पड़ौसी देशः नई पहल जरुरी

भारत के विदेश मंत्री डा. जयशंकर आजकल अमेरिका के नेताओं, अफसरों और विदेश नीति विशेषज्ञों से गहन संवाद कर रहे हैं। यह बहुत सामयिक है, क्योंकि इस कोरोना-काल में सबका ध्यान महामारी पर लगा हुआ है और विदेश नीति हाशिए में सरक गई है। लेकिन चीन-जैसे राष्ट्र इसी मौके को अवसर की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत के पड़ौसी राष्ट्रों और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन ने अपने पांव पसारने शुरु कर दिए हैं। पाकिस्तान के साथ चीन की इस्पाती-दोस्ती या लौह-मैत्री तो पहले से ही है। पाकिस्तान अब अफगान-संकट का लाभ उठाकर अमेरिका से भी सांठ-गांठ करना चाहता है, इसलिए उसके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने हाल ही में एक ताजा बयान भी दिया है कि पाकिस्तान किसी खेमे में शामिल नहीं होना चाहता है याने वह चीन का चप्पू नहीं है लेकिन उसकी पुरजोर कोशिश है कि अमेरिका की वापसी के बाद वह अफगानिस्तान पर अपना पूर्ण वर्चस्व कायम कर ले। यों भी अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में पाकिस्तान की असीम दखलंदाजी है। कल ही हेलमंद घाटी में तालिबान के साथ घायल एक पाकिस्तानी फौजी अफसर की मौत हुई है। अफगानिस्तान आजाद रहे, भारत यही चाहता है। इसीलिए हमारे विदेश मंत्री की कोशिश है कि अमेरिका… Continue reading पड़ौसी देशः नई पहल जरुरी

सिंहासन-सप्तपदी के सात बरस बाद

जिन्हें इतिहास की समझ है, वे जानते हैं कि हुक़्मरान जब-जब कलंदरी पर उतारू होते हैं, जनता भी तब-तब चीमटा बजाने लगती है। जिन्हें समझ कर भी यह इतिहास नहीं समझना, उनकी समझ को नमन कीजिए। लेकिन एक बात अच्छी तरह समझ लीजिए। जनता जब अपनी पर आती है तो वह किसी गांधी-वांधी, पवार-फवार, अण्णा-केजरी की मोहताज़ नहीं होती। वह अपने नायक स्वयं निर्मित कर लेती है। मैं ने पहले भी कहा है और दोबारा कह रहा हूं कि इस साल की दीवाली गुज़रने दीजिए, उसके बाद सियासी हालात का ऊंट इतनी तेज़ी से करवट लेगा कि उसकी कुलांचें देख कर अच्छे-अच्छों की घिग्घी बंध जाएगी। जिन्हें लगता है कि नरेंद्र भाई ने अपनी मातृ-संस्था के प्रमुख मोहन भागवत के नीचे की कालीन इस तरह अपनी मुट्ठी में कर ली है कि जिस सुबह चाहेंगे, सरका देंगे, उनकी खुशफ़हमी अगली वसंत पंचमी आते-आते काफ़ूर हो चुकी होगी। कल नरेंद्र भाई मोदी को दोबारा भारत माता के माथे पर सवार हुए सात साल पूरे हो जाएंगे। अपने हर काम को करतब में तब्दील करने की ललक से सराबोर नरेंद्र भाई ने 2014 में दक्षेस देशों के शासन-प्रमुखों की मौजूदगी में भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री के तौर पर सिंहासन-सप्तपदी की थी और… Continue reading सिंहासन-सप्तपदी के सात बरस बाद

एक थे शास्त्री, एक हैं मोदी: दो विपदा, दो प्रधानमंत्री!

