न्यायपालिका कब तक राह दिखाएगी?

न्यायपालिका का काम रास्ता दिखाने का है लेकिन तभी जब सरकारें रास्ता भटकती हैं। सवाल है कि सरकारें कितना रास्ता भटकेंगी और कितनी बार उनको रास्ते पर लाने का काम न्यायपालिका को करना होगा? और सोचें, कभी न्यायपालिका ने रास्ता दिखाना बंद कर दिया फिर क्या होगा? पिछले कई बरसों तक ऐसा होता रहा कि देश की न्यायपालिका सरकारी मार्ग को ही उचित मार्ग मानती रही थी। वह तो अच्छा है, जो अब न्यायपालिका ने सरकारी मार्ग को मुख्य और उचित मार्ग मानना बंद या कम कर दिया है। यह सुखद है कि देश की अदालतों ने सरकार के हर कदम का समर्थन करने की बजाय लोगों के हितों को प्राथमिकता देते हुए सरकारों को निर्देश देना शुरू किया है। इससे केंद्र और राज्यों की सरकारों को सबक लेना चाहिए और अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। यह कितनी बुनियादी बात है कि कोरोना वायरस की महामारी के दौरान कांवड़ यात्रा नहीं होनी चाहिए लेकिन हैरानी की बात है कि उत्तर प्रदेश सरकार को इतनी सी बात समझ में नहीं आई। उसने कांवड़ यात्रा शुरू कराने का फैसला कर लिया। कुंभ मेले के आयोजन से मिले सबक की वजह से उत्तराखंड सरकार को सद्बुद्धि आ गई थी और उसने यात्रा रद्द कर… Continue reading न्यायपालिका कब तक राह दिखाएगी?

अंधानुकरण तो ठीक नहीं

अब ताजा विवाद ब्रिटेन में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच महामारी संबंधी तमाम प्रतिबंधों को हटाने के जॉनसन सरकार के फैसले से खड़ा हुआ है। इस निर्णय के लिए प्रधानमंत्री जॉनसन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई है।

इमरजेंसीः विदेशी साजिश और वैश्विक इमेज

विदेशी साजिश के खौफ-पैरानॉयड मनोदशा में इमरजेंसी ( emergency conspiracy global image ) का फैसला था। हालातों के डर पैदा करने वाली खुफिया ब्रीफिंग में रॉ प्रमुख आरएन काव ने इंदिरा गांधी का कैसे-क्या माइंड बनाया इस पर किसी का फोकस नहीं रहा।… फिर पेंडुलम के दूसरे छोर पर नेहरू की बेटी को तानाशाह की वैश्विक बदनामी ने पहुंचाया। कैसे वे प्रजातंत्र स्थापक-पोषक पिता नेहरू की जगत पुण्यता के कंट्रास्ट में अपनी तानाशाह बदनामी पर विचार नहीं करतीं। तभी एक दिन उनका अपने स्तर पर चुनाव का फैसला था। यह भी पढ़ें: इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड! emergency conspiracy global image : सवाल है यदि इंदिरा गांधी चुनाव नहीं करातीं और संजय गांधी को भारत भर में अपने लोगों का संगठन फैलाने के लिए पांच-दस साल का अवसर देतीं या एकदलीय व्यवस्था ले आतीं तो क्या जनता उसे गुमसुम वैसे ही बरदाश्त नहीं करती जैसे 19 महीने किया! मगर संजय गांधी के न चाहने के बावजूद इंदिरा गांधी ने चुनाव कराने का फैसला करके लोगों के हाथों में मतपत्र पहुंचाया। सब कुछ कंट्रोल में था। नॉर्मल था। न खुला विरोध, न भूमिगत आंदोलन और न बड़ौदा डायनामाइट कांड जैसे फटाके। विपक्ष के उस गुब्बारे को दुनिया ने जाना जिसमें अखबारों से… Continue reading इमरजेंसीः विदेशी साजिश और वैश्विक इमेज

इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड!

