इस बहस में नया क्या?

इस वर्ष के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से एक बार फिर गरीबी चर्चा के केंद्र में आई है। इसलिए कि जिन तीन लोगों को साझा तौर पर नोबेल कमेटी ने चुना, उन्हें वैश्विक गरीबी को दूर करने में प्रायोगिक रास्ता बनाने के लिए पुरस्कृत किया गया है। लेकिन ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है। बाकी को छोड़ दें और बात भारत पर ही केंद्रित रखें तो ऐसा ही 21 साल पहले अमर्त्य सेन को नोबेल पुरस्कार दिए जाने से हुआ था।

अर्थशास्त्र में नोबेल और आर्थिक दशा

भारत में जन्मे अभिजीत बनर्जी व उनकी फ्रांसीसी पत्नी एस्थर डुफ्लो व माइकल क्रेमर को 2019 का नोबल पुरस्कार दिए जाने से हम लोग बहुत खुश है। मजेदार बात तो यह है कि हम लोगों की आर्थिक दशा को ले कर खुद अभिजीत बनर्जी का मानना है कि इस देश की अर्थव्यवस्था की ऐसी-तैसी हो चुकी है। वह बहुत बुरी स्थिति में है लेकिन भारत का सौभाग्य जो उन्हें अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में ही नोबल पुरस्कार दिया गया है।

अभिजीत बनर्जी के सिद्धांत क्या लागू होंगे?

बहुत पहले कार्ल मार्क्स और जोसेफ पियरे प्रूदों के बीच दर्शन की निर्धनता और निर्धनता के दर्शन पर बहस हुई थी। प्रूदों ने मार्क्स के सिद्धांतों के बारे में लिखा था यह निर्धनता का दर्शन है। इसके जवाब में मार्क्स ने दर्शन की निर्धनता नाम से किताब लिखी।