हम हिंदू इतिहास-याद्दाश्त में कच्चे हैं। आंखें मोतियाबिंद की मारी व बुद्धि मंद! सिर्फ वर्तमान के कुएं में जीते हैं। कितनों को भान है कि 1947 में आजादी के बाद भूख और भूखे पेट की विपदा कब थी? तो जवाब है

चीन को बांग्लादेश का दो टूक जवाब

ढाका। चीन अपने कर्ज के जाल में फंसाए गए छोटे-छोटे देशों को धमकी देता रहता है। ऐसी ही एक धमकी उसने बांग्लादेश को दी, जिस पर बांग्लादेश ने उसे दो टूक जवाब दिया है। चीन ने बांग्लादेश की भारत से करीबी को लेकर कहा कि बांग्लादेश को क्वाड समूह में नहीं शामिल होना चाहिए। ध्यान रहे क्वाड भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के चार देशों का एक समूह है, जो हिंद-प्रशांत में चीन के बढ़ते असर पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया है। पिछले दिनों ढाका के दौरे से चीन के रक्षा मंत्री के लौटने के बाद मंगलवार को बांग्लादेश में चीन के राजदूत ने कहा- बांग्लादेश अगर भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के क्वॉड ग्रुप में शामिल हुआ तो उसे इसका बड़ा खामियाजा उठाना पड़ेगा। इसके बाद बांग्लादेश ने चीन की धमकी का बहुत सख्त अंदाज में जवाब दिया। बांग्लादेश ने कहा कि चीन उसे सीख न दे वह एक आजाद मुल्क है और अपनी विदेश नीति खुद तय करेगा। गौरतलब है कि चीन के रक्षा मंत्री जनरल वेई फेंग पिछले महीने ढाका आए थे। यहां उन्होंने प्रधानमंत्री शेख हसीना और मिलिट्री लीडरशिप से मुलाकात की थी। इसके बाद मंगलवार को बांग्लादेश में चीनी राजदूत ली जिमिंग का… Continue reading चीन को बांग्लादेश का दो टूक जवाब

एक उम्मीद तो जगी

म्यांमार की हालत के बारे में दुनिया में एक तरह का असहाय होने का भाव रहा है। म्यांमार के सैनिक शासक बेरहमी से लोकतंत्र समर्थक आंदोलनकारियों की जान लेते रहे हैं, लेकिन बाहरी दुनिया से वहां किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं हुआ है। पश्चिमी देशों ने जो पहल की उसे चीन और रूस ने नाकाम कर दिया। म्यांमार के सैनिक शासकों को अलग लगता हो कि इन दो बड़ी ताकतों के हाथ उनकी पीठ पर हैं, तो यह गलत नहीं है। इसीलिए एसोसिएशन ऑफ साउथ-ईस्ट एशियन नेशन्स (आसियान) की पहल से एक हलकी से उम्मीद जगती दिखी है। उसने म्यांमार के संकट को हल करने के लिए जो पहल की है, उस पर पश्चिमी देशों और चीन में सहमति बन सकने के शुरुआती संकेत दिखे हैं। आसियान की योजना को असल में बड़ा बल तब मिला, जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने आसियान के बयान की भाषा के अनुरूप अपील जारी की। सुरक्षा परिषद ने अपने बयान की भाषा इस रूप में तैयार की गई, जिससे चीन और रूस को कोई आपत्ति ना हो। सुरक्षा परिषद ने आसियान से कहा कि वह अपने फैसले के मुताबिक म्यांमार के लिए अपना दूत तुरंत नियुक्त करे। यानी एक तरह से परिषद ने… Continue reading एक उम्मीद तो जगी

क्या बदलेगी भारत की म्यांमार नीति?

will indias myanmar policy change : अब क्या म्यांमार के प्रति भारत की नीति बदलेगी? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि अमेरिका के एसएंडपी डाउ जोंस के इंडेक्स से अडानी पोर्ट एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन को हटाने का फैसला किया गया है। डाउ जोंस की ओर से कहा गया है कि 15 अप्रैल को एपीएसईजेड को इंडेक्स से हटा दिया जाएगा क्योंकि कंपनी के कारोबारी रिश्ते म्यांमार की सेना के साथ हैं, जिसने अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक मानव अधिकारियों का गंभीर उल्लंघन किया है। गौरतलब है कि म्यांमार में चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करके सत्ता हासिल करने और उसके बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों की हत्या कर रहे सैन्य शासन के खिलाफ अमेरिका ने पहले से पाबंदी लगाई हुई है। देवास जिला ने जीती कोरोना से जंग, पिछले 9 दिनों में एक भी मरीज नहीं अमेरिका की पाबंदी के बाद से ही इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि अडानी समूह की मुश्किलें बढ़ सकती हैं क्योंकि कंपनी यंगून में जो बंदरगाह बना रही है उस प्रोजेक्ट में सेना के कई अधिकारी की साझेदारी वाली कंपनियां भी शामिल हैं। म्यांमार इकोनॉमिक होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड और म्यांमार इकोनॉमिक कॉरपोरेशन लिमिटेड के साथ जुड़े कोई 10 सैन्य… Continue reading क्या बदलेगी भारत की म्यांमार नीति?

