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Monday, May 10, 2021
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हिंदू

संघ-वीएचपी वालों शर्म करो! अरबों रुपए के चंदे में कुछ तो हिंदुओं को सांस देने पर खर्च करो!

मैं हिंदू हूं। सनातनी सत्व-तत्व की जीवन आस्थाएं लिए हुए हूं और हिंदू होने के गर्व में जीवन जीया है। लेकिन अब मैं सोचने को विवश हूं कि कैसे हम हिंदू, कैसा हिंदू काल, जिसमें हिंदू प्राणी की सांस...

मंदिर विज्ञान और सीनू जोसेफ

पहली ही पुस्तक से चर्चित लेखकों में सीनू जोसेफ का नाम भी जुड़ गया है। कैथोलिक क्रिश्चियन पृष्ठभूमि की सीनू ने इंजीनियरिंग पढ़ी। किन्तु बाद में लड़कियों की स्वास्थ्य शिक्षा कार्य को अपना लिया। जब सबरीमला मंदिर में रजस्वला...

जम्मू-कश्मीर में आबोहवा बदल रही

क्या जम्मू-कश्मीर अपनी मूल सांस्कृतिक विरासत की पुनर्स्थापना की ओर अग्रसर है? इसका उत्तर जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा लिए एक निर्णय में मिल जाता है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की अध्यक्षता वाली प्रशासनिक परिषद ने एक अप्रैल को तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम...

‘अच्छा हिंदू’ जाए विदेश, बने ‘अद्भुत’!

भारत में जीना विकल्पमय, अवसरमय, सत्यमय नहीं है। जुगाड़, कृपा, झूठ में जिंदगी खपानी है। एक वक्त मुझे लगता था कि देश और जीवन को बनवाने वाले अलग-अलग विचारों के विकल्प में जब हिंदू राजनीतिक दर्शन को मौका मिलेगा तो शायद हिंदुओं का जीना सुखमय बने।

अमित शाह गृह मंत्री और अंबानी से रंगदारी हिमाकत!

आप पूछ सकते हैं भला इसमें अमित शाह और मोदी की हिंदूशाही का क्या मतलब?  है और जबरदस्त है! इसलिए कि भारत जो देश है वह दिल्ली तख्त के मिजाज से धड़कता है।

ओछे राज के छोटे-छोटे डर

मगर स्वीडेन की वैश्विक संस्था वी-डेम ने बांग्लादेश के लोकतंत्र को भारत से बेहतर बताया है और भारत को पाकिस्तान सरीका और उसकी तिलमिलाहट में प्रताप भानु पर मोदीशाही की गाज गिरी है तो जान लें भारत की लोकतंत्र रियलिटी का यह दुनिया के आगे स्वंयस्फूर्त खुलासा है।

हिंदू का खत्म होता अच्छापन

क्या अंग्रेज, मुगल, औरगंजेब राज में ऐसे प्रसंग हैं, जिनमें वे प्रवृत्तियां साक्ष्य लिए हुए हों जो इस सदी में सन् 2014 के बाद दिल्ली में बनी हिंदूशाही के 56 इंची मोदी राज की पहचान में वैश्विक चर्चा लिए हुए है

भगवान के घर में भेद-भाव कैसा ?

यदि ईश्वर एक है तो सभी मनुष्य उसी एक ईश्वर के बच्चे है। मैं न तो मूर्ति-पूजा करता हूं, न नमाज पढ़ता हूं और न ही बाइबिल की आयतें लेकिन मुझे देश और दुनिया के मंदिरों, मस्जिदों, गिरजों, गुरुद्वारों और साइनेगागों में जाना बहुत अच्छा लगता है।

लव-जिहाद की अनदेखी न करें सभ्य समाज

गैर-मुस्लिम महिलाओं के लिए अधिकांश मुस्लिम पुरुषों का प्रेम मजहबी अभियान अधिक है। अर्थात्- यह इस्लाम के विस्तार हेतु जिहाद है। इस पृष्ठभूमि में क्या मजहब के नाम पर धोखे को स्वीकार करने से सभ्य समाज स्वस्थ रह सकता है?

भारत कैसे मजहबी उन्माद से निपटे?

आखिर कट्टरवादी-अलगाववादी इस्लामी मान्यताओं-आचरण से सभ्य समाज कैसे निपटें
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अमेरिका-यूरोप के बनो शुक्रगुजार!

अच्छी खबर जो पुर्तगाल के पोर्तो में यूरोपीय संघ के नेताओं ने भारत की चिंता की। भारत के साथ...
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