प्रवासीमजदूर

सबकुछ मजदूर संकट में बदल गया

कहां तो भारत को कोरोना वायरस से लड़ना था और कहां अब सारी लड़ाई मजदूरों के संकट को दूर करने में बदल गई है।

बांद्रा स्टेशन के बाहर फिर जमा हुई भीड़

मुंबई के बांद्रा स्टेशन के बाहर एक बार फिर बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों की भीड़ इकट्ठा हो गई। मंगलवार को श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सवार होने के लिए हजारों लोग स्टेशन के बाहर इकट्ठा हो गए

मजदूरों को मदद नहीं हक दीजिए

देश के राजमार्गों पर 40 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में, जेठ की भरी दोपहरी में पैदल चल रहे हजारों, लाखों लोग भिखारी नहीं मजदूर हैं, जिन्होंने यह दुनिया बनाई है।

गांवों में कौन से हालात अच्छे हैं!

देश के अलग अलग हिस्सों में फंसे मजदूर गांव लौटना चाहते हैं। यह खबर चारों तरफ दिखाई दे रही है। कोरोना वायरस के संक्रमण, उससे मरते लोगों के बीच आर्थिकी के बरबाद होने का एक नैरेटिव है तो दूसरा नैरेटिव मजदूरों की वापसी का है।

शहरों में फंसे मजदूरों को मिलेगी नौकरी

केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों ने 20 अप्रैल से कई किस्म की गतिविधियों को मंजूरी दे दी है। कृषि कार्य से लेकर कई तरह की फैक्टरियां चालू हो गई हैं और निर्माण कार्य भी शुरू हो गए हैं।

कोरोना का सबक क्या होगा

कोरोना वायरस का संकट देर-सवेर टल जाएगा। जो, आधुनिक, विकसित और सभ्य देश हैं उनके यहां चार-छह महीने में संकट खत्म होगा और भारत जैसे विकासशील या पिछड़े देशों में इसे खत्म होने में डेढ़-दो साल भी लग सकते हैं।

मजदूरों का हाल बताती रिपोर्ट

तालाबंदी से प्रभावित प्रवासी मजदूर किस संकट से गुजर रहे हैं, इसका असल में ठीक से अंदाजा किसी को नहीं है।

बिहार सरकार के सर पर है छाबू मंडल की मौत

राष्ट्रीय राजधानी से सटे देश के मिलेनियम शहर में किसी मजदूर का अपने परिवार का पेट भरने में विफल रहने पर आत्महत्या करना वैसे तो पूरे सिस्टम और समाज पर सवाल खड़े करता है

मुंबई से बांद्रा स्टेशन पर जुटे हजारों प्रवासी

मुंबई। कोरोना वायरस से लड़ने के लिए 25 मार्च से शुरू हुए पहले लॉकडाउन के बिल्कुल शुरुआत में प्रवासी मजदूरों के पलायन की जो कहानी दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में हुई थी, दूसरे चरण के...
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