अब आंकड़ें बोलते रहें!

वी शेप रिकवरी का मतलब होता है कि अर्थव्यवस्था जहां से गिरी थी, तेजी से वापस वहीं पहुंच गई है। क्या खुद सरकार के अपने आंकड़ें ऐसा बताते हैं?

ताकि ध्यान सच पर रहे

अगर 23.7 फीसदी की भी विकास दर हासिल हो, तो उसका मतलब होगा कि अर्थव्यवस्था उस जगह पर पहुंचेगी, जहां उसे 30 जून 2020 को होना चाहिए था।

जीएसटी एक लाख करोड़ से नीचे

june GST collection : नई दिल्ली। नौ महीने में पहली बार वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी का संग्रह एक लाख करोड़ से कम हुआ है। जून के महीने में जीएसटी संग्रह घट कर 92,849 करोड़ रुपए हो गया। एक महीने पहले मई में जीएसटी कलेक्शन 1.02 लाख करोड़ रुपए रहा था। उससे एक महीने पहले अप्रैल में जीएसटी कलेक्शन एक लाख 40 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा रहा था। वित्त मंत्रालय ने मंगलवार को जून महीने का जीएसटी डाटा जारी किया। इससे पहले सितंबर 2020 में जीएसटी संग्रह 95,480 करोड़ रुपए रहा था। मोदी की नई कैबिनेट के 90 प्रतिशत मंत्री करोड़पति हैं, 42% पर आपराधिक मामले : ADR की रिपोर्ट जून में कुल जीएसटी संग्रह में केंद्र सरकार का हिस्सा यानी सीजीएसटी 16,424 करोड़ रुपए है। राज्यों का हिस्सा यानी एसजीएसटी 20,397 करोड़ रुपए और इंटीग्रेटेड यानी आईजीएसटी 49,079 करोड़ रुपए रहा। उपकर करीब 6,949 करोड़ रुपए रहा। सरकार की ओर से बयान में कहा गया है कि जून में जीएसटी राजस्व पिछले साल की समान अवधि से दो फीसदी ज्यादा है। जीएसटी कलेक्शन का यह आंकड़ा पांच जून से पांच जुलाई के बीच का है। सरकार की ओर से बताया गया है कि पांच जून से पांच… Continue reading जीएसटी एक लाख करोड़ से नीचे

समस्या देशों के अंदर है

जब तक ये व्यवस्था नहीं बदलती, इस समस्या का हल वैश्विक स्तर पर ढूंढना महज उन संसाधन को वापस धनी देशों में लाने का प्रयास भर है, जो अभी आयरलैंड या लक्जमबर्ग या बारबेडोस जैसे देशों को इसलिए मिल जाते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने यहां टैक्स दरें कम कर रखी हैँ। global minimum tax : ये खबर ऊपर से आकर्षक लग सकती है कि अमेरिका की पहल पर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले 130 देश वैश्विक न्यूनतम कर (ग्लोबल मिनिमम टैक्स) के प्रस्ताव पर सहमत हो गए हैं। ये देश दुनिया की अर्थव्यवस्था के 90 फीसदी हिस्से की नुमाइंदगी करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर ये टैक्स व्यवस्था लागू हो भी गई, तो क्या उससे पूरी दुनिया में प्रगतिशील टैक्स ढांचा लागू हो जाएगा? प्रगतिशील टैक्स ढांचे का मतलब यह होता है कि जिसकी जितनी अधिक आमदनी है, उससे उतना अधिक टैक्स लिया जाए। दूध पीना और महंगा! Mother Dairy ने भी बढ़ाए दूध के दाम, कल से 2 रुपए देने होंगे ज्यादा अभी हाल में जो तथ्य सामने आए हैं, वे यह बताते हैं कि विकसित देशों ने अपने यहां ऐसा टैक्स ढांचा अपना रखा है, जिससे सबसे धनी लोग सबसे कम और आम मध्यवर्गीय लोग अपनी… Continue reading समस्या देशों के अंदर है

ये विषमता कहां ले जाएगी?

