भारत माता

मां!…क्षमा करें…मेरे पास न वंदना है, न जय। उलटे मैं अपनी कल्पना, आपके चित्र, आपकी दशा से कंपायमान हूं, व्यथित हूं….आपकी धरा पर धरा के मूर्त अनुभव में। कंपकंपाहट इसलिए कि भागीरथ जिस धरा पर लाए थे गंगा, उसमें मानव अर्थियां बहती हुईं। जिस धरा पर ज्ञान-विज्ञान-सत्य की पावन, गंगा अविरल थी वह अब मूर्खता-गोबर-झूठ… Continue reading भारत माता