अपना मानना है कि इंदिरा गांधी का इमरजेंसी ( emergency Indira gandhi ) लगाना और चुनाव का फैसला उनका खुद का निर्णय था। वे अंतर्मन से गाइडेड थीं। वे पार्टी में विद्रोह (चंद्रशेखर-धारिया की बेबाकी, जगजीवन राम-वाईबी चव्हाण आदि की महत्वाकांक्षाओं) के भय और विदेशी साजिश के डर के पैरानॉयड में थी। जिन्हें 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा भारत की 85 साल पुरानी पार्टी को तोड़ने का इतिहास ज्ञात है वे जानते हैं कि इंदिरा गांधी ने राजनीति को कैसी मनोदशा में खेला। मैं 1975-76 में पत्रकार नहीं था लेकिन जेएनयू में फ्रीलांसिग करने लगा था। ऐसा जेएनयू में होने के कारण नहीं था, बल्कि भीलवाड़ा में ‘नई दुनिया’ सहित उपलब्ध पत्र-पत्रिकाओं, ‘बीबीसी’ से बनी राजनीतिक चेतना से था। उस वक्त कच्चे दिमाग में जो दिलचस्पी बनी, उसके फ्लैशबैक में जब मैं मार्च 1971 से जून 1975 के चार सालों की घटनाओं पर सोचता हूं तो एक पहेली बनती है। सोचें, कांग्रेस के दो फाड़ के बाद इंदिरा गांधी ने अपने बूते लोकसभा की 352 सीटें जीती थीं। मार्च 1971 के चुनाव में विरोधी कामराज-मोरारजी कांग्रेस को सिर्फ 16 सीटें मिली थीं। तब नंबर दो पार्टी सीपीएम (25) थी और नंबर तीन पर जनसंघ (22 सीटें)। समाजवादियों की संसोपा-प्रसोपा के… Continue reading इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड!

महंगाई का आंकड़ा दायरे से बाहर

नई दिल्ली। जून के महीने में भी खुदरा महंगाई का आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से तय किए गए दायरे से ऊपर रहा ( Inflation out of range ) । राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, एनएसओ की ओर से जारी आंकड़े के मुताबिक जून महीने में खुदरा महंगाई की दर 6.26 फीसदी रही। भारतीय रिजर्व बैंक ने चार फीसदी का दायरा तय किया है और दो फीसदी का मार्जिन रखा है। खुदरा महंगाई की दर चार फीसदी और दो फीसदी के मार्जिन से ऊपर रही। Corona: तीसरी लहर बेहद करीब, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की चेतावनी पिछले महीने यानी मई में खुदरा महंगाई की दर 6.30 फीसदी थी। इस लिहाज से 0.04 फीसदी की मामूली कमी इसमें हुई है लेकिन उससे आमलोगों को कोई खास राहत नहीं मिलेगी। एनएसओ के आंकड़ों के मुताबिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा महंगाई की दर में सबसे ज्यादा हिस्सा खाने-पीने की चीजों का है। जून के महीने में खाने-पीने की चीजें मई के मुकाबले ज्यादा महंगी हुईं। खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ने का कारण पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में हुई बढ़ोतरी है। एनएसओ की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक खाने-पीने की चीजों की महंगाई दर जून में 5.15 फीसदी रही, जो मई में… Continue reading महंगाई का आंकड़ा दायरे से बाहर

इमरजेंसीः खामोख्याल विपक्ष

इमरजेंसी की घोषणा के साथ पहले से बनाई लिस्ट अनुसार रात में सोते हुए जितने नेताओं-कार्यकर्तार्ओं को गिरफ्तार किया गया था वहीं इमरजेंसी बंदियों का असली लब्बोलुआब है। घोषणा के अगले दिन सूरज निकला तो तब गिरफ्तार हुए अपने केसी की जुबानी का सत्य कि दिल्ली की सड़कों पर, जेपी के पटना में इमरजेंसी के खिलाफ कुत्ता भी भौंकता हुआ नहीं था! indira gandhi in 1975 अनुभव में इमरजेंसी दिखती नहीं थी। विपक्ष को सांप सूंघा हुआ था। न प्रदर्शन थे और न आंदोलन। सन् 1975-76 में देश की आबादी कोई 70 करोड़ थी। लेकिन इमरजेंसी के खिलाफ पर्चे बांटते पकड़े गए लोगों की संख्या थी सात हजार। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बीस महीने में एक लाख 40 हजार लोगों की गिरफ्तारी का अनुमान लगाया था। और पता है इनमें सर्वाधिक कौन थे? 40 हजार सिख थे। इनके बाद आनंदमार्गी, नक्सलियों-मार्क्सवादियों की संख्या थी। हां, सबसे बड़ी संख्या अकाल तख्त की तानाशाही के खिलाफ आवाज के चलते थी। अकालियों ने सर्वाधिक गिरफ्तारियां दी। ऐसा किसी हिंदू संगठन या आरएसएस से जेल भरने का आव्हान नहीं था। इमरजेंसी का मर्दानगी से विरोध पंजाब में सिखों का और केरल में सीपीएम के काडर का था, जबकि दिल्ली से लेकर बिहार के हिंदी भाषी… Continue reading इमरजेंसीः खामोख्याल विपक्ष

