समस्या की जड़ कहां है?

सवाल है कि अगर देश में लोकतांत्रिक संवाद का अभाव होता जाए और चुनावी बहुमत के आधार पर सरकार असहमति या असंतोष की किसी आवाज को सुनने से इनकार करे, तो असंतुष्ट समूहों के लिए क्या रास्ता रह जाता है? आखिर तब वे अपनी मुसीबत कहां और किसे बताने जाएंगे?

किसान आंदोलनः 100 दिन बाद

आंदोलनकारी किसानों के दिल्ली में डेरा डाले 100 से ज्यादा हो गए हैं। लेकिन गतिरोध जहां का तहां है। कई विश्लेषकों का आरंभ से अनुमान था कि इस आंदोलन का गतिरोध खत्म नहीं होगा।

किसान जाएंगे भाजपा को हराने

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ साथ किसान संगठनों का भी मुकाबला करना पड़ेगा।

सरकार की चुप्पी से चिंतित किसान

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले 96 दिन से आंदोलन कर रहे किसान इस बात से चिंतित हैं कि सरकार ने उनके आंदोलन को लेकर चुप्पी साध रखी है।

किसानों से बातचीत के लिए तैयार!

केंद्र सरकार ने एक बार फिर कहा है कि वह केंद्रीय कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों से बातचीत के लिए तैयार हैं। हालांकि सरकार ने यह नहीं कहा कि बातचीत किन मुद्दों पर होगी और कब होगी।

किसान कब तक इंतजार करेंगे?

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों को अब इस भ्रम से निकलना चाहिए कि उनके आंदोलन से घबरा कर, डर कर या एक लोकतांत्रिक आंदोलन का सम्मान करके केंद्र सरकार कानूनों को वापस ले लेगी

किसान आंदोलन का निशाना

किसान आंदोलन ने कृषि कानूनों के प्रति अपने विरोध को कई रूपों में दिखाया है। इसमें एक रूप कुछ वैसा है, जैसा आजादी की लड़ाई के दिनों में विदेशी कपड़ों की होली जलाने का था।

भाजपा को क्या है सियासी नुकसान की चिंता?

भाजपा और उसकी केंद्र सरकार को अब किसान आंदोलन की चिंता नहीं है। कम से कम ऐसा दिख नहीं रहा है कि सरकार किसानों के आंदोलन की चिंता कर रही है।

कैसे समझाएंगे किसानों को?

भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं ने बैठक करके पार्टी के सांसदों, विधायकों और संगठन के नेताओं को यह जिम्मेदारी तो सौंप दी कि वे अपने क्षेत्र में जाएं और किसानों को कृषि कानूनों के फायदे समझाएं और यह बताएं कि किसानों का आंदोलन असल में कम्युनिस्टों का आंदोलन है।

पार्टियों की पंचायत व आंदोलन की रंगत

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ 40 किसान संगठन 83 दिन से आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन के लंबा चलने और देश के अलग अलग हिस्सों में इसका विस्तार होने से इसकी ज्यादा चर्चा होनी चाहिए थी पर हकीकत यह है कि पिछले करीब 20 दिन से यह आंदोलन चर्चा से बाहर है।

अन्ना नहीं आए तो किसान खुश हुए!

यह हैरान करने वाली बात है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का चेहरा रहे अन्ना हजारे ने किसानों के समर्थन में आमरण अनशन शुरू करने का ऐलान किया तो दो महीने से आंदोलन कर रहे किसान परेशान हो गए थे।

किसान आंदोलन व शरद जोशी का न होना

देश में जबरदस्त किसान आंदोलन चल रहा है और इस दौरान जाने माने किसान नेता व उनके हितैषी शरद जोशी का नाम नहीं होने के कारण उनकी कमी बहुत खल रही है

खट्टर और चौटाला सबसे ज्यादा चिंतित

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसानों के आंदोलन से सबसे ज्यादा चिंता हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला है

बिहार की कहानी उलटी

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान संगठनों के भारत को काफी समर्थन मिला। 19 राजनीतिक दलों ने इसका साथ दिया। संकेत यह है कि ये आंदोलन अब देश भर में फैलता जा रहा है।

राष्ट्रपति मिल तो सकते थे!

किसानों के मामले में हाल में बने तीन कानूनों के मुद्दे पर धरने पर उतर कर पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने साफ कर दिया है कि वे इस मुद्दे को जल्द छोड़ने वाले नहीं हैं।

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