कृषि विधेयकों को राष्ट्रपति से मंजूरी

विपक्षी पार्टियों की मांग और देश के कई हिस्सों में चल रहे किसान आंदोलन की अनदेखी करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने विवादित कृषि विधेयकों को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति कोविंद ने तीन कृषि विधेयकों पर दस्तखत कर दिए है।

कई राज्यों में दिखा बंद का असर

तीन विवादित कृषि विधेयकों के विरोध में देश भर के किसान संगठनों की ओर से आयोजित भारत बंद का असर कई राज्यों में दिखा है। शुक्रवार को पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि इलाकों में बंद का जबरदस्त असर दिखा।

आज किसानों का भारत बंद

कृषि से जुड़े तीन विवादित विधेयकों को ध्वनि मत से पास कराए जाने के मसले पर संसद में कई दिनों तक चली राजनीति अब सड़कों पर आ गई है। देश भर के किसान संगठनों ने शुक्रवार को भारत बंद का आह्वान किया है।

संसदीय समितियां और कृषि विधेयक

मोदी सरकार ने जिस तरह से विपक्ष की परवाह न करते हुए तीनो विवादास्पद कृषि विधेयक को संसद के दोनों सदनो में पारित करवाया है उससे कमोबेश देश में कई जगह सड़को पर विरोध शुरू हो गया है।

फिर संसद की जरूरत क्या है?

संसद का मॉनसून सत्र महज 18 दिन का होना था और वह भी दस दिन में ही खत्म कर दिया गया। सत्र चला भी तो उसमें कई संसदीय गतिविधियों को सीमित कर दिया गया। सत्र के दौरान मोटे तौर पर सिर्फ सरकारी कामकाज हुआ।

विपक्ष ने राष्ट्रपति से की शिकायत

विवादित कृषि विधेयकों को लेकर विपक्षी पार्टियों के सांसदों ने बुधवार को संसद भवन परिसर में मोर्चा निकाला। उसके बाद विपक्षी पार्टियों का एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति से मिला और उनसे अनुरोध किया कि वे कृषि संबंधी विधेयकों पर दस्तखत नहीं करें। विपक्षी पार्टियों ने राष्ट्रपति से कहा कि राज्यसभा में ध्वनि मत से पास कराए गए इन विधेयकों पर सदन में दोबारा वोटिंग होनी चाहिए।

सरकार ने विपक्ष को एक कर दिया

केंद्र सरकार की राजनीति अब तक विपक्ष को बांटने की रही है लेकिन विवादित कृषि विधेयकों पर केंद्र सरकार की राजनीति ने समूचे विपक्ष को एक कर दिया है। विपक्ष की यह एकता संसद के अंदर तो दिख ही रही है, बाहर भी विपक्ष एक होकर सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है।

कांग्रेस-भाजपा की बदली भूमिका

लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और भाजपा की भूमिका बदल गई है। भाजपा सरकार में है और कांग्रेस कमजोर विपक्ष है। भूमिका बदलने के साथ ही दोनों पार्टियों की सोच भी बदल गई है। पहले भाजपा सरकारी अनाज मंडियों और आढ़तियों की व्यवस्था का समर्थन करती थी और पूरी ताकत वालमार्ट जैसी खुदरा कारोबार की कंपनियों का विरोध करती थी।

किसानों पर घटिया राजनीति

किसानों के बारे में लाए गए विधेयकों पर राज्यसभा में जिस तरह का हंगामा हुआ है, क्या इससे हमारी संसद की इज्जत बढ़ी है ? दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश भारत है। पड़ौसी देशों के सांसद हमसे क्या सीखेंगे

राज्यसभा में बनी खराब मिसाल

इन दिनों देश में जिस तरह का राजकाज चल रहा है, संसदीय परंपराओं की जिस तरह से अनदेखी की जा रही है, राजनीतिक फायदे के लिए नियमों-कानूनों का जैसा इस्तेमाल हो रहा है और संवैधानिक संस्थाओं से जैसे मनमाने तरीके से काम लिया जा रहा है उसे देखते हुए किसी भी बात पर हैरानी नहीं होनी चाहिए।

कांग्रेस क्या सचमुच इतनी सक्षम?

विवादित कृषि विधेयकों को लेकर कांग्रेस पार्टी सरकार के निशाने पर है। सरकार ने कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया कि वह देश के किसानों को गुमराह कर रही है। प्रधानमंत्री आमतौर पर चुनावी रैलियों में कांग्रेस पर हमला करते हैं पर ऐसे कांग्रेस के जिक्र से बचते हैं।

कृषि कानूनों पर लड़ाई लंबी होगी

संसद से पास विवादित कृषि विधेयकों को अदालत में चुनौती मिलेगी। विपक्षी पार्टियां इसकी तैयारी कर रही हैं कि राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने और अधिसूचना जारी होने के बाद इनको अदालत में चुनौती दी जाएगी।

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