आर्थिकी बचाएं या लोगों की जान?

यह बड़ा सवाल है, बल्कि यक्ष प्रश्न है। दुनिया की हर सरकार के सामने यह सवाल है कि वह अपने देश की अर्थव्यवस्था को बचाए, अपनी वित्तीय हालत खराब होने की चिंता करे या लोगों की जान बचाए? अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इस बात के लिए लोगों की आलोचना झेलनी पड़ी है कि वे आम अमेरिकी की जान से ज्यादा कारोबार, आर्थिकी और देश की वित्तीय हालत को तवज्जो दे रहे हैं और इसलिए वे पूरे देश में लॉकडाउन नहीं कर रहे हैं। जिन राज्यों में लॉकडाउन किया गया वहां भी ट्रंप की मर्जी को ठुकरा कर राज्यों के गवर्नरों ने अपने स्तर पर फैसला किया। ध्यान रहे अमेरिका इस समय कोरोना वायरस से सर्वाधिक संक्रमित देश है। वहां दो लाख से ज्यादा संक्रमित हैं और मरने वालों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है फिर भी देश पूरी तरह से लॉकडाउन नहीं है। न्यूयार्क इस आपदा का केंद्र है पर उससे सटे न्यूजर्सी में लॉकडाउन नहीं है। कारोबारी गतिविधियां जारी रखी गई हैं और ट्रंप का कहना है कि यात्रा परामर्श जारी करने से काम चल जाएगा। भारत में इसके बिल्कुल उलट मॉडल अपनाया गया। भारत में जब बहुत कम मामले थे, तभी लॉकडाउन शुरू हो गया।… Continue reading आर्थिकी बचाएं या लोगों की जान?

कोरोनाः सरकारें अपना मौन तोड़ें

कोरोना-युद्ध में केंद्र और दिल्ली की सरकार को उसी सख्ती का परिचय देना चाहिए था, जो इंदिरा गांधी ने 1984 में पंजाब में दिया था। दो हफ्ते तक मरकजे-तबलीगी जमात के जमावड़े को वह क्यों बर्दाश्त करती रही? अब उसका नतीजा सारा देश भुगत रहा है। मेरा अनुमान था कि देश की यह तालाबंदी दो हफ्ते से ज्यादा नहीं चलेगी। भारत में कोरोना के पिट जाने के कई कारण मैं गिनाता रहा हूं। अब भी कोरोना का हमला भारत में उतना विध्वसंक नहीं हुआ है, जितना कि वह यूरोप और अमेरिका में हो गया है। तबलीगी जमावड़े पर हमारी सरकारों का मौन तो आश्चर्यजनक है ही, उससे भी ज्यादा हैरतअंगेज हमारे नेताओं, अफसरों और डाक्टरों की मानसिक गुलामी है। क्या वजह है कि हमारे देश के टीवी चैनल कोरोना से लड़ने के लिए आयुर्वेद के घरेलू नुस्खों, आसन-प्राणायाम और रोजमर्रा के परहेजों का जिक्र तक नहीं कर रहे हैं? इन्हीं की वजह से तो भारत में कोरोना लंगड़ा रहा है। हम कितने दयनीय हैं कि हम अपनी छिपी हुई ताकत को ही नहीं पहचान रहे हैं। मुझे खुशी है कि मानव-शरीर की प्रतिरोध-शक्ति बढ़ानेवाले इन नुस्खों और आसन-प्राणायाम का प्रचार देश के कुछ प्रमुख हिंदी अखबार कर रहे हैं। अपने… Continue reading कोरोनाः सरकारें अपना मौन तोड़ें

