1856 से पहले हिंदू-मुस्लिम मिलजुल कर रहते थे: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। अयोध्या में विवादित भूमि के बहुप्रतीक्षित फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को कहा कि 1856-57 में ढांचे के पास हुए दंगों से पहले हिंदू और मुस्लिम सहअस्तित्व के साथ मिलजुल कर रहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को दिए अपने फैसले में अयोध्या में विवादित 2.77 एकड़ भूमि हिंदू पक्ष को देकर… Continue reading 1856 से पहले हिंदू-मुस्लिम मिलजुल कर रहते थे: सुप्रीम कोर्ट

अयोध्या का सत्य कयामत तक

मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना सैय्यद अरशद मदनी ने एक वाक्य में सबकुछ कह दिया। उनका कहा हिंदू का भी सत्य है और मुसलमान का भी तो भारत राष्ट्र-राज्य, भारतीय समाज-संस्कृति का सत्व भी है।

चूल्हा हिंदू बना तो जिम्मेवार कौन?

हम और आप 1947 के वक्त, वक्त की भयावहता को नहीं बूझ सकते। मगर इतिहास में तथ्य दर्ज है कि अगस्त 1947 में भारत उपमहाद्वीप में मुसलमान बनाम हिंदू की परस्पर नफरत और हिंसा में जो हुआ वह मानव इतिहास (जंग और अकाल को छोड़ कर) की जघन्यतम दास्तां है।

तो भारत बहुत पहले हिंदू राष्ट्र हो चुका होता!

बात-बात में विपक्ष के एक आला नेता ने कहा, यदि गोडसे ने गांधी को नहीं मारा होता तो भारत बहुत पहले हिंदू राष्ट्र हो चुका होता! वाक्य ने दिमाग के रसायन को खदबदा दिया। लगा कि यह वाक्य मौजूदा वक्त की राजनीति पर एक निष्कर्ष है।

गरीबी पर विदेशी रपट और हम !

यह ठीक है कि 15 अगस्त 1947 को हमारी सैकड़ों वर्ष पुरानी दासता की बेड़ियां टूटी और हम स्वतंत्र हो गए। किंतु क्या मानसिक तौर पर हम अब भी गुलाम नहीं है? क्या एक राष्ट्र के रूप में हमारे चिंतन में आज भी आत्मविश्वास का अभाव और गोरी चमड़ी के प्रति अंधविश्वास नहीं झलकता है?

इतिहास ने सोखा हमारा शिकारीपना!

हम क्यों बचपन में, सिंधु घाटी के पालने में, ईसा पूर्व वाले हजार साल में निर्वाण की सोचने लगे, संन्यासी हो गए और होमो सेपियंस का शिकारी मिजाज गंवा बैठ? इन सवालों पर जितना सोचेंगे, उलझते जाएंगे। सोचें ईसा पूर्व सिंघु घाटी सभ्यता का बिना किसी ठोस वजह विलुप्त होना, अहिंसा परमो धर्म वाले जैन-बौद्ध धर्म का बनना क्या अर्थ बनवाता है?

बिना बने, लड़े, जीये ही निर्वाण!

इस पहेली का कोई जवाब नहीं है। और मुझे नहीं लगता कि हमारी सभ्यता की एंथ्रोपोलॉजी कभी इसका जवाब तलाश भी सकेगी। पहेली मतलब भला कैसे सिंधु नदी घाटी के सभ्यतागत पालने ने भारत के होमो सेपियंस को शिकारी से शिकार में तब्दील किया?

बिखरी सभ्यता में राज की गायब इंद्रियां!

अपने डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने कल फिर लिखा कि बने एक वृहद आर्यावर्त! कई हिंदू विचारक, महात्मा गांधी, डॉ. राम मनोहर लोहिया से ले कर तमाम तरह के सेकुलरअपने-अपने अंदाज में यह साझा सपना लिए रहे थे या लिए हुए हैं कि दक्षिण एशिया एक साझा चूल्हा है।

हमें पता नहीं हम क्या!

आज से मैं आपको बोर करूंगा। हो सकता है मुझे आप पढ़ना छोड़ दें। क्योंकि आपकी-मेरी, आम हिंदू की यह जानने में दिलचस्पी ही नहीं है कि हम हैं क्या? बावजूद इसके मैं अनचाहे सवा सौ करोड़ लोगों के उस अनंत में खो रहा हूं, जिसकी बुनावट का न ओर है न छोर है और न समझने-जानने का कौतुक है