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Saturday, April 10, 2021
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पत्रकारिता

पत्रकार सब्जी बेच ज्यादा संतुष्ट!

पिछले दिनों एक पूर्व सहयोगी महिला पत्रकार का फोन आया जो विदेश के एक बहुत प्रतिष्ठित अखबार समूह में काम करती थी। वे काफी वरिष्ठ थी।

सरकारी बंगला और पत्रकारिता की कपिला गाय

मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक अख़बार के मालिक-संपादक के निधन के बाद उनके परिवार से भोपाल का सरकारी बंगला फटाफट खाली करवा लिया।

इन चैनलों से ‘पक’ गए!

समय के साथ-साथ नई पीढ़ी द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द भी बदलते जाते हैं। जब मेरी पत्रकारिता शुरू हुई थी तब प्रेस कांफ्रेंस के लिए यह पूरा शब्द इस्तेमाल होता था। मगर आज के युवा पत्रकार इसकी जगह पीसी अक्षरो का इस्तेमाल करके काम चला लेते हैं।

सहचर-पूंजीवाद का मोर-पंखी मीडिया

मोर-पंखी मीडिया को अपने पांवों की तरफ़ संजीदगी से देखने का अगर यह भी वक़्त नहीं है तो समझ लीजिए कि हमारे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कलियुगी काले-सूराख़ का गुरुत्वाकर्षण-बल इस क़दर लील चुका है कि वेद व्यास ख़ुद भी अवतार ले लें तो उसे उबार नहीं सकते।

वहां बुद्धि, यहां कौवा काला!

सुबह दिमाग को ‘द इकॉनोमिस्ट’ से चीन, ब्रिटेन और अमेरिका पर खुराक मिली। फिर सोचने लगा पत्रिका पर। लंदन से प्रकाशित इस पत्रिका को मैं 1976 से देखता-पढ़ता आ रहा हूं। इसके संपादकीय पढ़ कर मेरी वैश्विक समझदारी पकी।

पत्रकार और पत्रकारिता का बुझता दीया

क्या कभी वह दिन भी आ सकता है जब अख़बार बिना पत्रकारों के निकलें और न्यूज चैनल बगैर पत्रकारों के चलें? आज की भयावह स्थिति को देखते हुए यह कोई असंभव बात नहीं लगती।

फर्जी पत्रकार और उनकी हिम्मत

एक मित्र ने मुझे कुछ फर्जी पत्रकारो की गिरफ्तारी के बारे में सूचनाएं भेजी हैंऔर बताया है कि कुछ लोग पत्रकार न होते हुए भी फर्जी पत्रकार बनकर हालात का फायदा उठा रहे हैं।

खुदा अपने गधे पर मेहरबान तो…

कोरोना की वजह से देश व दुनिया में भले ही कितना ज्यादा नुकसान पहुंचे मगर मेरा मानना है कि इससे कुछ ऐसे लाभ भी हौ जिनकी हम कभी कल्पना नहीं कर सकते हैं। समाचार चैनलो पर बताया जा रहा है कि सारा काम ठप होने के कारण गंगा-यमुना सरीखी नदियां कितनी स्वच्छ हो गई।

इतना छिछोरा तो प्रचंड भंडारी भी नहीं था

परसों-तरसों जब मैं ने शक़्ल-पुस्तिका की अपनी दीवार (फेसबुक वॉल) पर यह इबारत लिखी कि ‘‘इतना छिछोरा तो प्रचंड भंडारी भी नहीं था। तू तो पत्रकारिता का कलंक है एकदम।’’ तो मुझे मालूम था कि यह तो कोई नहीं पूछेगा कि यह कलंक कौन है, क्योंकि सब जानते हैं।

अजित पवार की एक्सक्लूसिव कवरेज!

कई बार तो लगता है कि बहुत अच्छे समय जनसत्ता से रिटायर हो गया। इसकी बड़ी वजह यह है कि जब देखता हूं कि आज पत्रकारिता में क्या हो रहा है या करवाया जा रहा है तो मन को बेहद कोफ्त होती है। नवीनतम मामला महाराष्ट्र के घटनाक्रम के दौरान का है।
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