न उनका बुलाना नया, न अपना जाना नया

सुशील कुमार सिंह: ‘गवर्नमेंट कम्युनिकेशन’ को लेकर कथित जीओएम की रिपोर्ट की खबर पिछले दिसंबर में ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में सबसे पहले छपी थी और आई-गई हो चुकी थी। इस पर हंगामा तब मचा जब ‘कैरवान’ में हरतोष सिंह बल ने खबर के साथ पूरी रिपोर्ट ही उजागर कर दी। इसका कारण आप खबर लिखने और उसके प्रस्तुतिकरण के अंदाज को भी मान सकते हैं और यह भी कह सकते हैं कि पहली खबर में यह नहीं था कि रिपोर्ट में कथित तौर पर किस पत्रकार को क्या सुझाव देते बताया गया है। हंगामा तो इसी से मचा है। इस रिपोर्ट में डिजिटल मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत रखने और डिजिटल न्यूज और ओटीटी यानी ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म ज्यादा जिम्मेदार बनें, इसकी व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया है। ये दोनों फैसले सरकार घोषित भी कर चुकी है। इससे कोई भी मान सकता है कि रिपोर्ट एक हद तक तो सही है। मगर न तो पत्रकार रिपोर्ट में अपने कहे को और मीटिंग के उद्देश्य को स्वीकार रहे हैं और न इसे तैयार करने वाले कथित जीओएम के सदस्य मंत्री ही कुछ मानने को तैयार हैं। मंत्रियों के साथ हुई दो-तीन मीटिंगों में जिन पत्रकारों के… Continue reading न उनका बुलाना नया, न अपना जाना नया

डिजिटल मीडिया पर लगाम?

पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को जमानत देने से पहले हुई सुनवाई दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सेशन जज धर्मेंद्र सिंह राणा दिल्ली पुलिस से कुछ बहुत स्पेशिफिक बातें पूछी थीं।

समाचार वेबसाइट्स को बतानी होगी मालिकना स्थिति

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 16 नवंबर को एक प्रेस नोट जारी कर इंटरनेट पर भारतीय समाचार ठिकानों के बाबत निर्देश जारी किए है।

डिजिटल मीडिया को केंद्र खतरा मान रहा है

तो क्या इसको हवा बदलने का संकेत मान लिया जाए? केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि डिजिटल मीडिया पर किसी तरह की रोक नहीं है और बेरोकटोक चलने वाला डिजिटल मीडिया एक खतरा है।

1867 के गुलामी एक्ट में डिजिटल मीडिया!

मोदी सरकार 21वीं सदी में 19वीं सदी के अंग्रेजों के एक्ट (भारतीयों को गुलाम बनवाने वाले) में भारत के डिजिटल मीडिया को ले आई है। अंग्रेजों ने 1867 में यह खतरा बूझा था कि भारत के लोग प्रिंटिंग प्रेस आने और उन पर पर्चे व अखबार छाप कहीं आजादी के हरकारे न बन जाएं।

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