बूढ़ा पहाड़
भाजपा पीछे नहीं हटेगी

आज तीन-चार खबरों को एक साथ रखकर मैं सोचता रहा कि आशा की किरण भी उभर रही है और साथ ही घनेरे बादल भी छाते चले जा रहे हैं। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप और इमरान दावोस में मिल रहे हैं और ट्रंप कह रहे हैं कि आप चाहें तो मैं कश्मीर के मामले में मध्यस्थता करुं ? मोदी और ट्रंप की घनिष्टता से कौन परिचित नहीं है ? उन्होंने मोदी को ‘भारत का पिताजी’ कहा था। ट्रंप ने मोदी के सामने भी कश्मीर पर मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा था। इधर अटलजी के सलाहकार सुधींद्र कुलकर्णी अभी पाकिस्तान से लौटे हैं। उन्होंने बताया कि उनकी कई फौजियों, नेताओं, विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से बात हुई। उनका मूल्यांकन यह था कि पाकिस्तान खुद आतंकवाद से बहुत तंग आ चुका है। वहां की जनता, नेता और फौज भी चाहती है कि कश्मीर का मसला बातचीत से हल किया जाए। यों भी पाकिस्तान से आ रही खबरें काफी चिंताजनक हैं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संगठन तो डंडा लेकर उसके पीछे पड़ा ही है लेकिन मंहगाई लोगों का दम निकाल रही है। गेहूं का आटा 70 रु. किलो हो गया है। तंदूर की रोटी के दाम डेढ़े हो गए हैं। सब्जी और गोश्त के दाम भी आसमान… Continue reading भाजपा पीछे नहीं हटेगी

सिद्धांत में तो ठीक है

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में जारी प्रतिबंधों के बारे में बीते शुक्रवार को जो फैसला दिया, वह सैद्धांतिक रूप से कुछ मूलभूत सिद्धांतों की पुनर्पुष्टि है। लेकिन इससे व्यवहार में कोई फर्क पड़ा है, कहना कठिन है। मसलन, अगर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट सेवा तक पहुंच मौलिक अधिकार है, तो उसे जम्मू-कश्मीर में इसे तुरंत बहाल करने का निर्णय देना चाहिए था। वरना, बिना औपचारिक आपातकाल के एलान के मौलिक अधिकार से किसी से वंचित रखने का क्या औचित्य हो सकता है? गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जम्मू-कश्मीर प्रशासन को आदेश दिया कि वह एक हफ्ते के भीतर सभी प्रतिबंध आदेशों पर पुनर्विचार करे। ये प्रतिबंध पिछले साल पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के बाद से लगाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना किसी विशेष अवधि और अनिश्चितकाल के लिए इंटरनेट बैन करना दूरसंचार नियमों का उल्लंघन है। इसके अलावा कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि धारा 144 के तहत जारी किए गए सभी आदेश कोर्ट के सामने पेश किए जाएं। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 144 के तहत बार-बार आदेश जारी करना सत्ता का दुरुपयोग होगा। सरकार दुनिया को यह… Continue reading सिद्धांत में तो ठीक है

मोदी, शाह क्या सुन रहे हैं खतरे की घंटी?

भारतीय जनता पार्टी के दोनों शीर्ष नेता क्या खतरे की घंटी सुन पा रहे हैं या नागरिकता कानून के शोर ने उनके कान बंद कर रखे हैं? एक तरफ नागरिकता कानून का देशव्यापी विरोध है और विरोधियों के खिलाफ भाजपा समर्थकों की नारे लगाती भीड़ है, जिसका नारा है- देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को, और दूसरी ओर झारखंड के चुनाव नतीजे की गूंज है। अगर नागरिकता कानून के शोर को चीर कर झारखंड में बजी खतरे की घंटी की आवाज मोदी और शाह के कानों तक पहुंची है तो उनको इस आवाज को गंभीरता से लेना होगा। झारखंड और इससे पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजों के कुछ सबक हैं, जिसे अगर भाजपा नहीं समझती है तो उसके लिए आने वाले दिनों में और मुश्किल होगी। सबसे पहला सबक यह है कि भाजपा को सहयोगियों की जरूरत है। सहयोगी पार्टियों के बगैर ज्यादातर राज्यों में भाजपा के लिए चुनाव जीतना और सरकार बनाना मुश्किल है। पहले महाराष्ट्र में यह बात साबित हुई और अब झारखंड में भी इसका प्रमाण मिल गया है। दोनों राज्यों में भाजपा के पास बहुत पुरानी और भरोसेमंद सहयोगी पार्टियां थीं पर दिल्ली की ओर से प्रदेश में चुन कर बैठाए गए… Continue reading मोदी, शाह क्या सुन रहे हैं खतरे की घंटी?

और लोड करें