‘राजद्रोह’ से नीचे कुछ नहीं!

गणतंत्र दिवस के दिन किसानों की ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसा को भड़काने का आरोप लगाते हुए छह पत्रकारों और कांग्रेस के सांसद शशि थरूर के खिलाफ उत्तर प्रदेश के नोएडा और मध्य प्रदेश के भोपाल में राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया गया है।

फिलहाल बाजी पलट गई है

मौजूदा किसान आंदोलन का हश्र चाहे जो हो, आधुनिक समय में इसके ऐसे कई योगदान हैं, जिनका दीर्घकालिक असर होगा। सबसे पहले उसने मौजूदा सरकार के तहत क्रोनी कैपिटलिज्म के सामने आए बदनुमा चेहरे को बेनकाब किया था।

किसानों की रिहाई की मांग

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में 67 दिन से आंदोलन कर रहे किसान एक बार फिर केंद्र सरकार के साथ वार्ता के लिए राजी हो गए हैं पर साथ ही यह भी कहा है

किसान आंदोलन में लौटी भीड़

गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर रैली के दौरान पुलिस और किसानों के बीच हुई झड़प के बाद किसान आंदोलन बिखरता दिख रहा था पर उस घटना के पांच दिन बाद आंदोलन पुराने रूप में लौट आया है।

किसानों के मुद्दे कहां गए?

गणतंत्र दिवस के दिन 26 जनवरी को किसानों की ट्रैक्टर परेड के दौरान पुलिस और आंदोलन कर रहे किसानों के बीच झड़प हुई। आमतौर पर आंदोलनों में ऐसा होता है

टिकैत का साथ देने पहुंचे और किसान

पश्चिम उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, शामली और दूसरे कई जिलों में हुई किसानों की महापंचायत की अपील के बाद बड़ी संख्या में किसान दिल्ली की सीमा पर गाजीपुर पहुंचे हैं।

किसानों पर कार्रवाई तेज

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों के साथ वार्ता की बात कही है तो दूसरी ओर पुलिस और प्रशासन किसानों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर रहा है और साथ ही आंदोलन को खत्म कराने का प्रयास भी किया जा रहा है।

किसान आंदोलन तेज हुआ

गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर रैली में पुलिस के साथ हुई झड़प के बाद बैकफुट पर आए किसान नेताओं ने एक बार फिर आंदोलन तेज कर दिया है।

तो 21 टकराव का!

हां, 26 जनवरी से 29 जनवरी 2021 के दिन इन पंक्तियों के लिखने तक का घटनाक्रम प्रमाण है कि भारत में सन् 2021 में देशभक्तों बनाम देशद्रोहियो-पाकिस्तानियों की पानीपत की लड़ाई नए आयाम पाएगी

पूरा विपक्ष किसानों के साथ

भारतीय जनता पार्टी और उसकी एकाध सहयोगी पार्टियों को छोड़ कर देश की लगभग सभी पार्टियों ने दिल्ली की सीमा पर चल रहे किसान आंदोलन का समर्थन किया है।

आंदोलन, टकराव के कई संकेत

घमासान राजनीतिक लड़ाई के संकेतों के अलावा सरकार का नागरिक संगठनों से टकराव रहेगा तो विपक्ष से भी। संसद का बजट सत्र शुरू होने के साथ इसके संकेत मिल गए है।

डंडे नहीं, अब बातचीत चले

जो किसान आंदोलन 25 जनवरी तक भारतीय लोकतंत्र की शान बढ़ रहा था, वही अब दुख और शर्म का कारण बन गया है। हमारे राजनीतिक नेताओं के बौद्धिक और नैतिक दिवालिएपन को इस आंदोलन ने उजागर कर दिया है।

भृतक-मीडिया के भुक्खड़ उचक्के और किसान

यह दिसंबर 2020 के तीसरे शनिवार की बात है। भारत के किसान आंदोलन के समर्थन की आड़ में वाशिंगटन में भारतीय दूतावास के पास लगी महात्मा गांधी की प्रतिमा को कुछ तत्वों ने नुक़सान पहुंचाया

अब सरदार वीएम सिंह महान हो गए!

ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी यानी एआईकेएसएससी के नेता सरदार वीएम सिंह ने संगठन को किसान आंदोलन से अलग करने का ऐलान किया है।

भानु के हटने से भी नुकसान नहीं!