इमरजेंसी… मुझे दिखी नहीं!

जेएनयू और दिल्ली घूमते-देखते हुए लगा ही नहीं कुछ असामान्य है। जन-जीवन, आवाजाही और अखबार सब सामान्य। हां, अखबारों में विपक्ष और राजनीति की खबर ढूंढे नहीं मिलती थीं और न इमरजेंसी की खबर। मानों भारत बिना विपक्ष और राजनीति के हो। जेएनयू में बंदिश, घुटन जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ। न ही सहपाठी छात्र-प्रोफेसर-स्टाफ उद्वेलित या बेचैन।…. जेएनयू की उन दिनों की याद से अब समझ आता है कि 26 जून 1975 से लेकर 10 जुलाई 1975 के पंद्रह दिनों में जो होना था वह हो गया। hari shankar vyas jindageenama : छब्बीस जून 1975 का वह दिन…मैं तब भीलवाड़ा में था। जेएनयू में दाखिले की तैयारी करता हुआ। जुलाई में दिल्ली आया और अपने जिले के एमफिल छात्रों रविंद्र व्यास, नंदलाल गुर्जर और राजस्थान से ही आए प्रो. कुरैशी की मदद व पिछड़े इलाके जैसी कसौटी से दाखिला हुआ। गंगा हॉस्टल में कमरा नंबर 317 रहने का ठिकाना। तीसरे फ्लोर पर सामने सीताराम येचुरी का कमरा था।…तब नए-पुराने दोनों कैंपस मुर्दनगी में शांत से लगे। उन दिनों भीड़ वैसे भी नहीं थी और मेरे जैसे, छोटे शहर के छोटे कॉलेज से आए छात्र के लिए भव्य, मगर खाली-खाली इमारतों में सामान्य हलचल हैरान करने वाली थी। आबोहवा में… Continue reading इमरजेंसी… मुझे दिखी नहीं!

फ्लैशबैक में, लम्हों की खता!

ख्याल कौंधा है कि महामारी काल में जो ठहराव है वैसा अपने अनुभव में पहले कब था? दूसरा सवाल है कि ठहरे वक्त की किंकर्तव्यविमूढ़ता में पुरानी घटनाओं को फ्लैशबैक में टटोलें तो क्या निकलेगा? … आजाद भारत के इतिहास में सिर्फ छह-सात क्षण हैं, घटनाएं हैं जो 75 साल का कुल अनुभव हैं। कौन सी हैं ये घटनाएं? एक, चीन से हार। दो, बांग्लादेश जीत। तीन, इमरजेंसी। चार, ब्लूस्टार ऑपरेशन। पांच, नरसिंह राव की अर्थ क्रांति। छह, अयोध्या में मस्जिद ध्वंस। सात, मंडल आयोग। आठ, कोविड-19 महामारी। पंडित का जिंदगीनामा: लंदनः समझदारी की पाठशाला पंडित का जिंदगीनामा-18:  ( hari shankar vyas ) महामारी काल….. अनिश्चित जिंदगी और उसे छोटा बनाता समय! तभी मुझे जीवन के उत्तरार्ध में वक्त को यादों में गुनगुनाते हुए होना चाहिए। जिंदगीनामा लिखते जाना चाहिए। लेकिन मैं भटका हूं! मान नहीं रहा हूं कि अखबारी सुर्खियों के खटराग में कुछ नहीं है। हिंदुओं का कलियुग कभी खत्म नहीं होगा। हमारे जीवन में देवत्व, आजादी, निर्भीकता, सत्यता और वह सभ्यता, वह सतयुग खिल ही नहीं सकता जो पशुता-एनिमल फार्म से दीगर पृथ्वी के कई मानवों का विकास है। यही सोचते हुए दिमाग फिर जिंदगी पर लिखने को कुलबुला रहा है। क्यों नहीं कुछ दिन दिमाग में… Continue reading फ्लैशबैक में, लम्हों की खता!

