कभी कोशिश नहीं तो अब कैसे?

hindoo-buddhi-ka-kaayaakalp : भारत कलियुगी-  कैसे हो हिंदू बुद्धि का कायाकल्प? : जरा ज्ञात इतिहास के पन्ने पलटें। ढूंढें कब हिंदुओं में अपने को बदलने की जिद्द बनी? क्या कभी कलियुग मिटाने का धर्म संकल्प हुआ? क्या जाति-वर्ण-वर्ग-असमानता मिटाने का सामाजिक आंदोलन हुआ? गरीबी मिटाने का कोई राजनीतिक भूचाल आया? स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा बनवाने के… Continue reading कभी कोशिश नहीं तो अब कैसे?

अधर्म जानें, अफीम छोड़ें!

bhaarat kaliyugee 23 : अधर्म जानें, अफीम छोड़ें! जरूरी है धर्म के कलियुगी अधर्म की अफीम से मुक्त होना।.. धर्म अपना पुराना है लेकिन धार्मिकता-आध्यात्मिकता-कर्मकांड कलियुगी हैं और उसमें जीवन शरीर का, जगत का, पृथ्वी का विशेष मोल नहीं हैं। मैं यह बात बार-बार लगातार रिपीट करता हूं तो इसलिए कि कलियुगी धार्मिकता में थोक… Continue reading अधर्म जानें, अफीम छोड़ें!

पहले पाए इस जैविक रचना से मुक्ति

कैसे हो हिंदू बुद्धी का कायाकल्प आज का धर्म भरतवंशियों का  सनातनी धर्म नहीं है, बल्कि झूठ, गुलामी और भयाकुलता का अधर्म है। यह हमारे-आपके शरीर की सच्चाईयों, भौतिक आवश्यकताओं और मनुष्यगत स्वतंत्रता, आजादी की जरूरत में वह कुछ भी लिए हुए नहीं है जो सनातन काल में व्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन चिंता में… Continue reading पहले पाए इस जैविक रचना से मुक्ति

कैसे हो हिंदू बुद्धि का कायाकल्प?

कैसे हो हिंदू बुद्धि का कायाकल्प: दिमागी फितूर में ही मैं सत्य की संभावना न होते हुए भी विचार कर रहा हूं कि हिंदू सभ्यता कैसे सत्यगामी बने, कैसे अपने मूल सतयुगी आचरण में ढले? नोट करके रखें, जान ले दांव पर आने वाली पीढ़ियों व भारत राष्ट्र-राज्य का जीवन-मरण है। हां, यदि 140 करोड़… Continue reading कैसे हो हिंदू बुद्धि का कायाकल्प?

झूठ से खंड-खंड व्यक्तित्व!

झूठ से खंड-खंड व्यक्तित्व! : झूठ से ही व्यक्तित्व जर्जर व खंडहर हुआ है। इसी से सत्य, पुरुषार्थ, हिम्मत सब खत्म और धीरे-धीरे होइहे सोइ जो राम रचि राखा का जीवन दर्शन बन गया। गुलामी, अंधकार, दीनता में जीते हैं लेकिन सर्वश्रेष्ठ, सर्वगुरू होने की खामोख्याली पाल कर दिमाग को सत्य-यथार्थ विमुख, पाखंडी और हिपोक्रेट… Continue reading झूठ से खंड-खंड व्यक्तित्व!

मृत्युलोक में मर मर कर जीना!

मृत्युलोक में मर मर कर जीना! : लाखों-करोड़ों लोग बीमारी में मरे या दिल्ली में नादिरशाह की तलवार से, मध्यकाल हो या आधुनिक काल, हिंदू की कलियुगि बुद्धि से ‘उफ’ भी नहीं निकलेगा। भले संविधान-संसद बना ली हो लेकिन यह सवाल-जवाब तब भी नहीं कि गंगा के शववाहिनी बनने के लिए कौन जिम्मेवार? इतनी मौतों,… Continue reading मृत्युलोक में मर मर कर जीना!