यूएन ने भी कहा कि मंदी के हालात

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, आईएमएफ के बाद अब संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी माना है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को इस साल मंदी झेलनी पड़ेगी। यूएनओ के मुताबिक कोरोना वायरस की वजह से बड़े आर्थिक नुकसान की आशंका है। इससे विकासशील देशों को ज्यादा मुश्किलें होंगी। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि इससे भारत और चीन पर पर ज्यादा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ट्रेड रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की दो तिहाई आबादी विकासशील देशों में रहती है। इन देशों को कोरोना वायरस के संकट की वजह से बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसमें यह भी कहा गया है कि इन देशों के लिए 187.50 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की जरूरत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन के बाद दूसरे देशों में कोरोना वायरस के फैलने के बाद से पूंजी के निकलने, मुद्रा की कीमत गिरने, निर्यात में कमी और जरूरी वस्तुओं की कीमतों में कमी आ रही है। इसमें कहा गया है कि वायरस से लड़ने में मौद्रिक, वित्तीय और प्रशासनिक क्षमता की कमी के कारण महामारी बढ़ती जा रही है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी की तरफ ले जाएगी। इस कारण टिकाऊ… Continue reading यूएन ने भी कहा कि मंदी के हालात

अभूतपूर्व संकट का आईना

दुनिया अभूतपूर्व आर्थिक संकट में है। वास्तविक अर्थव्यवस्था और वित्तीय पूंजी- दोनों मुश्किल में हैं। शेयर बाजारों में भारी गिरावट आई है। इससे फैली घबराहट के बीच निवेशक फिर अपना भरोसा सोना में जता रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। दरअसल, सोने में निवेशकों का हमेशा भरोसा रहता है। संकट के समय यह और गहरा जाता है। नतीजतन, कोरोना महामारी के बीच इस समय सोने की मांग में भारी उछाल देखने को मिली है। थोक व्यापारी और खुदरा ग्राहक दोनों ही सोना खरीदने की होड़ में लगे हैं। मार्च में कमोडिटी बाजारों में सोने के दाम सात साल में अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए थे। ऐसा इसलिए हुआ कि व्यापारियों ने कोविड-19 और उसके हानिकारक आर्थिक असर से बचने के लिए सोने की शरण ली। सोने के दाम इस वजह से भी ऊपर गए हैं, क्योंकि निवेशक बढ़ती हुई महंगाई दर से भी बचने की कोशिश कर रहे हैं। कई केंद्रीय बैंकों ने वायरस के असर का मुकाबला करने के लिए वित्तीय सिस्टम में भारी मात्रा में पैसा डाला है। इससे मुद्रास्फीति में भारी इजाफे की आशंका जताई जा रही है। गौरतलब है कि लंदन के सोना-चांदी के बाजार में सोने के दाम पहले ही ऊपर… Continue reading अभूतपूर्व संकट का आईना

दुनिया मंदी की चपेट में: आईएमएफ

वाशिंगटन। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, आईएमएफ ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण दुनिया विनाशकारी प्रभाव का सामना कर रही है और स्पष्ट रूप से आर्थिक मंदी की गिरफ्त में आ गई है। हालांकि, आईएमएफ ने अगले साल सुधार का अनुमान जताया। आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टलीना जॉर्जीवा ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा- हमने 2020 और 2021 के लिए विकास की संभावनाओं का फिर से मूल्यांकन किया है। अब यह स्पष्ट है कि हम मंदी की गिरफ्त में हैं, जो 2009 जितनी या उससे भी बुरी होगी। हमें 2021 में सुधार की उम्मीद है। जॉर्जीवा ने आईएमएफ की एक अहम समिति की बैठक के बाद प्रेस कांफ्रेंस की। कुल 189 सदस्यों वाले इस निकाय ने कोविड-19 की चुनौती पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि 2021 में सुधार की गुंजाइश तभी होगी जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय हर जगह इस वायरस पर काबू पाने में सफल हो और नकदी की समस्या से कंपनियां दिवालिया न हों। जार्जीवा ने एक सवाल के जवाब में कहा- अमेरिका मंदी में है। दुनिया की बाकी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी ऐसा है। और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक बड़ा हिस्सा इसकी चपेट में है। कितना कष्टदायक है? हम 2020 के लिए अपने अनुमानों पर काम कर रहे… Continue reading दुनिया मंदी की चपेट में: आईएमएफ

फुटपाथ बाजार है भारत का विकास!