जन्मदिन पर बधाइयों का सिलसिला शुरू

PM Narendra Modi Birthday Wishes : तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जन्मदिन पर बधाइयां देनी शुरू कर दी हैं! पिछले दिनों जब उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनके जन्मदिन पर बधाई नहीं दी थी तो सूत्रों के हवाले से मीडिया को बताया गया था कि कोरोना वायरस की महामारी की दूसरी लहर में लोगों के प्रभावित होने और मरने की घटनाओं से आहत प्रधानमंत्री किसी को जन्मदिन की बधाई नहीं दे रहे हैं। सचमुच उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों को भी बधाई नहीं दी थी। लेकिन मंगलवार को उन्होंने दो लोगों को जन्मदिन की बधाई दी। सो, लग रहा है कि अब सिलसिला शुरू हो गया। यह भी पढ़ें: कुणाल घोष की नाटकीयता! प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने पहली बार 14वें दलाई लामा को बधाई दी। उन्होंने दलाई लामा के 86वें जन्मदिन पर उनसे बात भी की। प्रधानमंत्री ने ट्विट करके बताया कि उन्होंने दलाई लामा से फोन पर बात की और उनको सुदीर्घ व स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए जन्मदिन की बधाई ( PM Narendra Modi Birthday Wishes ) दी। इससे पहले इस मसले पर चीन की संवेदनशीलता को समझते हुए उसकी चिंता में प्रधानमंत्री दलाई लामा को बधाई नहीं… Continue reading जन्मदिन पर बधाइयों का सिलसिला शुरू

टीका ही है बचाव

इस बीच राहत की कोई बात है, तो वो यही कि जो लोग संक्रमित हो रहे हैं, उनकी स्थिति उतनी गंभीर नहीं हो रही है, जैसा पहले हुआ था। पहले नए मामलों के साथ मृत्यु की जो दर थी, अभी वो उससे बहुत कम है। वैक्सीन के दोनों डोज ले चुके लोगों को शायद ही अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ रही है। Vaccine protection delta variant : ब्रिटेन दुनिया के उन देशों में है, जहां सबसे ज्यादा टीकाकरण हुआ है। इसके बावजूद अब अब देश पर कोविड-19 महामारी की तीसरी लहर का खतरा मंडराने लगा है। ब्रिटेन में ताजा लहर की वजह कोरोना वायरस का डेल्टा वैरिएंट बना है। और यही वजह है कि अब दुनिया ब्रिटेन को एक टेस्ट केस के रूप में देख रही है। विशेषज्ञ ये चेतावनी दे चुके हैं कि अब दुनिया भर में डेल्टा वैरिएंट की मुख्य वैरिएंट हो गया है। स्वाभाविक है कि ब्रिटेन में इसकी वजह से कैसे हालात बनते हैं, उसे देखने में पूरी दुनिया की दिलचस्पी है। गौरतलब है कि ब्रिटेन दुनिया का पहला देश बना है, जहां टीकाकरण की दर ऊंची है, फिर भी जहां कोरोना वायरस का सबसे अधिक संक्रामक माना जा रहा डेल्टा वैरिएंट तेजी से… Continue reading टीका ही है बचाव

कोविड खत्म नहीं हो रहा!

