न्याय व्यवस्था का अन्याय

अगर ये दौर आज का नहीं होता, तो इस घटना पर देश का विवेक कठघरे में खड़ा नजर आता। लेकिन आज जब किसी को भी किसी इल्जाम में जेल में डाल देना आम हो गया है

21वीं सदी में भारत आदिम!

उफ! भारत राष्ट्र-राज्य, भारत के हम सवा सौ करोड़ लोग और दुनिया के हम हिंदू! क्या हैं हम? हम राष्ट्र-राज्य में जी रहे हैं या जंगल में? हम इंसान हैं या जानवर? क्या फर्क है हममें और पशु में? ऐसा कोई देश मुझे याद नहीं आ रहा है या वह जमात, नस्ल या वह इलाका स्मृति में नहीं है जो अपने आपको नियम-कायदों-कानून-सभ्यता में चिन्हित करता है और जीता आदिम व्यवहार में है।