भारत की विदेश नीति खत्म!

बहुत बुरा लगा अपनी ही प्रजा पर गोलियां चलाने वाली सेना के साथ भारतीय सेना की उपस्थिति की खबर सुन कर! उफ! क्या हो गया है भारत? हम किन मूल्यों, आदर्शों और संविधान में जीते हुए हैं? जो हमारा धर्म है, हमारा संविधान है, हमारी व्यवस्था है, उसमें कैसे यह संभव जो हम खूनी के साथ खड़े हों। खूनी का, लोगों का कत्लेआम करने वाली सेना, तानाशाही का भारत हौसला बढ़ाए यह हम भारतीयों के लिए, दुनिया के कथित सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली बात है या जिंदा रहने की बात? पता नहीं आपने जाना या नहीं कि प्रजा के खून से रंगी म्यांमारी सेना के 27 मार्च के सालाना दिवस के समारोह में भारतीय सेना के प्रतिनिधिसैनिक अटैची ने तानाशाह सेनापति का हौसला बढ़ाया। दुनिया में भारत की खबर बनी। फालतू का तर्क है कि जब बर्मा याकि म्यांमार से कूटनीतिक संबंध है तो डिफेंस अटैची को सेना की परेड में जाना ही होगा। खूनी सेनापति को सैल्यूट मारनी होगी। पर क्या अमेरिका, ब्रिटेन व यूरोपीय संघ के लोकतांत्रिक देशों के म्यांमार से कूटनीतिक रिश्ते नहीं हैं? म्यांमार में जब इनके दूतावास हैं और इन्होंने सेना की परेड में उपस्थिति दर्ज नहीं… Continue reading भारत की विदेश नीति खत्म!

भारत गूंगी गुड़िया क्यों बना रहे?

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के हिसाब से कल तीन महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। एक तो अलास्का में अमेरिकी और चीनी विदेश मंत्रियों की झड़प, दूसरी मास्को में तालिबान-समस्या पर बहुराष्ट्रीय बैठक और तीसरी अमेरिकी रक्षा मंत्री की भारत-यात्रा। इन तीनों घटनाओं का भारतीय विदेश नीति से गहरा संबंध है। यदि अमेरिकी और चीनी विदेशमंत्रियों के बीच हुई बातचीत में थोड़ा भी सौहार्द दिखाई पड़ता तो वह भारत के लिए अच्छा होता, क्योंकि गलवान-मुठभेड़ के बावजूद चीन के साथ भारत मुठभेड़ की मुद्रा नहीं अपनाना चाहता है। लेकिन अलास्का में दोनों पक्षों ने तू-तू—मैं-मैं का माहौल खड़ा कर दिया है। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के विरुद्ध खुले-आम भाषण दिए हैं। इसका अर्थ यही हुआ कि बाइडन प्रशासन में भी चीन के प्रति ट्रंम्प-नीति जारी रहेगी। अब भारत को दोनों राष्ट्रों के प्रति अपना रवैया तय करने में सावधानी और चतुराई दोनों की जरुरत होगी। दूसरी घटना मास्को में तालिबान-समस्या को लेकर हुईं। उस वार्ता में रुस के साथ-साथ अमेरिका, भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। अफगान सरकार और तालिबान के प्रतिनिधि वहां उपस्थित थे ही।दोहा-समझौते के मुताबिक अफगानिस्तान में अमेरिका और यूरोपीय देशों के जो लगभग 10 हजार सैनिक अभी भी जमे हुए हैं, वे 1 मई तक वापस लौट जाने चाहिए… Continue reading भारत गूंगी गुड़िया क्यों बना रहे?

