियां होनी है न कि मेक इन इंडिया बनना है।… Continue reading न लक्ष्मी चंचल, न लोग चंचल!

हिंदू-मुस्लिम से ही भारत पिछड़ा!

नंबर एक मसला, हिंदू-मुस्लिम-4 : अपने ज्ञानी स्तंभकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने हाल में लिखा कि ‘कहां चीन और कहां भारत?’ और बताया कि आज चीन में प्रति व्यक्ति आय 10 हजार डालर से ज्यादा है जबकि भारत की प्रति व्यक्ति आय 2000 डालर के आस-पास है। यानी चीन हमसे पांच गुना आगे है। हम चीन के पहले आजाद हुए और चीन प्रारंभिक कई वर्षों तक कम्युनिस्ट बेड़ियों में जकड़ा रहा, फिर भी उसने इतनी जल्दी इतनी उन्नति कैसे कर ली? पर ऐसा अकेले चीन का ही कमाल नहीं है। दुसरे महायुद्ध में बरबाद, धूल-धुसरित हुए जर्मनी, जापान का कमाल है, इजराइल का कमाल है, रूस का कमाल है व कई योरोपीय देशों का कमाल है तो दक्षिण-पूर्व एसिया, अफ्रिका, लातीनी अमेरिका के कई देशों का भी यह कमाल है जो विकास और जीवन की गुणवत्ता में छलांगे मारते हुए भारत से, मतलब हिंदू-मुस्लिम समस्या लिए हुए दक्षिण एसिया से कई गुना बेहतर है। आप नहीं मानेंगे इस बात को और डा वैदिक ने भी ऐसी स्थिति के लिए सोचंे छह कारणों में यह कारण नहीं बताया मगर अपना मानना है कि भारत पिछड़ा है तो वजह हिंदू बनाम मुस्लिम समस्या में भारत का चिरंतन, लगातार फंसे रहना है! जरा… Continue reading हिंदू-मुस्लिम से ही भारत पिछड़ा!

समस्या का पुर्नजन्म और विकास

द्रह अगस्त 1947 के बाद हिंदु बनाम मुसलमान की दुश्मनी का एक फलक भारत और पाकिस्तान में रिश्ते हंै।

मुसलमान को धोखा या मुसलमान से धोखा?

बूढ़ी अम्मा का धरना!-4 : पचहत्तर, अस्सी, पिचासी साल की बूढ़ी मुस्लिम महिलाओं को धरना देते देख ख्याल आया कि सोचो इनका 1947 में बचपन, इनके घर का वक्त किन ख्यालों में गुजरा होगा? मतलब जब हिंदू बनाम मुस्लिम के रिश्तों में नफरत, भारत-पाक के बीच आबादी की आवाजाही, खून खराबा, खौफ, चिंता पीक पर थी तब भी मुसलमान क्यों भारत में रहे? अम्मा के घर में, उनके वालिद ने क्या सोचते हुए दिल्ली का घर नहीं छोड़ा? क्यों नहीं भारत छोड़ा? दो वजह, दो जवाब बनते हैं। या तो गांधी, नेहरू, पटेल से मुसलमानों को भरोसा था कि सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा। मतलब गांधी-नेहरू, हिंदू कांग्रेस के भरोसे, वायदे से मुसलमान भारत में रहे। जबकि मुसलमान के लिए, उनके इस्लाम का अधिकृत नया घर बना था। नई पुण्य-पितृ भूमि बनी थी। अगल-बगल के असंख्य मुसलमानों ने बोरिया-बिस्तर बांध पाकिस्तान को घर बनाया तो वहां से भी हिंदुओं का भारत के अपने नए घर आना हुआ। सो, जो मुसलमान भारत में रहे तो वजह गांधी-नेहरू का, हिंदुओं से इनको भरोसा था कि हम हैं न आपके लिए! दूसरी वजह शायद अम्मा के घर में यह सोच रही होगी कि जन्मभूमि मेरी भारत तो यहीं मरना, यहीं जीना (यह… Continue reading मुसलमान को धोखा या मुसलमान से धोखा?

‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ को कैसे समझें?

लंदन के ‘द गार्जियन’ और कोलकाता के ‘द टेलिग्राफ’ में इस्लामोफोबिया पर विचारणीय लेख-खबर पढ़ने को मिली। कोर सवाल है कि हम (गैर-मुसलमान) इस्लाम पर कैसे सोचें? पृथ्वी के छह अरब लोग उन पौने दो अरब लोगों पर कैसे सोचें जो इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं? भारत के पैमाने में यह सवाल इस तरह होगा कि 125 करोड़ की आबादी में से 105 करोड़ लोग बीस करोड़ मुसलमानों के प्रति क्या नजरिया लिए हुए हों? जान लंे कि सवाल वैश्विक पैमाना लिए हुए है। 9/11 के बाद से दुनिया का सियासी पर्यावरण बिगड़ा है, दुनिया बिगड़ी है तो उसका जिम्मेवार नंबर एक मसला छह अरब लोग बनाम पौने दो अरब मुसलमान हंै? फिलहाल दुनिया में ट्रंप बनाम ईरान या भारत में सीएए, एनआरसी जैसे जितने जो भी बवाल हैं उनका कोर है कि इस्लाम को, मुसलमान को कैसे समझें? सोचें, यह सवाल इस्लाम को ले कर ही क्यों है? कल ‘द गार्जियन’ में ब्रिटेन की नई बॉरिस जॉनसन सरकार में इस्लामोफोबिया पर विश्लेषण (Under Boris Johnson, Islamophobia will reach a sinister new level-Suhaiymah Manzoor-Khan) था तो कोलकाता के ‘द टेलिग्राफ’ में बिशप कॉलेज के प्रिंसिपल के इस भाषण की खबर थी कि इस्लामोफोबिया को मिटाने का अभियान चलना चाहिए (Call… Continue reading ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ को कैसे समझें?