inequality india rich poor : केंद्रीय बैंक बड़ी संख्या में नोट छाप कर ब्याज दरों को कम करना चाहते थे, ताकि लोन देकर उद्योगों को बढ़ावा दे सकें और अर्थव्यवस्था को नुकसान से निकाला जा सके। लेकिन ऐसा होने के बजाए यह पैसा शेयर बाजार में लगाया गया। नतीजतन वही लोग अमीर होते रहे, जो पहले से अमीर थे। कोरोना महामारी की मार पूरी दुनिया पर पड़ी। भारत सबसे बुरी तरह प्रभावित देशों में एक रहा। ये एक आपदा है, यह मानने में कोई हिचक नहीं हो सकती। लेकिन किसी परिवार में अगर किसी आपदा से सभी बराबर पीड़ित हों, तो सब यह मान लेते हैं कि बुरा वक्त आया, तो उसका नतीजा सबको भुगतना पड़ा। लेकिन अगर बुरा वक्त किसी एक तबके लिए चमकने का मौका मिल जाए, तो समाज में सवाल उठेंगे। न सिर्फ सवाल उठेंगे, बल्कि देर सबेर असंतोष भी पैदा होगा। आज हम उसी कगार पर हैँ। एक ताजा रिपोर्ट ने बताया है कि (डॉलर को मुद्रा का आधार मानें तो) 2020 में हर भारतीय परिवार की घरेलू संपत्ति 6.1 प्रतिशत कम हो गई है। रुपये को आधार माने तो यह कमी करीब 3.7 प्रतिशत है। संपत्ति में आई इस कमी की मुख्य वजह यहां जमीन… Continue reading ये विषमता कहां ले जाएगी?

इस अंतर्विरोध का मतलब

यह वो पैसा है, जिसे कंपनियां कुछ समय के लिए लगाती हैं। ऐसे निवेश से ना किसी नौकरी मिलती है और ना ही वहां बुनियादी ढांचे का विकास होता है। तो ऐसा निवेश, जिससे देश में उत्पादक संपत्ति की बढ़ोतरी ना हो, वह अर्थव्यवस्था में एफडीआई की भूमिका पर सवाल खड़े करता है। indias record fdi : भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक भारत में रिकॉर्ड विदेशी निवेश हो रहा है। सरकार का कहना है कि एफडीआई पॉलिसी में सुधार, निवेश के लिए सुविधाएं देने और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के मोर्चों पर सरकार की ओर से उठाए गए कदमों ने देश में एफडीआई को बढ़ाया है। आम धारणा रही है कि विकासशील देशों में उद्योग-धंधे बढ़ाने और नौकरियां पैदा करने में एफडीआई का अहम रोल होता है। इससे देश के बुनियादी ढांचे का विकास होता है। और जब ऐसा होता है, तो रोजगार के अवसर बढ़ते हैँ। विदेशी निवेश के महिमामंडन का यही तर्क है। लेकिन हालांकि अब कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी में इकोनॉमिक्स के एक अध्ययन से सामने आया कि एफडीआई और नौकरियों के बीच संबंध नहीं है। यानी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इतना एफडीआई ( indias record fdi ) आने पर इतनी नौकरियां पैदा… Continue reading इस अंतर्विरोध का मतलब

इस साल भी कावड़ यात्रा में रोड़ा बना कोरोना, चारधाम यात्रा भी की गई रद्द

देहरादून |  कोरोना ने पिछले मार्च 2020 से कोई भी आयोजन नहीं होने दिया है। पिछले साल से देश में कोई भी आयोजन नहीं हो रहे है। सावन के महीने से शुरु होने वाली कावड़ यात्रा पर इस बार भी उत्तराखंड सरकार ने प्रतिबंध ( kawad yatra banned ) लगा दिया गया है। सावन का पवित्र महीने के पहले दिन से या उससे पहले से शिव भक्त गंगाजल लेने के लिए पैदल जाते है। और अपने इलाके में आकर शिवलिंग पर उस जल को अर्पित करते है। कुछ कावड़िये ऐसे भी होते है जो गौमुख तक गंगाजल लेने पहुंच जाते है। गौमुख जहां से गंगा नदी का उद्गम हुआ था। यह दूसरा साल है जब कावड़ यात्रा पर रोक लगाई गई है। कावड़ यात्रा ही नहीं चारधाम यात्रा पर भी सरकार ने हाइकोर्ट के आदेश के बाद रोक लगा दी गई है। चारधाम यात्रा भी रोकी गई kawad yatra banned  चारधाम यात्रा को लेकर कई बार निर्णय बदला जा चुका है। लेकिन सोमवार को हाइकोर्ट ने सरकार के इस फैसले पर रोक लगा दी थी। इके बाद भी उत्तराखंड सरकार ने चारधाम यात्रा को लेकर गाइडलाइन ज़ारी कर दी। लेकिन फिर सरकार ने भी भक्तों के स्वास्थ्य की चिंता करते… Continue reading इस साल भी कावड़ यात्रा में रोड़ा बना कोरोना, चारधाम यात्रा भी की गई रद्द

G7 Summit Infra Project : सपना कैसे होगा साकार?