परसों मैं वर्षों बाद दिल्ली का करोलबाग घूमा। सोमवार को बाजार बंद रहता है और फुटपाथ बाजार लगता है। 35 साल पहले मैं करोलबाग-देवनगर में रहता था तब भी सोमवार को फुटपाथ बाजार लगा करता था। पर इस सोमवार बाजार देख झनझना उठा। करोलबाग-रैगरपुरा में मुख्य सड़क या गलियों में इतनी-ऐसे दुकानें, इतनी भीड़ मानो झुग्गी-झोपड़ी में हाटबाजार, कीड़े-मकोड़ों का संसार! उफ! कितना कैसा बदला यह करोलबाग-रैगरपुरा-देवनगर इलाका। छोटी-छोटी गलियां भी बाजार में बदली हुईं और उटपटांग निर्माण तो बस्तर के हाट से भी ज्यादा भदेस चीजें, कपड़े-बिंदी से ले कर फुटपाथ पर तले जाते भटूरे, खाने-पीने की चीजें, सब्जियां, मोबाइल एक्सेसरीज। समझ नहीं आया की 35 साल पहले की स्मृतियों के देवनगर-राजेंद्रनगर के बीच के संपन्न इलाके करोलबाग में भला सौ रुपए की जिंस वाला हाट बाजार किन झुग्गी-झोपड़ियों के लिए है? विचार किया तो लगा कि करोलबाग की मुख्य सड़क भले सर्राफा बाजार माफिक सोने-चांदी की दुकानों से भरी हो लेकिन अगल-बगल की गलियों में सस्ते जूते, कपड़े बेचते सप्लायरों और रैगरपुरा-आनंद पर्वत की तंग गलियों के घरों में क्योंकि भीड़ अथाह बस गई है तो जीना भले कच्ची झुग्गी-झोपड़ी वाला न हो लेकिन वह पक्की झुग्गी-झोपड़ी से बेहतर कितना होगा? कोई माने या न माने, अपना ऑब्जर्वेशन… Continue reading फुटपाथ बाजार है भारत का विकास!

मोदी-शाह के अहंकार की हुई हार : रोहित सिंह

युवा चेतना के राष्ट्रीय संयोजक रोहित कुमार सिंह ने प्रेस बयान जारी कर कहा की दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने हेतु आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को बधाई है।

जीएसटी संग्रह बढ़कर जनवरी 2020 में बढ़कर 1.1 लाख करोड़ रुपये

आर्थिक मंदी के आरोप झेल रही केंद्र सरकार को राहत प्रदान करते हुए जनवरी 2020 में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह 1,10,828 करोड़ रुपये हुआ।

66 फीसदी भारतीयों के लिए दैनिक खर्चे का प्रबंधन कठिन

आम आदमी अब महंगाई की मार और समग्र आर्थिक मंदी महसूस कर रहा है। आईएएनएस-सीवोटर सर्वेक्षण के अनुसार, कुल 65.8 फीसदी उत्तरदाता मानते हैं कि वे हाल के दिनों में अपने दैनिक खर्चो के प्रबंधन में कठिनाई का सामना कर रहे हैं।

न लक्ष्मी चंचल, न लोग चंचल!