लगभग सौ देशों में डेल्टा वैरिएंट पंहुचने और ब्रिटेन से ले कर बांग्लादेश में पैनिक प्रमाण है कि कोरोना की महामारी लंबी चलेगी। नए-नए वैरिएंट और उनका तेजी से पूरी दुनिया में फैलना किसी के न समझ में आने वाली पहेली है। पहले का ब्रिटेन में मिला अल्फा वैरिएंट भी कोई 172 देशों में जा पहुंचा है। माना जा रहा था कि ऑस्ट्रेलिया, जापान में चाकचौबंद बंदोबस्तों से कोरोना लगभग खत्म। लेकिन दोनों अभी वायरस से जूझते हुए हैं। उत्तर कोरिया ने पूरी दुनिया में डंका बजाया था कि उसके यहां वायरस घुसा नहीं लेकिन इसी सप्ताह उसके तानाशाह राष्ट्रपति किम ने पगलाए-घबराए अंदाज में अधिकारियों पर ऐसी गाज गिराई, जिससे लग रहा है कि वहां महामारी ने बहुतों को मारा है। ध्यान रहे चीन इस देश का ग़ॉडफादर है। अपनी वैक्सीन-अपने तरीकों का बैकअप दे रखा है बावजूद इसके महामारी से फड़फड़ाए राष्ट्रपति किम! य​ह भी पढ़ें: यह अछूत होना नहीं तो क्या? ब्रिटेन में 67 प्रतिशत लोगों ने एक और 47 प्रतिशत ने दोनों टीके लगवा लिए हैं और कम संक्रमण व हर्ड इम्युनिटी से वहां महामारी पर पूरा कंट्रोल बनता लगता था लेकिन डेल्टा वैरिएंट के केसेज ने सब गड़बड़ा दिया है वैसे ही जैसे ऑस्ट्रेलिया में… Continue reading कोविड खत्म नहीं हो रहा!

अकेले वैक्सीन से नहीं रूकेगा कोरोना

इसमें संदेह नहीं है कि 21 जून के बाद भारत में वैक्सीनेशन की रफ्तार बढ़ी है और हर दिन औसतन 50 लाख से ज्यादा लोगों को वैक्सीन लग रही है। यह भी सही है कि कोरोना संक्रमण के मामलों में कमी आई है और पिछले करीब एक हफ्ते से मरने वालों की संख्या भी एक हजार से नीचे है। लेकिन सवाल है कि क्या अकेले वैक्सीनेशन के सहारे कोरोना को रोका जा सकता है? इसका जवाब किसी के पास नहीं है क्योंकि वैक्सीनेशन के बाद दुनिया के दूसरे देशों की तरह भारत में इस बात का आकलन नहीं हो रहा है कि नए वैरिएंट्स पर यह कितना कारगर हो रहा है। हालांकि यह दावा किया जा रहा है कि भारत की वैक्सीन अल्फा और डेल्टा दोनों वैक्सीन पर कारगर हो रही है लेकिन हकीकत यह है कि डेल्टा वैरिएंट के ही कई नए स्ट्रेन आ गए हैं, जिनमें एक डेल्टा प्लस है। इसके बारे में अभी तक वस्तुनिष्ठ अध्ययन नहीं हो पाया है। य​ह भी पढ़ें: दुनिया के देशों में फिर तबाही शुरू अकेले वैक्सीन या कोरोना को संभालने का बेहतर प्रबंधन वायरस के संक्रमण को रोकने में कारगर नहीं है, इसकी मिसाल केरल में देखने को मिल रही है।… Continue reading अकेले वैक्सीन से नहीं रूकेगा कोरोना