अमेरिका वापस आ गया है!

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने दो रोज पहले अपनी विदेश नीति के बारे में पहला भाषण दिया। इससे साफ संकेत मिला कि बाइडेन के कार्यकाल में पिछले प्रशासन की तुलना में कई चीजें बदलेंगी।

इस्लामी देश और भारत

प्रमुख अरब देशों के साथ भारत के संबंध जितने घनिष्ट आजकल हो रहे हैं, उतने वे पहले कभी नहीं हुए।

पड़ौसी देशों के साथ सक्रियता

पिछले एक हफ्ते में हमारे विदेश मंत्रालय ने काफी सक्रियता दिखाई है। विदेश मंत्री जयशंकर, सुरक्षा सलाहकार अजित दोभाल और विदेश सचिव हर्ष श्रृंगला एक के बाद एक हमारे पड़ौसी देशों की यात्रा कर रहे हैं

चीन करता भारत का घेराव

गलवान घाटी के हत्याकांड पर चीन ने चुप्पी साध रखी है। लेकिन वह भारत पर सीधा कूटनीतिक या सामरिक हमला करने की बजाय अब उसके घेराव की कोशिश कर रहा है।

गरीब की जोरू बन गया है भारत!

भारत के लोक मानस में एक कहावत प्रचलित है‘गरीब की जोरू सबकी भौजाई’ यानी उसके साथ जो चाहे मजाक कर सकता है, छेड़छाड़ कर सकता है। इन दिनों भारत की स्थिति ऐसी ही होती जा रही है।

ईरान मसले पर भारत के प्रति अमेरिकी रुख दुखद : कांग्रेस

कांग्रेस ने कहा है कि ईरान पर कार्रवाई करने से पहले अमेरिका ने पिछले सप्ताह चीन तथा पाकिस्तान जैसे देशों से बात की लेकिन भारत से चर्चा करना उचित नहीं समझा, यह दुखद है और इसकी वजह मोदी सरकार की लचर विदेश नीति है।

विदेश नीतिः नरम-गरम, दोनों

कई लोग पूछ रहे हैं कि विदेश नीति के हिसाब से पिछला साल कैसा रहा? मैं कहूंगा कि खट्टा-मीठा और नरम-गरम दोनों रहा। कश्मीर के पूर्ण विलय को चीन के अलावा सभी महाशक्तियों ने भारत का आतंरिक मामला मान लिया। सउदी अरब और संयुक्त अरब अमारात (यूएई) ने भी भारत का स्पष्ट समर्थन किया। कश्मीर में धारा 370 खत्म करने और उसके पूर्ण विलय ने दुनिया में यह संदेश भेजा कि भारत सरकार का रवैया पहले की तरह ढीला-ढाला नहीं रहेगा। कश्मीर के पूर्ण विलय पर तुर्की और मलेशिया-जैसे देशों ने थोड़ी बहुत आलोचना की लेकिन दुनिया के अधिकतर राष्ट्रों ने मौन धारण कर लिया था। भारत के पड़ौसी मुस्लिम राष्ट्रों- बांग्लादेश, मालदीव और अफगानिस्तान ने भी भारत का समर्थन किया। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, उसे तो कड़ा विरोध करना ही था। उसने किया भी लेकिन अंतरराष्ट्रीय जगत तब भी कश्मीर के सवाल पर तटस्थ ही रहा। उसके पहले बालाकोट पर हुए भारत के हमले को चाहे पाकिस्तान ने ‘हवाई’ करार दे दिया हो लेकिन उसने मोदी सरकार की छवि में चार चांद लगा दिए। भारत-पाक संबंधों में इतना तनाव पैदा हो गया कि मोदी ने नए साल की शुभकामनाएं सभी पड़ौसी नेताओं को दी लेकिन इमरान को… Continue reading विदेश नीतिः नरम-गरम, दोनों

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