बजट से कुछ नहीं सधेगा-1: सन 2020 का मनोभाव है कि यदि सरकार किसी को लाख रुपए दे तो वह खर्च नहीं करेगा, बल्कि उसे दबा कर रख लेगा! मतलब लोगों में भरोसा खत्म है तो वह क्यों कुछ करें? लक्ष्मीजी रूठ गई हैं, घर बैठ गई हैं तो लोग भी, उद्योगपति, धन अर्जन कराने वाले उद्यमी, पुरुषार्थी सब रूठ कर घर बैठ गए हैं। इसलिए सन् 2020-21 के आम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कुछ भी कर लें, साल बाद आर्थिकी एक इंच आगे बढ़ी हुई नहीं होगी। संभव है खड्डे में और ज्यादा फंसी हुई हो। पिछले सप्ताह रिजर्व बैंक के गर्वनर ने सुझाव दिया कि मौद्रिक नीति के उपायों की बजाय आर्थिक सुधार किए जाने चाहिए। सवाल है क्या तो सुधार और किसे चाहिए सुधार? भारत में, भारत की मोदी सरकार में ताकत नहीं जो वह सिस्टम पर कुंडली मारे बैठे नौकरशाहों का लक्ष्मीजी के घर में जबरदस्ती की वसूली का रोल खत्म कर दे। लक्ष्मीजी के पांवों में बेड़ियां डाले मजदूर कानूनों, फैक्टरी-ईएसआई-पीएफ-प्रदूषण-अप्रत्यक्ष कर के प्रशासन आदि के इंस्पेक्टरों-अफसरों की घेरेबंदी को खत्म कर दे। जब ऐसा नहीं हो सकता तो सुधार के नाम पर नौटंकियां होनी है न कि मेक इन इंडिया बनना है।… Continue reading न लक्ष्मी चंचल, न लोग चंचल!

कैसे संभलेगी अर्थव्यवस्था?

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस वित्त वर्ष के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर को घटा कर 4.8 प्रतिशत कर दिया है। इसके पहले उसने इसके 6.1 फीसदी रहने अनुमान जताया था। आईएमएफ की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ की यह टिप्पणी भारत के लिए कहीं अधिक चिंता का विषय है कि सामाजिक अशांति आर्थिक विकास के लिए हानिकारक है। गोपीनाथ ने कहा कि नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन पर आईएमएफ की नजर है और इस बारे में वह अप्रैल में जारी होने वाली अगली रिपोर्ट में टिप्पणी करेगा। आईएमएफ ने भारत को विश्व अर्थव्यवस्था की विकास दर को पीछे खींचने वाले देश के रूप में चित्रित किया है। जिस देश को इस सदी के आरंभ में विश्व अर्थव्यवस्था के इंजन माने गए देशों में रखा गया था, उसके लिए ऐसी टिप्पणी बेहद अफसोसनाक है। नरेंद्र मोदी सरकार को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए कि उसके शासनकाल में देश कहां से कहां पहुंच गया। इस स्थिति से देश को निकालने के लिए अब सरकार के पास पर्याप्त संसाधन भी नजर नहीं आते। मसलन, पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का कहना है कि चालू वित्त वर्ष में सरकार का कर संग्रह निर्धारित लक्ष्य से करीब ढाई लाख… Continue reading कैसे संभलेगी अर्थव्यवस्था?

मोदी देश को आर्थिक मंदी से उबारने के समुचित प्रयास कर रहे हैं: रामदेव

इंदौर। योग गुरु बाबा रामदेव ने आर्थिक मंदी के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बचाव करते हुए सोमवार को कहा कि मोदी देश को आर्थिक मंदी से उबारने के उद्देश्य से समुचित प्रयास कर रहें हैं। इंदौर की एक तेल निर्माता इकाई को ख़रीदे जाकर उसका संचालन पतंजलि द्वारा किए जाने की जानकारी देने के उद्देश्य से आयोजित पत्रकार वार्ता में बाबा रामदेव ने पत्रकारों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में यह बात कही। उन्होंने कहा कि मोदी को आर्थिक मंदी के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। उन्होंने कहा इस मुद्दे पर केंद्र सरकार अपने स्तर पर बेहतरी के लिए सभी प्रयास कर रही है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री कमलनाथ की कार्यशैली से जुड़े एक प्रश्न के उत्तर में बाबा रामदेव ने कहा कि उन्हें जितने प्रिय चौहान थे, उतने ही कमलनाथ हैं। उन्होंने इस दौरान कमलनाथ की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे एक दूरदृष्टि के नेता हैं, उन्हें पता है कि सरकार कैसे चलानी चाहिए। जेएनयू छात्रों के प्रदर्शन से जुड़े एक सवाल के जवाब में बाबा रामदेव ने कहा कि जेएनयू में कभी पंडित जवाहर लाल नेहरू तो कभी जिन्ना के नाम पर आजादी मांगी जाती है। उन्होंने छात्रों… Continue reading मोदी देश को आर्थिक मंदी से उबारने के समुचित प्रयास कर रहे हैं: रामदेव

दुबले और ऊपर से दो आषाढ़!