चीन का मॉडल यह है कि ऋण चीन देता है, चीन की कंपनियां परियोजना पर काम करती हैं, जिनमें चीन में ही उत्पादित सामग्रियों का इस्तेमाल होता है। चीन ऐसा इसलिए कर पाया, क्योंकि वहां अर्थव्यवस्था में सरकार का काफी दखल है। जबकि जी-7 की अर्थव्यवस्था निजी क्षेत्र के हाथ में है। जी-7 ने अपनी हाल की शिखर बैठक में चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना का जवाब उससे भी बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट ( g7 summit infra project ) से देने का एलान किया। इसे बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड (बी3डब्लू) परियोजना नाम दिया गया है। जाहिर है, इसको लेकर दुनिया भर में भारी दिलचस्पी पैदा हुई है। लेकिन असल सवाल यह उठा है कि इस प्रोजेक्ट के लिए धन कौन देगा? चीन का मॉडल तो यह है कि ऋण चीन के ही बैंक देते हैं, चीन की कंपनियां परियोजना पर काम करती हैं, जिनमें ज्यादातर चीन में ही उत्पादित सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह चीन ने अपने अंदरूनी विकास को दुनिया की एक बड़ी परियोजना से जोड़ दिया है। चीन ऐसा इसलिए कर पाया, क्योंकि वहां अर्थव्यवस्था में सरकार का काफी दखल है। पश्चिमी देशों में अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर प्राइवेट सेक्टर के हाथ में है।… Continue reading G7 Summit Infra Project : सपना कैसे होगा साकार?

चौतरफा बदहाली के बीच

केंद्र सरकार के प्रमुख आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम को शायद यही काम सौंपा गया है कि वे सरकार को सलाह देने के बजाय जो हालत है, उसकी सकारात्मक तस्वीर जनता के बीच पेश करने की भूमिका निभाएं। तो उन्होंने कहा दिया है कि जुलाई से अर्थव्यवस्था बिल्कुल अपनी पटरी पर लौट आएगी। पिछले साल उन्होंने कहा था कि लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था की वी शेप रिकवरी होगी। यानी जितनी तेजी से आर्थिक विकास दर गिरी है, उतनी ही तेजी से चढ़ेगी। अब चूंकि वे अपनी कही बातों की कोई जवाबदेही नहीं मानते, इसलिए फिर से एक वैसा ही जुमला उन्होंने उछाल दिया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में भारत की अर्थव्यवस्था 7.3 फीसदी सिकुड़ गई है। इसका विश्लेषण करते हुए भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने ध्यान दिलाया कि 2020-21 के जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े के साथ भारत 194 देशों की रैंकिंग में 142वें नंबर पर आ गया है। जबकि भारत कभी दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते देशों में एक था। ये तो एक पहलू है। दूसरा पहलू कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान हुआ हाल है, जब चौतरफा गिरावट की खबरें आ रही हैं। 2021 में सिर्फ कृषि और बिजली को छोड़कर… Continue reading चौतरफा बदहाली के बीच

World Bicycle Day 2021: आइये जानते हैं साइकिल का महत्व और कोरोना काल में साइकिल का फायदेमंद क्यों?