भटका स्वभाव-अध्यात्म और भटकी बुद्धि!

bhaarat kaliyugee भटका स्वभाव भटकी बुद्धि : पृथ्वी क्या, मृत्युलोक। संसार क्या, सांसारिकता का झमेला। अच्छा क्या, गुजरा वक्त अपना अतीत! कर्मफल क्या, भाग्य में लिखा हुआ! विश्वास, रास्ता और विकल्प क्या, भगवानजी के शरण और जैसे रामजी रखेंगे। जीवन का लक्ष्य क्या, मृत्युलोक के दुखों से मुक्ति! कर्म किसलिए, अगले जन्म के लिए!… ऐसा स्वभाव,… Continue reading भटका स्वभाव-अध्यात्म और भटकी बुद्धि!

बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा!

कलियुगी दिमाग सोचता हुआ नहीं है। वह ठहरा हुआ, जड़, कुंद, मंद की उस मानसिक विकलांगता में है, जिसमें न चेतना है, न बोध-समझ के तंतु हैं और न जिज्ञासा। पूरी तरह अवैज्ञानिक चित्त, कूपमंडूक वृत्तियां और गैर-साइंटिफिक दिमाग।.. दरअसल सभ्यता का अपना सफर और इतिहास भ्रम और भटकने की कई गांठे लिए हुए है।… Continue reading बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा!

कलियुगी बीमारी और लक्षण

हम ओलंपिक-नोबेल-ज्ञान-विज्ञान-सत्य की वास्तविकता में गरीब, दरिद्र होने का कलियुगी जीवन लिए हुए हैं तो यह सच श्रीमद्भागवत से चला आ रहा है।…बाकी सभ्यताओं में शरीर ऐसा नहीं क्योंकि कलियुगी कैंसर के मारे सिर्फ हम हैं। बाकी सभ्यताओं ने पृथ्वी और जीवन को यदि कर्मलोक, जिंदगी के भोग का मौका माना है जबकि हिंदू दिमाग,… Continue reading कलियुगी बीमारी और लक्षण

लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन!

तभी सदियों से चेतना का अपना ज्वालामुखी सोया हुआ, सुषुप्त है। असंख्य हमलावरों, तरह-तरह के अत्याचारों-गुलामी और सत्ता-हाकिमों की ज्यादतियों के बावजूद हिंदू चेतना का लावा कभी फटता नहीं। न बगावत, न कोई विद्रोह, न क्रांति-प्रतिक्रांति मतलब पूरी तरह अपना मृत्युलोक वह पाताल बनाए हुए है, जो हिमखंड में रचा-पका है। ऐसा बर्फीला, बेहोश दिमाग… Continue reading लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन!

जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

बाकी सभ्यताओं और कलियुगी हिंदू सभ्यता का यह कैसा विकट अंतर है जो हम 140 करोड़ लोग और भारत देश मृत्युलोक में मर-मर के जीवन जीने का ख्याल लिए हुए हैं, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन आदि सभ्य विकसित देश और उनके लोग पृथ्वी की कर्मलौकिकता में जीवन बनाते, जीवन भोगते हुए ब्रह्माण्ड के परलोक में अपनी… Continue reading जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

महामारी का सामना कैसे हो, वक्त की चुनौतियों से कैसे पार पाएं, कैसे भविष्य बनाएं, इन सवालों का हल हिंदू चेतना में न सन् 1918-20 में था और न सन् 2021-22 में है। जैसे पशुओं-भेड़-बकरियों को बीमारी, महामारी क्या और कैसे बचें का बोध नहीं होता है वैसे ही कलियुगी भारत को नहीं है।..हम ठहरे… Continue reading ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

कलियुग ने बुद्धि-ब्रेन को छोटा बनाया है। वह गुलामी में घिस कर छोटी हुई है। गुलामी और भक्ति से पराश्रित है (जो करना है ईश्वर और उनके अवतार को करना है)। गुलाम कितना सोच सकता है? भक्त कितना पौरूषवान हो सकता है? जब मेंढ़क कुएं की टर्र-टर्र में दुनिया, देश, समाज की सत्यता सोचने-विचारने की… Continue reading बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!

हमें कलियुगी हिंदू मनोविज्ञान की चीर-फाड़, ऑटोप्सी से समझना होगा कि हमने इतने देवी-देवता क्यों तो बनाए हुए हैं और इतनों को पूजते हुए भी क्यों नहीं उनका आशीर्वाद है?…सोचें इतने करोड़ देवी-देवता और जीवन का हर चक्र उन्हें समर्पित बावजूद इसके कलियुगी हिंदू ‘चित्त’ अकेले इस सूत्र का काला धागा बांधे हुए है कि… Continue reading ‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!