भारतीय किसान यूनियन के भानु गुट से किसान आंदोलन से अपने को अलग कर लिया है। इस गुट ने दिल्ली-नोएडा की सीमा पर कमान संभाली थी।

सब अहिंसा की बात कर रहे हैं!

अच्छा है, जो सब लोग अहिंसा की बात कर रहे हैं। जिनको महात्मा गांधी फूटी आंख पसंद नहीं हैं, वे भी गांधी के अहिंसा सिद्धांत के सहारे किसानों को समझा रहे हैं कि ट्रैक्टर रैली के दिन हिंसा नहीं होनी चाहिए थी।

किसान और सरकारः अब आगे क्या ?

26 जनवरी की घटनाओं ने सिद्ध किया कि सरकार और किसान दोनों अपनी-अपनी कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए लेकिन अब असली सवाल यह है कि आगे क्या किया जाए

दीप सिद्धू पर मुकदमे में देरी क्यों हुई?

क्या दिल्ली पुलिस पंजाबी फिल्मों के अभिनेता और 26 जनवरी को लाल किले पर हुई घटना को अंजाम देने वाले दीप सिद्धू को बचाने की कोशिश कर रही थी

किसानों को हटा रही पुलिस

केंद्र सरकार वार्ता के जरिए किसान आंदोलन को खत्म नहीं करा सकी है और सुप्रीम कोर्ट की अपील पर भी किसानों का आंदोलन खत्म नहीं हुआ है

किसानों को मारने की साजिश: टिकैत

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में पिछले 64 दिन से चल रहे आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा और भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के ऊपर बड़ा आरोप लगाया है।

लाल किला तो ‘लीज’ पर है!

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों की ट्रैक्टर रैली में मंगलवार को कुछ जगहों पर उपद्रव होने की खबरों के बीच सबसे ज्यादा फोकस इस बात पर रहा कि कुछ लोगों ने लाल किले पर तिरंगे की बजाय दूसरा झंडा फहरा दिया।

पुलिस और एजेंसियों की विफलता!

दिल्ली पुलिस ने आंदोलन कर रहे किसानों के साथ तीन दिन वार्ता की थी। तीन दिन की वार्ता के बाद पुलिस ने किसानों को ट्रैक्टर परेड निकालने की अनुमति दी थी।

गलत सूचनाओं से बना मुगालता

जिस तरह से केंद्र सरकार शुरू में किसान आंदोलन को लेकर भ्रम में रही उसी तरह ट्रैक्टर रैली को लेकर भी सरकार मुगालते में थी।

मोदीजी, ईश्वर के लिए सिख भावना से न खेलो, कृषि कानून खत्म करो!

मोदीजी, मुझे पता है आप किसी की नहीं सुनते मगर जरा याद करें इमरजेंसी के उस वक्त को जब आपने सरदार की वेशभूषा धारण कर अपने आपको भूमिगत रखा था।

शर्मिंदा तो मीडिया को होना चाहिए!

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसान संगठनों के नेता शर्मिंदा हो रहे हैं। वे गणतंत्र दिवस ट्रैक्टर परेड को लेकर न्यूज चैनलों की ओर से बनाए गए छद्म और समानांतर विमर्श के कारण शर्मिंदा हैं

लोगों का गुबार है मुद्दा

कहा जाता है कि लोकतंत्र प्रेसर कुकर की तरह एक सेफ्टी वॉल्व है, जिसमें जब गुबार पैदा होता है, तो उसे निकल जाने का स्वतः मौका मिल जाता है

ये और वेः दोनों अराजक

इस बार का गणतंत्र-दिवस गनतंत्र-दिवस न बन जाए, इसकी आशंका मैंने पहले ही व्यक्त की थी। मुझे खुशी है कि किसानों के प्रदर्शनों में किसी ने भी बंदूके नहीं चलाईं।

पुलिस और सरकार से अदालत पूछे सवाल

मंगलवार को किसानों की ट्रैक्टर रैली के मीडिया में यह भी खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखी गई है और आंदोलनकारी किसानों पर कार्रवाई की मांग की गई है।

26 किसान नेताओं पर मुकदमा

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में पिछले 63 दिन से आंदोलन कर रहे किसान संगठनों के 26 नेताओं के ऊपर दिल्ली पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है।

किसानों ने लगाया साजिश का आरोप

केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों की ट्रैक्टर रैली में पुलिस और आंदोलनकारी किसानों के बीच हुई झड़प के एक दिन बाद बुधवार को किसान संगठनों ने प्रेस कांफ्रेंस करके अपना पक्ष रखा।