दुनिया के देशों में फिर तबाही शुरू

भारत में जिस समय एक दिन में चार लाख केसेज आए थे उस दिन दुनिया में आठ लाख केस आ रहे थे यानी दुनिया में कितने केसेज आ रहे थे उनमें से आधे अकेले भारत में आ रहे थे।  लेकिन भारत में अब 40 हजार के आसपास केसेज रोज आ रहे हैं लेकिन दुनिया में चार लाख केस रोज आ रहे हैं। यानी भारत में जितने केस आ रहे हैं उससे दस गुना केसेज दुनिया में आ रहे हैं। इसका मतलब है कि भारत में पीक के मुकाबले केसेज की संख्या में दस गुना कमी आ गई है लेकिन दुनिया में अब भी उतने ही केस आ रहे हैं। यह चिंता की बात है। दुनिया में सर्वाधिक संक्रमित अमेरिका में अब केसेज काबू में हैं लेकिन ब्राजील, रूस, ब्रिटेन जैसे देशों में संकट कम नहीं हो रहा है। ब्रिटेन में तो बड़ी गिरावट के बाद फिर से संक्रमितों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही है। य​ह भी पढ़ें: यह अछूत होना नहीं तो क्या? सोचें, ब्रिटेन में 70 फीसदी लोगों को कम से कम एक डोज लग गई है और 50 फीसदी लोगों पूरी तरह से वैक्सीनेट हो चुके हैं इसके बावजूद वहां केसेज बढ़ रहे हैं। ब्रिटेन में… Continue reading दुनिया के देशों में फिर तबाही शुरू

ये विषमता कहां ले जाएगी?

inequality india rich poor : केंद्रीय बैंक बड़ी संख्या में नोट छाप कर ब्याज दरों को कम करना चाहते थे, ताकि लोन देकर उद्योगों को बढ़ावा दे सकें और अर्थव्यवस्था को नुकसान से निकाला जा सके। लेकिन ऐसा होने के बजाए यह पैसा शेयर बाजार में लगाया गया। नतीजतन वही लोग अमीर होते रहे, जो पहले से अमीर थे। कोरोना महामारी की मार पूरी दुनिया पर पड़ी। भारत सबसे बुरी तरह प्रभावित देशों में एक रहा। ये एक आपदा है, यह मानने में कोई हिचक नहीं हो सकती। लेकिन किसी परिवार में अगर किसी आपदा से सभी बराबर पीड़ित हों, तो सब यह मान लेते हैं कि बुरा वक्त आया, तो उसका नतीजा सबको भुगतना पड़ा। लेकिन अगर बुरा वक्त किसी एक तबके लिए चमकने का मौका मिल जाए, तो समाज में सवाल उठेंगे। न सिर्फ सवाल उठेंगे, बल्कि देर सबेर असंतोष भी पैदा होगा। आज हम उसी कगार पर हैँ। एक ताजा रिपोर्ट ने बताया है कि (डॉलर को मुद्रा का आधार मानें तो) 2020 में हर भारतीय परिवार की घरेलू संपत्ति 6.1 प्रतिशत कम हो गई है। रुपये को आधार माने तो यह कमी करीब 3.7 प्रतिशत है। संपत्ति में आई इस कमी की मुख्य वजह यहां जमीन… Continue reading ये विषमता कहां ले जाएगी?

ये बदलाव गौरतलब है

कोरोना महामारी ने करोड़ों अमेरिकियों को अपनी राजनीतिक विचारधारा पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है। कारण संभवतः यह है कि इस दौरान आर्थिक गैर बराबरी तेजी से बढ़ी है। दूसरी तरफ राहत पहुंचाने के लिए हुए सरकारी हस्तक्षेप ने सरकार की भूमिका को लेकर अच्छी राय बनाई है। Political Ideology Corona : अमेरिका वह देश है, जहां समाजवाद शब्द एक लांछन रहा है। एक समय जब मैकार्थिज्म का दौर था, समाजवादी या कम्युनिस्ट होना वहां खतरे से खाली नहीं था। ऐसे लोगों को यूनिवर्सिटी या मीडिया से बाहर किया जाता था और सीएआई उनकी निगरानी करती थी। ये तब की बात है, जब अमेरिका और सोवियत खेमे के बीच शीत युद्ध चल रहा था। शीत युद्ध के बाद भी लंबे समय तक मोटे तौर पर समाजवाद को अमेरिकी जनमत के भीतर के नकारात्मक नजरिए से ही देखा जाता था। अपने को सोशलिस्ट मानने वाले लोग कितने दबाव में रहते थे उसकी एक मिसाल बर्नी सैंडर्स हैं। 2015 के पहले उन्हें विदेशों में शायद ही कोई जानता था। लेकिन 2015 में जब वे राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी हासिल करने की होड़ में उतरे, तो उन्हें मिली लोकप्रियता को देख कर लोग हैरत में रह गए। जाहिर… Continue reading ये बदलाव गौरतलब है

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