आंसुओं की टपटप और बांसुरी-वादक

दंगों का एक समाजशास्त्र होता है, एक अर्थशास्त्र होता है और एक राजनीतिशास्त्र भी होता है। दंगे सामाजिक नफ़रत का शस्त्र हैं, आर्थिक गै़र-बराबरी का शस्त्र हैं और राजनीतिक जनाधार का भी शस्त्र हैं। दंगे मैदानों में कूदने से पहले दिमाग़ों में पसरते हैं। सो, दंगों को दिमाग़ों में घुसाने का काम करने वाले उनसे… Continue reading आंसुओं की टपटप और बांसुरी-वादक

दिल्ली का बनना जंग-ए-मैदान

नई दिल्ली। लाल अक्षरों में लिखी गाली और नारा बतला दे रहे थे कि आबोहवा में खौल रही हैनफरत! इस्लाम की…. के ठिक साथ दिवाल पर लिखा था‘नाथूराम गोड़से अमर रहे’। मौजपुर के मुख्य चौक सेलगने लगा था मानो जंग के मैदान से गुजर रहे हो। मारकाट-हिंसा के बाद जंग मैदान में चार दिन बाद… Continue reading दिल्ली का बनना जंग-ए-मैदान