बूढ़ा पहाड़
स्वतंत्र बनो, स्वतंत्र बनाओ!

दिन आज ‘स्वतंत्रता दिवस’ और विचार मेरा कि स्वतंत्र बनो, स्वतंत्र बनाओ! कौन बने स्वतंत्र? देश या नागरिक? देश तो 15 अगस्त 1947 को आजाद हो चुका है। सोचें, आजादी से पहले भारत क्या था? अंग्रेजों का गुलाम।

भय का श्राप तो स्वतंत्र कैसे?

देश के पैमाने में, 138 करोड़ आबादी में या हिंदू के जीवन की कसौटी में ईश्वर का यह श्राप दो टूक है कि हमें स्वतंत्रता, निर्भीकता, निडरता से नहीं, बल्कि भय, खौफ, चिंताओं में जीना है!

पूरा मुल्क भयभीत!

दायरा फिर देश से ले कर आम नागरिक तक है। देश आज चीन से लड़ने की दुविधा में है। चीन पर आर्थिक निर्भरता भयावह है लेकिन कुछ नहीं कर सकते।

आजादी की पहली शर्त निर्भयता है

आजाद होने की पहली शर्त निर्भय होना है और आजादी का पहला सुख भी निर्भय होना ही है। जिसे भय नहीं है वहीं आजादी का सुख ले सकता है। वैसे आजादी अपने आप में सापेक्षिक शब्द है। राजनीति के विद्यार्थी इस सापेक्षता को समझते हैं।

आजादी ने भय पैदा किया

बड़ी बिडंबना है कि साहस और निर्भयता के साथ अंग्रेजों से लड़ कर आजाद हुए भारत के लोग आजादी के सबसे चरम सुख- निर्भयता या साहस का बहुत कम समय तक आनंद ले सके।

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