कहावत है कि एक तो दुबले और ऊपर से दो आषाढ़। वहीं वाली बात भारत की अर्थव्यवस्था पर लागू हो रही है। एक तो आर्थिक मंदी की चपेट में है और दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय हालात बिगड़ते जा रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच शांति नहीं स्थापित होती है तो कच्चे तेल के दाम में बेतहाशा बढ़ोतरी होगी।

आपको इस हाल में कैसे छोड़ें, नरेंद्र भाई!

हमारे पराक्रमी प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने देश के ग्यारह सर्वोच्च सरमाएदारों को इस बुधवार दिल्ली बुला कर पूछा कि रसातल में पहुंच गई अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए इस बार के बजट में किस तरह के इंतज़ाम किए जाएं? आप भले ही इस बात का मलाल पालें कि जिनके कुल कारोबार का बाज़ार-मूल्य तो छोड़िए, जिनकी व्यक्तिगत दौलत भी सब मिला कर साढ़े छह लाख करोड़, यानी 65 खरब रुपए से ज़्यादा हो, ऐसे लोगों को बुलाने से क्या फ़ायदा? वे कहां से आज के सिसकते मुल्क़ की ज़रूरतें समझेंगे? मगर मुझे तो भारतमाता को दिए अपने ज़ख़्मों पर मरहम लगाने की नरेंद्र भाई की यह अदा पसंद आई। उन्हीं ने दर्द दिया है तो वे ही दवा देंगे। दर्द जब दिया, दिया; अब दवा देने की कोशिश कर रहे हैं, तब तो तालियां बजाइए। जो कहेंगे कि दर्द देते वक़्त जो ख़ामोश रहे, बाद में इस दर्द को बढ़ाने में जो शामिल रहे और फिर आम लोगों के जिस दर्द की बिललिलाहट से जिनके घर भर गए, उनके ज़रिए अब ग़रीबों के दर्द की दवा ढूंढना कौन-सी बुद्धिमानी है; मैं उन्हें देशद्रोही तो नहीं कहूंगा, लेकिन इतना ज़रूर कहूंगा कि ये वे लोग हैं, जिन्हें नरेंद्र भाई पसंद… Continue reading आपको इस हाल में कैसे छोड़ें, नरेंद्र भाई!

बुनियादी ढांचे पर 51 लाख करोड़ खर्च हुए

नई दिल्ली। देश में आर्थिक मंदी की खबरों और विकास दर में लगातार हो रही गिरावट के बीच केंद्र सरकार ने बताया है कि उसने बुनियादी ढांचे के विकास पर 51 लाख करोड़ रुपए खर्च किए हैं। साल के आखिरी दिन मंगलवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा- सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर 51 लाख करोड़ रुपए खर्च किए हैं। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद, जीडीपी का पांच से छह फीसदी है। वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ने अगले पांच साल में बुनियादी ढांचे पर करीब एक सौ लाख करोड़ रुपए खर्च करने का लक्ष्य रखा है। इस फंड को 21 मंत्रालयों के बीच आवंटित किया जाएगा। इस फंड से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बुनियादी ढांचे के विकास पर काम किया जाएगा। सीतारमण ने मंगलवार को नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट लांच किया, जिस मौके पर उन्होंने सरकार के लक्ष्य का ऐलान किया। उन्होंने बताया कि इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का मकसद 2024-25 तक पांच हजार अरब डॉलर की जीडीपी का लक्ष्य हासिल करना है। इस प्रोजेक्ट के तहत कुल 102 लाख करोड़ रुपए इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर पर खर्च किए जाएंगे। इनमें से 25 लाख करोड़ रुपए ऊर्जा, 20 लाख करोड़ रोड और 14 लाख करोड़ रुपए रेलवे परियोजनाओं पर… Continue reading बुनियादी ढांचे पर 51 लाख करोड़ खर्च हुए

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