बूढ़ा पहाड़
कूटनीति में अदानी-अंबानी के मजे

आजाद भारत के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि भारत की कूटनीति चंद उद्योगपतियों के कारोबारी हितों से है। चीन ने पूर्वी लद्दाख में भारत की जमीन कब्जाली, डोकलाम में भारत को उलझाए रखा और अरुणाचल प्रदेश पर दावा बढ़ा रहा है बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भी बार चीन का नाम लेकर उसे निशाना नहीं बनाया। भारत के समर्थन में अमेरिका के विदेश मंत्री ने चीन का नाम लिया मगर भारत के नेता इशारों में अपनी बात कहते तो कारणों मेंएक कारण गुजरात के कारोबारियों को बैंक ऑफ चाइना से मिले और उनके धंधे-आयात-निर्यात को न माने तो क्या माने। हाल में जब भारत और श्रीलंका संबंधों में तनाव हुआ तो वह भी चीन की वजह से कम और गौतम अडानी के कारोबारी हितों को लेकर ज्यादा है। असल में भारत, श्रीलंका और जापान के बीच एक करार हुआ था, जिसके तहत कोलंबो बंदरगाह पर ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल को डवलप किया जाना था। भारत में बंदरगाहों पर एकाधिकार बना रहे अडानी समूह को इसका ठेका मिला था। कहने की जरूरत नहीं है कि कैसे मिला था। लेकिन बाद में श्रीलंका में सत्ता बदलते ही राजपक्षे बंधुओं ने इस प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया। कहा… Continue reading कूटनीति में अदानी-अंबानी के मजे

कूटनीति अब घरेलू राजनीति के लिए!

कारोबारियों के हित देश हित के ऊपर है। इस गिरावट के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पहले उनके विदेश सचिव रहे और अब विदेश मंत्री के तौर पर काम कर रहे एस जयशंकर भी जिम्मेदार हैं।

56 इंची छाती और पिचकी कूटनीति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 56 इंची छाती वाले हैं और वे इसी अकड़ के साथ घरेलू राजनीति करते हैं। घरेलू राजनीति में उन्होंने केंद्रीय एजेंसियों के सहारे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं, गैर सरकारी संगठनों, मी

कूटनीति नहीं है सैन्य ताकत का विकल्प

यह बात चीन के संबंध में भी सही है और नेपाल जैसे छोटे से छोटे देश से लेकर पाकिस्तान जैसे जन्म जन्मांतर के दुश्मन देश के बारे में भी सही है कि कूटनीति कभी भी सैन्य ताकत का विकल्प नहीं हो सकती है।

नेपाल में विवादित नक्शे को मंजूरी

भारत के तीन क्षेत्रों को अपना हिस्सा बताते हुए बनाए गए नए नक्शे को नेपाल की संसद से मंजूरी मिल गई है। अब सिर्फ राष्ट्रपति का दस्तखत होना बाकी है, उसके बाद यह नक्शा मंजूर हो जाएगा।

इसे हलके से ना लें

भारत-नेपाल सीमा पर शुक्रवार को जो घटना हुई, उसे दोनों देशों की सरकारों ने स्थानीय घटना कहकर ज्यादा तव्वजो नहीं दी। अगर आम दिन होते, तो इसे ऐसा ही माना जाता।

नेपाल के नक्शे में भारत के इलाके

नेपाल की संसद ने भारत के कुछ इलाकों को अपना बताने के लिए नक्शे में बदलाव से जुड़ा बिल शनिवार को पास कर दिया।

नेपाल की अनावश्यक आक्रामकता

लद्दाख के सीमांत पर भारत और चीन की फौजें अब मुठभेड़ की मुद्रा में नहीं हैं। पिछले दिनों 5-6 मई को दोनों देशों की फौजी टुकड़ियों में जो छोटी-मोटी झड़पें हुई थीं, उन्होंने चीनी और भारतीय मीडिया के कान खड़े कर दिए थे।

आखिर वार्ता से गुरेज क्यों?

यह रहस्यमय है कि नेपाल के साथ सीमा विवाद पर बातचीत करने में भारत ने दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई? गौरतलब है कि ये विवाद खड़ा होते ही नेपाल ने बातचीत की अपील की।

भारत-चीन-नेपालः तिकोनी कूटनीति

इधर छलांग लगाते हुए कोरोना से भारत निपट ही रहा है कि उधर चीन और नेपाल की सीमाओं पर सिरदर्द खड़ा हो गया है लेकिन संतोष का विषय है कि इन दोनों पड़ौसी देशों के साथ इस सीमा-विवाद ने तूल नहीं पकड़ा।

क्या बज रहा भारत का डंका?

कहां तो हल्ला मचा था कि पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है और दावा किया जा रहा था कि पहली बार भारत की बात को दुनिया गंभीरता से सुन रही है। भाजपा और सरकार के मंत्रियों का भी दावा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से दुनिया में भारत की ताकत बढ़ी है। पर पहली बार कोई मामला आया और भारत दुनिया भर के देशों से घिर गया। भारत के समर्थन में बोलने वाले गिने-चुने मिलेंगे और विरोध में दर्जनों देश खड़े हो गए। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी दिल्ली के दंगों को और कुछ हद तक सीएए को भारत का आंतरिक मामला बताया था पर कश्मीर के मामले में वे भी पंचायत के लिए तैयार हैं। उन्होंने भारत में साझा प्रेस कांफ्रेंस में भी कहा कि अगर दोनों देश यानी भारत और पाकिस्तान चाहें तो वे मध्यस्थता के लिए तैयार हैं। सवाल है कि जब भारत हजार बार कह चुका है कि उसे तीसरे पक्ष का दखल मंजूर नहीं है तो वह क्यों चाहेगा कि अमेरिका इसमें पंचायत करे? फिर भी ट्रंप बार बार यह बात दोहराते रहते हैं। ध्यान रहे दुनिया के ज्यादातर देश, जिनमें यूरोपीय देश भी शामिल हैं, इस्लामोफोबिया से ग्रस्त हैं। वे… Continue reading क्या बज रहा भारत का डंका?

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