किसान और सरकारः फर्जी मुठभेड़

किसानों का चक्का-जाम बहुत ही शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया और उसमें 26 जनवरी– जैसी कोई घटना नहीं घटी, यह बहुत ही सराहनीय है। उत्तरप्रदेश के किसान नेताओं ने जिस अनुशासन और मर्यादा का पालन किया है

सरकार अपनी जीत न देखे!

यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से खल्क, न उनकी रस्म नई है न अपनी रीत नई, यूं ही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल, न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई। फैज की एक मशहूर नज्म की ये लाइनें इन दिनों किसान आंदोलन के समर्थन में खूब सुनने को मिल रही हैं।

संसद में विपक्ष लाए कानून रद्द का प्रस्ताव

केंद्र सरकार के बनाए तीन केंद्रीय कानून के विरोध में चल रहे आंदोलन का अंत नतीजा क्या होगा या केंद्रीय कानूनों का भविष्य क्या है इन सवालों पर चल रही अटकलों के बीच एक सवाल यह भी है कि विपक्ष क्या सिर्फ शोर मचाएगा या कोई सकारात्मक पहल करेगा

संसदीय समिति में कानूनों पर विचार हो!

केंद्र सरकार ने किसानों को प्रस्ताव दिया है कि वह कानूनों पर रोक लगा देगी और एक कमेटी बना देगी, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी सहित बाकी सारे मुद्दों पर विचार करेगी।

आंदोलन चलेगा अक्टूबर तक

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले 69 दिन से चल रहा आंदोलन अभी खत्म नहीं होने जा रहा है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा है कि यह आंदोलन अक्टूबर तक चलेगा।

दिल्ली की सीमा पर किलेबंदी

दिल्ली की सीमा पर पिछले 69 दिन से आंदोलन कर रहे किसानों को दिल्ली में घुसने से रोकने के लिए दिल्ली पुलिस सीमाओं की किलेबंद कर रही है। सात-सात स्तर के बैरिकेड्स लगाए जा रहे हैं।

कृषि कानूनों पर मध्य मार्ग की तलाश!

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में 68 दिन से आंदोलन कर रहे किसान क्या अब तीनों कानूनों को रद्द करने की मांग छोड़ कर बीच का रास्ता निकालना चाहते हैं

क्या किसान आंदोलन बंट जाएगा?

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में 68 दिन से चल रहे आंदोलन का केंद्र पिछले हफ्ते शिफ्ट हो गया। पहले इस आंदोलन का अघोषित मुख्यालय सिंघू बॉर्डर पर था, जहां पंजाब और हरियाणा के किसान डेरा डाले हुए थे

तिरंगे के अपमान का गढ़ा हुआ नैरेटिव

भारत सरकार को किसान आंदोलन को बदनाम करने का एक प्रतीक मिल गया है। सरकार आंदोलन शुरू होने के बाद पहले दिन से इसकी तलाश में थी।

रोया दीया और अचानक।।।वे क्षण, वह मूड!

दिन 28 जनवरी। वक्त कोई रात के 9.30 बजे। दिन भर दिल्ली की सिंघू सीमा पर किसानों का मूड समझने-बूझने के बाद मैं गाजीपुर के प्रदर्शनस्थल पर थी। सब कुछ नियंत्रित और शांत।

किसान आंदोलन पर शिकंजा!

एक तरफ केंद्र सरकार केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसान संगठनों के साथ वार्ता कर रही है तो दूसरी ओर किसान आंदोलन पर शिकंजा भी कसता जा रहा है

‘राजद्रोह’ से नीचे कुछ नहीं!

गणतंत्र दिवस के दिन किसानों की ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसा को भड़काने का आरोप लगाते हुए छह पत्रकारों और कांग्रेस के सांसद शशि थरूर के खिलाफ उत्तर प्रदेश के नोएडा और मध्य प्रदेश के भोपाल में राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया गया है।

फिलहाल बाजी पलट गई है

मौजूदा किसान आंदोलन का हश्र चाहे जो हो, आधुनिक समय में इसके ऐसे कई योगदान हैं, जिनका दीर्घकालिक असर होगा। सबसे पहले उसने मौजूदा सरकार के तहत क्रोनी कैपिटलिज्म के सामने आए बदनुमा चेहरे को बेनकाब किया था।

किसानों की रिहाई की मांग

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में 67 दिन से आंदोलन कर रहे किसान एक बार फिर केंद्र सरकार के साथ वार्ता के लिए राजी हो गए हैं पर साथ ही यह भी कहा है

किसान आंदोलन में लौटी भीड़

गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर रैली के दौरान पुलिस और किसानों के बीच हुई झड़प के बाद किसान आंदोलन बिखरता दिख रहा था पर उस घटना के पांच दिन बाद आंदोलन पुराने रूप में लौट आया है।

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