Delhi | प्रत्येक वर्ष 3 जून को विश्व साइकिल दिवस या वर्ल्ड बाइसिकल डे मनाया जाता है। आधिकारिक तौर पर पहली बार विश्व साइकिल दिवस 3 जून, 2018 को मनाया गया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 3 जून को इस दिन के तौर पर मनाये जाने की घोषणा की थी। साईकिल का हमारे दैनिक जीवन में कितना महत्व है यह तो हम सभी जानते ही है।  विश्व साइकिल दिवस मनाने का उद्देश्य है कि दैनिक जीवन में साइकिल के प्रयोग को लोकप्रिय बनाना और यह समझाना कि साइकिल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहतरीन है। साइकिल सिर्फ मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए भी अनुकूल है। कोरोना काल में बहुत से लोग साइकिल का महत्व समझने लगे है। ऐसा माना जाता है कि अगर आप एक घंटे साइकिल चलाते है तो आपका शरीर स्वस्थ रहता है। कोरोना काल में बहुत से लोग अपनी गाड़िया छोड़ साइकिल पर आ गए है। साइकिल चलाने से फेफड़े मजबूत होते है। सह एक अच्छी एक्सरसाइज मानी जाती है। दूनियाभर के देशों में साइकिल मैरॉथान होती है जिसमें अनेकों प्रतिभागी भाग लेते है। साइकिल मैरॉथान विश्वभर में प्रसिद्ध होती है। इसमें भाग लेने दूर-दूर से लोग आते है। योग और… Continue reading World Bicycle Day 2021: आइये जानते हैं साइकिल का महत्व और कोरोना काल में साइकिल का फायदेमंद क्यों?

ये पहल गौरतलब है

बीते कुछ वर्षों में दुनिया भर मे गिग अर्थव्यवस्था वजूद में आई है। ओला, उबर जैसी कंपनियों के लिए वाहन चलाने वाले ड्राइवरों को गिग वर्कर कहा जाता है। इसी तरह फूड डिलिवरी ब्यॉज या अमेजन या उस जैसी कंपनियां जिन कर्मियों के जरिए अपने सामान घर-घर पहुंचवाती हैं, उन्हें वे अपना कर्मचारी मानने के बजाय कॉन्ट्रैक्टर बताती हैँ। इस तरह उन कर्मियों को तमाम तरह के मजदूर अधिकारों और सुरक्षाओं से वंचित कर दिया जाता है। इस समस्या पर काफी समय से चर्चा चल रही है। इस मामले में एक प्रगति कुछ महीने पहले हुई, ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में उबर ड्राइवरों को उस कंपनी का कर्मचारी घोषित किया। लेकिन उसके बाद ब्रिटेन की बोरिस जॉनसन सरकार ने जो नीति बनाई, वह कोर्ट की भावना से काफी अलग थी। उसने ऐसे कर्मियों को अलग श्रेणी में रख दिया। इसके तहत गिग वर्कर्स को पहले की तुलना में अधिक अधिकार जरूर दिए गए, लेकिन आज भी उनके अधिकार और सुरक्षाएं ‘कर्मचारी’ माने गए कर्मियों से कम हैँ। अब स्पेन में उससे बात आगे बढ़ी है। स्पेन में मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए एक अहम कानून बनाया गया है। इसके तहत ऑनलाइन डिलीवरी प्लैटफॉर्म के लिए… Continue reading ये पहल गौरतलब है

“ट्रिकल डाउन” से तौबा

ट्रिकल डाउन अर्थव्यवस्था का मतलब यह होता है कि अगर धनी तबकों के पास पैसा आता है, तो वह धीरे-धीरे रिस कर निम्न वर्ग तक जाता है। इससे सबकी स्थिति बेहतर होती है। इस आर्थिक सोच के पैरोकार इसे इस रूप में यह भी कहते रहे हैं कि नदी में पानी आता है, तो सबकी नांव ऊपर उठती है। अधिक गंभीर आर्थिक शब्दावली में इसे वॉशिंगटन कॉन्सेसस कहा जाता है, जिस पर अमेरिका और बाकी दुनिया पिछले तीन से चार दशक से चलती रही है। इसीलिए जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस समझ के विपरीत बात कही, तो उसने सबका ध्यान खींचा। राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल में पहली बार कांग्रेस (संसद) के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए बीते हफ्ते बाइडेन ने कहा- ‘ट्रिकल डाउन इकॉनमिक्स कभी कारगर नहीं हुआ। अब समय आ गया है, जब हम नीचे और मध्य स्तरों से अपना विकास करें।’ इस सोच को और आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अति धनी तबकों पर टैक्स बढ़ाने की जरूरत बताई और कहा कि ऐसा करना अमेरिका में आर्थिक गैर-बराबरी की समस्या को हल करने के लिए जरूरी है। बात सिर्फ जुबानी नहीं है। बल्कि बाइडेन ने इसके पहले अपने बहुचर्चित ‘अमेरिकन जॉब्स प्लान’ के तहत… Continue reading “ट्रिकल डाउन” से तौबा

सच तो छिपता नहीं!