वे निष्काम कर्मी और हम?

नए दशक की सीरिज में आज मुझे दुनिया की संभावनाओं पर लिखना था लेकिन कल नए दशक की भारत संभावनाओं पर लिखते हुए मैं ‘निष्काम कर्म’ शब्द पर ठिठका। इसके मायने में भारत की दशा पर सोचने लगा।एक निष्कर्ष बनता है। पर आगे बढ़ें उससे पहले जाने कि‘निष्काम कर्म’श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को सुनाया यह जीवन सूत्र है- अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः। मतलब कर्म के फल का आश्रय न लेकर जो कर्म करता है, वह संन्यासी भी है और योगी भी। वह नहीं जो अग्निहीन है, न वह जो अक्रिय है। मतलब निष्काम कर्म से सधता है जीवन और जीवन जीने का शिखर। ऐसा तब संभव है जब व्यक्ति बंधा हुआ न हो। व्यक्ति और देश की सामूहिक बुद्धि सत्य, ज्ञान की खोज में निष्काम कर्म करने की मुक्त स्थितियां लिए हुए हो। बंधा होना, गुलामया स्थितियों में कंडीशंड होना मतलब चिंता, भय, लोभ, चापलूसी, कामना, वासना के भावों में व्यवहार का, कर्म का संचालित होना न हो। मतलब फल-परिणाम सोचते हुए, उसमें बंध कर काम (सकाम मतलब निष्काम कर्मका विलोम) नहीं करना। गीता के अनुसार निष्काम भाव काम हुआ तो अल्प कर्म भी ज्ञान का, सिद्धि का,… Continue reading वे निष्काम कर्मी और हम?

हमारे अगले दस साल कैसे?

सोचें, नया दशक याकि अगले दस वर्षों में हमारा क्या होना है? हम वक्त काटेंगे या बुद्धि-हाथ-पांव के निष्काम पुरूषार्थ में कोई मंजिल, कोई शिखर पाएंगे? इस सवाल में दो पेंच है। एक, निष्काम कर्म का और दूसरा मंजिल का। इन दोनों में यदि हम सच्चे होते तो हमारा वह इतिहास और वह वर्तमान नहीं होता, जो है! अपने अध्यात्म, अपनी गीता ने दुनिया को भले ज्ञान दिया हो कि कर्म निष्काम होना चाहिए। मतलबभूख-वासना-लालसा लिए हुए नहीं होना चाहिए लेकिन इस बात को दुनिया ने अपनाया और हमने नहीं! जरा सोचे कि भारत में कितने लोग है जो बिना फल के कर्म करने की प्रवृति लिए हुए है?क्या भारत के दफ्तर में, भारत के तंत्र में बिना फल के कोई चक्का घूमता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मनोवृति बतलाने वाला यह जुमला सटीक है कि इससे मेरा क्या! पर सोचे, क्या नरेंद्र मोदी या अमित शाह इसके अपवाद है? इनकी राजनीति, इनके सकाम कर्म से भी तो चुनाव जीतने की भूख, सत्ता, और पॉवर के फल की कामना जाहिर होती है। यही स्थिति सभी नेताओं, सभी वर्गों, सभी नागरिकों की है। जैसे मोदी-शाह सोचते हैं वैसे बाकी नेता सोचते हैं। मैं सोचता हूं, आप सोचते हैं।निष्काम कर्म नहीं मगर… Continue reading हमारे अगले दस साल कैसे?

मोदी, एनआरसी और‘झूठ’

रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों को, मुसलमानों को गुमराह हुआ बताया। उन्होने दो टूक शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर याकि एनआरसी की बात झूठी है। बावजूद इसके आज भी टीवी चैनलों पर विरोध-प्रदर्शन होते दिखे हैं। दिल्ली के मंडी हाऊस-जंतर-मंतर पर भीड़ दिखी। क्या अर्थ निकाला जाए? या तो देश ने प्रधानमंत्री के कहे को झूठा माना या लोगों को गुमराह करने से विरोधी, शहरी नक्सली बाज नहीं आ रहे हंै! सरकार मुसलमानों को समझाने के लिए विज्ञापनबाजी कर रही है लेकिन मुसलमान भरोसा नहीं कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के कहे जाने के बावजूद नहीं माना जा रहा कि एनआरसी की बात झूठ और फितूर है। सोचंे, प्रधानमंत्री की जुबान बनाम आंदोलित जनता व विरोधी नेताओं के मध्य अविश्वास का कितना बड़ा अंतर, खाई याकि गेप है। यह स्थिति देश की किस दशा को दर्शाती है? 130 करोड लोगों की आबादी में यदि आज यह तौलने बैठे कि कितने लोग प्रधानमंत्री मोदी के कहे पर विश्वास कर रहे हंै और कितने नहीं तो खौफनाक तस्वीर निकलेगी और भारत का जनमानस विभाजित व शासक- प्रजा के बीच खाई बनी हुई दिखेगी। इस बात को वोट, चुनाव, राजनीति के चश्मे में न देखें और विचार करें कि नागरिकता… Continue reading मोदी, एनआरसी और‘झूठ’

ट्रंप हुए दागी अमेरिकी राष्ट्रपति!

अमेरिका के लोकतंत्र को सलाम! ठीक कहा अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक सांसद ने कि क्यों अमेरिका दुनिया का सिरमौर देश है? क्यों तीसरी दुनिया के देशों, बाकी देशों से वह अलग है? इसलिए क्योंकि हम ‘रूल ऑफ लॉ’ में जीते हैं। अमेरिका चेक-बैलेंस लिए हुए है। तभी यदि राष्ट्रपति कानून से परे व्यवहार करेगा तो उसे नहीं बख्शा जा सकता है। सांसद ने आगे कहा सीधा-सपाट तथ्य है कि राष्ट्रपति ने अपने निजी स्वार्थ, निजी राजनीति में दूसरे देश (यूक्रेन) के राष्ट्रपति से लेन-देन किया। घरेलू राजनीति में अपने विरोधी के बेटे की वहां जांच का दबाव बनाया। यूक्रेन की सैनिक मदद रोकी। यह पद का दुरूपयोग नहीं तो क्या? इसका प्रमाण है ट्रंप की फोन पर बातचीत का रिकार्ड और खुफिया एजेंसी के व्हिसलब्लोअर की गवाही। डोनाल्ड ट्रंप का पद कानून और मर्यादा में बंधा हुआ है। वे किंग नहीं जो मनचाहा कुछ भी करें! उनके खिलाफ महाभियोग लोकतंत्र की जरूरत है, वक्त का तकाजा है। और अमेरिकी सांसदों की इस भावना ने 18 दिसंबर 2019 के दिन डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी इतिहास का तीसरा दागी (impeached) राष्ट्रपति घोषित किया! संसद का उच्च सदन याकि सीनेट (राज्यसभा) भले इस फैसले पर मुहर न लगाए और 2020 के चुनाव… Continue reading ट्रंप हुए दागी अमेरिकी राष्ट्रपति!

सोनिया गांधी को कौन समझाए!

कांग्रेस में दम लौटे, वह विकल्प बने, यह आज देश की नंबर एक जरूरत है। 130 करोड़ लोगों, 90 करोड़ मतदाताओं में यदि मोदी-शाह के नैरेटिव का विकल्प नहीं हुआ तो भविष्य में औवेसी जैसे जो विकल्प बनेंगे उसकी कल्पना ही दहलाने वाली है। सोचे औवेसी से नैरेटिव बने और कांग्रेस से नहीं तो देश का क्या बनेगा? और तथ्य है कि बिना नैरेटिव, बिना डुगडुगी के विकल्प बन सकना संभव नहीं। जनता लोकल, प्रादेशिक स्तर पर भले बिना विकल्प के गुस्सा निकाल भाजपा को झटका दे सकती है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर, हिंदू-मुस्लिम, पाकिस्तान की चिंताओ में मतदाताओं और खास कर हिंदू मानस के आगे विकल्प तभी होगा जब वैकल्पिक नैरेटिव और चेहरा अखिल भारतीय स्तर पर हो। लेकिन इन बातों को कौन सोनिया गांधी को समझाए? उन्हे कौन समझाए या पूछे कि शनिवार को भारत बचाओ रैली से उन्हे और उनकी कांग्रेस को क्या हासिल हुआ?सोचंे, अगले दिन क्या सुर्खियां छपी? क्या राहुल गांधी के बयान की यह सुर्खी नहीं कि वे सावरकर नहीं जो माफी मांगे! ऐसे ही रैली की कैसी तस्वीर, फुटेज दिखलाई दी? तो सोनिया, राहुल, प्रियंका के तीन विशाल हार्डिंग्स और तीनों के भाषणों की क्लिपिंग! क्या इससे देश बचेगा और कांग्रेस देश का… Continue reading सोनिया गांधी को कौन समझाए!

बिना बने, लड़े, जीये ही निर्वाण!

इस पहेली का कोई जवाब नहीं है। और मुझे नहीं लगता कि हमारी सभ्यता की एंथ्रोपोलॉजी कभी इसका जवाब तलाश भी सकेगी। पहेली मतलब भला कैसे सिंधु नदी घाटी के सभ्यतागत पालने ने भारत के होमो सेपियंस को शिकारी से शिकार में तब्दील किया?

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