कुंद, मंद बुद्धि में जकड़े हम!

हम हिंदुओं का कोर संकट बुद्धिगत है! हम दुनिया के वे प्राणी हैं, जिनका दिमाग, जिनकी बौद्धिकता इतिहास की मार से थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन (विकासवाद का सिद्धांत) से निखरी नहीं, बल्कि डिवोल्यूशन (अधोगति) का शिकार हुई! बुद्धि-दिमाग का हमारा बोध, उसकी अनुभूति का कॉग्निटिव परिवेश बौद्धिकता में, उसकी निडरता के बजाय जड़, मंद, अवचेतन का गुलाम बना!

बिना बने, लड़े, जीये ही निर्वाण!

इस पहेली का कोई जवाब नहीं है। और मुझे नहीं लगता कि हमारी सभ्यता की एंथ्रोपोलॉजी कभी इसका जवाब तलाश भी सकेगी। पहेली मतलब भला कैसे सिंधु नदी घाटी के सभ्यतागत पालने ने भारत के होमो सेपियंस को शिकारी से शिकार में तब्दील किया?

बिखरी सभ्यता में राज की गायब इंद्रियां!

अपने डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने कल फिर लिखा कि बने एक वृहद आर्यावर्त! कई हिंदू विचारक, महात्मा गांधी, डॉ. राम मनोहर लोहिया से ले कर तमाम तरह के सेकुलरअपने-अपने अंदाज में यह साझा सपना लिए रहे थे या लिए हुए हैं कि दक्षिण एशिया एक साझा चूल्हा है।