नरेंद्र मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था से लेकर कोरोना तक में अपना सबसे कारगर हथियार सच पर परदा डालने को माना। तरीका यह रहा कि अगर आर्थिक आंकड़े अनुकूल ना हों, तो आंकड़े जुटाने का पैमाना बदल दो। बड़े समर्थक जमातों में ये तरीका कारगर रहा। तो इसे कोरोना महामारी में आरंभ से अपनाया गया। संक्रमण और मौतों के कम आंकड़े बता कर सुर्खियों को संभालने की रणनीति यहां भी अपनाई गई। पिछले साल गुजरात हाई कोर्ट ने जब इस बारे में सवाल पूछे तो राज्य सरकार ने बेहिचक कहा था कि सच बताने पर घबराहट फैलेगी। तब चूंकि सच कम भयानक था, इसलिए वो बात चल गई। लेकिन इस बार जब सच विकराल हो गया, तो अब खड़ी गई दीवारों के ऊपर से झांक रहा है। खुद गुजरात हाई कोर्ट कह चुका है कि हकीकत उससे कहीं बदतर है, जितना सरकार बता रही है। अब मीडिया रिपोर्टों से भी सामने आया है कि मौतों का जो आंकड़ा बताया गया है, असल में हुई मौतें उससे न सिर्फ ज्यादा, बल्कि बहुत ज्यादा हैं। एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक 16 अप्रैल को जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य कुल 78 मौतें हुईं। जबकि सिर्फ अहमदाबाद, सूरत, राजकोट, वडोदरा, गांधीनगर, जामनगर… Continue reading सच तो छिपता नहीं!

बंद हो गई पांच ट्रिलियन डॉलर की बात

बड़े दिन से यह सुनने को नहीं मिला कि अब भारत कब तक पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनेगा? पुरानी डेडलाइन 2024 की थी। कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू होने से ठीक पहले अर्थव्यवस्था की बुरी दशा से ध्यान भटकाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था का शिगूफा छोड़ा था। उनके कहने भर की देर थी, भाजपा के हर नेता, केंद्र सरकार के हर मंत्री, हिंदुवादी राजनीति से जुड़े हर शख्स और यहां तक कि सरकारी अधिकारियों की जुबान पर यह जुमला चढ़ गया। सब पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था की बात करने लगे। फिल्म और सामाजिक क्षेत्र की जो शख्सियतें नरेंद्र मोदी को कल्ट मानती हैं उन्होंने तो इसके लिए प्रधानमंत्री को बधाई देनी भी शुरू कर दी। लेकिन अब चारों तरफ सन्नाटा है। एक आकलन के मुताबिक भारत अगर लगातार आठ फीसदी की दर से विकास करे तो 2026 के बाद ही पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है। इसमें भी बहुत अगर मगर हैं। एक आकलन यह भी है कि 2022 में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2020 के मुकाबले छोटा हो जाएगा। यानी एक साल के बाद हम दो साल पीछे होंगे। एक आकलन यह भी कि भारत जिस समय… Continue reading बंद हो गई पांच ट्रिलियन डॉलर की बात

चीन का तरीका जानना चाहिए!

चीन के तमाम पड़ोसी देश इस समय कोरोना वायरस की दूसरी या तीसरी लहर का सामना कर रहे हैं। भारत में तो हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं पर जिन देशों ने पहले वायरस के संक्रमण पर काबू पा लिया था वे भी परेशान हैं। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी वायरस तेजी से फैल रहा है। फिलिपीन और दूसरे देशों में वायरस की नई लहर से परेशानी है। परंतु चीन आराम से बैठा है। उसके यहां बहुत कम संख्या में नए केसेज आए हैं और उसने किसी तरह से उस पर काबू पा लिया है। सोचें, चीन से वायरस की शुरुआत हुई लेकिन उसके यहां अब इसका कोई असर नहीं है। दूसरी खास बात यह है कि चीन की अर्थव्यवस्था कोरोना वायरस से पहले के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौट गई है लेकिन इसके लिए उसे कीमत चुकानी पड़ी है पर चीन ने ऐसी कोई कीमत नहीं चुकाई है। पूरी दुनिया में वायरस फैलाने के लिए भी उसे जवाबदेह नहीं बनाया गया है और न इसकी कोई कीमत उसके ऊपर लादी गई है। अब विश्व स्वास्थ्य संगठन और दुनिया के देशों को चाहिए कि वे चीन से बात… Continue reading चीन का तरीका जानना चाहिए!

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